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शिन नियेन (नव वर्ष)
01-Dec-2016 12:00 AM 4284     

पिंग पिंग जैसे ही अपने घर में घुसी अचानक ही दरवाज़े पर ही ठिठक गयी। यह क्या ऐसा सूना-सूना घर काटने को आ रहा था। जिस तीन बेडरूम वाले घर में सात लड़कियां रहती हैं, हर समय हो हल्ला छाया रहता है, आज उसी घर में चुप्पी विराजमान थी।
पिंग पिंग को लगा यह चुप्पी वह झेल नहीं पायेगी। उसने जल्दी से अपने कमरे में आकर ऑफिस की तरफ से मिले Ïस्प्रग फेस्टिवल के दोनों तोहफे बेड पर फैंक टीवी लगा लिया था और पता नहीं कब गहरी नींद आ गयी उसे।
जैसे ही पिंग पिंग बस से उतरी उस वादी की महक उसकी नाक से होती हुई उसने तन मन में समा गयी। उसने चारों ओर दृष्टि डाली सामने हरे-भरे पहाड़ जैसे हाथ फैलाकर उसका स्वागत कर रहे हों। वह अपना सामान सम्भाल गाँव की और चलने लगी। गाँव तक उसे चलके जाना था। पूरे डेढ़ घंटा चलके गाँव पहुंचेगी पर ख़ुशी के मारे चलना भी उड़ने की तरह लग रहा था उसे।
अपने पर्वत पेड़ पत्ते, फूल क्या और धूल क्या, सब अपना लगता है यहाँ।
बरसों बाद वह पत्थरों, पेड़-पौधों, मिट्टी से सनी राह से गले मिल रही हो। उसके कदमों ने बेजान सड़कों पर चलके जो कठोरता पायी थी, मिट्टी पे पड़ते ही फूलों की नरमायी में बदल गयी।
उसने हाथों से ऊनी स्कर्ट ऊपर उठा उसे हवा में लहराया और स्कर्ट उठाये-उठाये घर की ओर जाने वाली पगडंडी पे भागने लगी जैसे अब सब्र नहीं हो रहा, उस प्यारी सी झोंपड़ी से दूर रहने का।
मेरे पाले हुये प्यारे सूअर बिल्ली और मुर्गियां!
पतली संकरी पगडंडी की चढ़ाई आज उसे कतई नहीं खल रही थी। पहाड़ों की ठंडी हवा उसके मुख को छूकर लालिमा प्रदान कर रही थी। इतनी ठंड में भी पसीने की नन्हीं बूँदें माथे पे नाचने लगी तो उसने सर से टोपी उतार दी। उसके लम्बे काले केश हवा में लहराने लगे। भागते हुये वह स्वयं से ही बातें करने लगी।
आ आ वो क्यों भागी थी इस सुंदर निर्मल संसार को छोड़ कर।
भागते भागते वह एकदम फिसली और गिर कर धरती पर जा पड़ी। वह उठी और कपड़े झाड़ने लगी। पर यह क्या वह गाँव की पगडंडी पर नहीं बेड पर से उठ रही थी और कपड़े भी साफ़ थे। एकदम जैसे जादू से यहाँ आ गिरी हो, वह कुढ़ सी गयी। क्या सोचकर यहाँ रुक गयी इस बार त्यौहार तो परिवार के साथ ही लगता है।
फिर अपने आप ही कह उठी कहाँ से लाऊं इतने पैसे जो सभी के लिये ढेर सारे अच्छे अच्छे ल्ली वू (गिफ्ट) खरीद सकूं, नया साल आता है तो शंघाई में नये फूल पत्तों की तरह पैसे भी उगने लगते हैं क्या? गाँव न जाने का अफ़सोस छोड़ वो अपनी कुढ़न भाई-बहनों और रिश्तेदारों पर निकालने लगी। कितना चाव रहता था हर साल नये साल पे Ïस्प्रग फेस्टिवल पे घर जाने का सारी सहेलियां खूब खरीदारी करती। मिलके अपने-अपने घर ले जाने के लिये। तीन चार महीने पहले से थोड़े-थोड़े पैसे जोड़ना शुरू कर देती। पहली बार जब वो घर गयी तो कैसे-कैसे पेट काटकर तंगी से रह कर सौगातों के लिये पैसा-पैसा करके जोड़ा था पर उसके कारण घर में सभी के खिले हुए चेहरे देख उसे जितनी संतुष्टि मिली थी उसने उसकी मेहनत करने की क्षमता दौ गुनी हो गयी थी।
अगले साल जाते हुये फिर सबके लिये ढेर सारी सौगातें ले चाव से गाँव पहुंच गयी। इस बार भी सभी खुश थे पर पहले जैसी चमक नहीं आयी। उसकी दी सौगातों को बहनें उलट-पलट कर देखने के बाद आपस में बात करने लगीं।
"सू की बहन कितना कुछ लायी है न अपने माँ पपा और सू के लिये। फर वाला कितना बढ़िया कोट और वैसे ही मैच करते स्कार्फ एवं दस्ताने, हाँ और  पर्स भी, आईआ सच में अत्यंत सुंदर!"
पिंग पिंग का मुंह उतर गया। उसने बैग में से जैकेट व शू पाओ (स्कूल बैग) निकाला। भाई की तरफ बढ़ गयी। देखकर भाई तो कुढ़ के उठ ही गया वहाँ से।
मुझे नहीं चाहिये जैकेट और शू। पाओ इतने बड़े शहर से क्या यही मिला मेरे लिये? मुझे तो कोई गेम चाहिये बस।
पिंग पिंग का मुंह खुला का खुला रह गया चित खिन्न हो गया।
इनके लिये मैं दिन भर पिसती हूँ अपनी सारी इच्छायें मारकर एक एक पैसा इक्कट्ठा करती हूँ इनके लिए ताकि ये सब अच्छा खाना खा सकें मेरी तरह न तरसें। ये समझते हैं मैं वहां ऐश कर रही हूँ।
तभी माँ पीछे से निकल के आयी और सबको डांटने लगी थी।
"क्या हो गया तुम सबको? वो शहर में नौकरी करती है। किसी बड़े खजाने के मालिक की रखैल बन के नहीं रहती समझे?"
"माँ! यह क्या बोल रही हो?"
"बेटी यह लोगों को देखकर बहक गये हैं, इन्हें समझ नहीं वहाँ कितनी मेहनत करनी पड़ती है तुम्हें। तुम छोड़ो यह सब चलो खाना खाओ और आराम कर लो, थोड़ी देर में हम सभी रिश्तेदारों को नये साल की बधाई देने निकल पड़ेंगे।"
"नहीं माँ, तुम जाओ मेरा जरा भी मन नहीं।"
"तुम इन बच्चों की बातों से दुखी न हो। पूरा साल तुम्हारी प्रतीक्षा करती हूँ। तुम्हें यहाँ छोड़कर मेरा भी मन नहीं होगा जाने का पर जाना तो पड़ेगा नहीं तो उन सबको बुरा लगेगा। कहेंगे बेटी शहर में कमाती है तो मुझे अकड़ हो गयी है।"
पिंग पिंग को लेकर ही घर से निकली थी उसकी प्यारी माँ। पपा भी होते तो कैसा आनंद होता त्यौहार का? खेतों में सांप के डसने से काल का ग्रास बन गये थे वो जब वह सिर्फ दस साल की थी भाई माँ के पेट में था।
दोनों बारी-बारी तीनों बुआओं, चाचा और दोनों मौसिओं के घर गयी। पिंग पिंग सबके लिये एक-एक बढ़िया शराब की बोतल लायी थी। माँ ने साथ में सबको आठ-आठ फल भी दिये। शराब सभी को बहुत अच्छी लगी। सभी प्रसन्न हुये थे।
पर पिंग पिंग नहीं, सभी माँ को पिंग पिंग की शादी के लिये जोर लगा रहे थे। बड़ी बुआ ने तो माँ को डांट भी दिया था।
"अब लड़की अच्छा कमाती है। शादी हो जानी चाहिये, वरना लोग कहेंगे शहर में किसी के साथ शादी कर ली हो। क्या कहें आजकल के बच्चों को?"
माँ ने कुछ नहीं कहा था बस हां हां करती रही।
पिंग पिंग को माँ पर क्रोध आने लगा था।
"माँ! तुमने कैसे सुन लिया यह सब?"
माँ फिर भी कुछ नहीं बोली। दूसरी गली की तरफ मुड़ गयी। वह डगर माँ की परम सखी चांग मौसी के घर को जाती है। पिंग पिंग को माँ की चुप्पी से बहुत भय लगता है। वह माँ के पीछे को होकर चलने लगी।
माँ की सखी के घर पहुंच कर दोनों अचानक ठिठक गयीं। चांग मौसी के रोने की आवाजें बाहर तक आ रही थी साथ ही उसके पति के चिल्लाने या कहो कि गुर्राने की आवाज़ आ रही थी। घर के आसपास छोटी दीवार से अंदर का दृश्य दिखाई दे रहा था। चांग मौसी का पति उसे घसीट रहा था, मार रहा था पर मौसी उससे छूटकर अदभुत गति से पीछे जाकर खड़ी हो जोर-जोर से रोने लगी। पति उन्हें देख हाथ की छड़ी फैंक बुदबुदाता हुआ बाहर गली की ओर भाग गया।
दोनों सखियों के मिलन का दृश्य भी स्वाभाविक नहीं था। कभी दोनों गले मिल रोतीं। बीच-बीच में चुप होकर आपस में कानाफूसी करतीं फिर अचानक से रोने लगती।
पिंग पिंग ऐसे भयावह मिलन को देख सकपका गयी थी। पर कुछ भी पूछने का साहस उसमें नहीं था।
वापस आते हुये माँ ने बताया चांग मौसी की बेटी शहर में किसी अमीर आदमी की रखैल बनके रहने लगी है। पता तब चला जब उसने बेटे को जन्म दिया। आदमी ने उसे घर गाड़ी पैसा सब कुछ दिया है पर शादी नहीं करना चाहता। लड़की कहती है उसे उसके विवाहित होने का भेद पता नहीं था। सारे गाँव वाले और रिश्तेदार थू थू कर रहे हैं। सखी का पति उसे मार रहा था क्योंकि वह बेटी को बस में नहीं रख सकी। शहर भेजते हुये तो बाप ने कुछ नहीं कहा फिर इतना पैसा भर-भर के लाती थी तो बहुत अकड़ता था। अब यह हुआ तो माँ का कसूर कैसे?
पिंग पिंग, तुम्हें मेरी सीख याद है न बेटी?
हाँ माँ, तुम चिंता न करना कभी, मुझे तुम बहुत प्यारी हो।
माँ के मुख पे चिंता जगह शांति आ गयी थी।
पिंग पिंग उठके बाहर आ गयी रसोई में जाकर कुछ खाने को ढूँढने लगी। वहाँ खाने को कुछ न था। फ्रिज में देखा थोड़ी-सी मछली पड़ी थी। उसने चावल का डब्बा निकाला।
चलो चावल के साथ मछली खा लेगी। फिर सुबह सुपरमार्केट जाकर पूरे हफ्ते का सामान ले आएगी।
पर चावल भी खत्म। अब क्या खाये?
उसने ऑफिस से मिले हुये डब्बे खोले। एक में शराब की बोतल, दूसरे में बढ़िया राईस केक, अं अं यही खाती हूँ।
केक और शराब पीकर गैलरी में आकर गुनगुनाने लगी। अगले ही क्षण चुप हो गयी। उसकी आवाज़ जैसे पूरी बिÏल्डग की सारी मंजिलों में गूँज गयी।
क्या सारी मंजिलों के घर खाली हैं? उसे याद आया इस बिÏल्डग में तो सभी वाये ति रेन ( ) ही हैं, तो क्या सभी लोग चले गये हैं? उसे भय लगने लगा एक पूरी बिÏल्डग में वो अकेली? कैसे रहेगी?
उसने अंदर आकर पर्स उठाया और बाहर निकल गयी।
सुपरमार्केट से आज ही सामान ले आएगी। नीचे उतरी तो उसे लगा पूरी बिÏल्डग भायं भायं कर रही है।
बाहर सड़क पे भी वही हाल था। कैसा अशांत सन्नाटा छाया हुआ था। ऐसे जैसे किसी सुंदर बाग को छांट मूंड कर सफाचट कर दिया हो। क्या सारा शंघाई सो रहा है या खाली हो गया है किसी भूचाल की सूचना से। सारी दुकानें बंद कोई रेस्टोरेंट तक नहीं खुला, कोई रेहड़ी वाला भी दिखाई नहीं दे रहा। एक गाड़ी निकल के गयी सड़क से, गाड़ी में गानों की आवाज़ से सड़क का सन्नाटा टूटा। आ नहीं अभी कुछ लोग हैं शहर में।
सुपर मार्केट लाल झाड़ फानूसों से सजी हुई थी। धीमी आवाज़ में गाने चल रहे थे। अंदर भी उसे अपने अलावा दो व्यक्ति ही दिखे। उसने थोड़ा सा सामान लिया पर घूम-घूम कर सारी चीज़ें देखती रही। तभी पीछे से आकर सेलगर्ल ने बताया आज मार्केट आठ बजे ही बंद हो जाएगी सो जो ज़रा जल्दी कर ले। उसने घड़ी देखी पांच मिनट बाकी थे सो फटाफट काउन्टर की तरफ लपकी।
वापसी में सन्नाटा फिर काटने लगा कैसे सदा उछलता कूदता शहर निष्प्राण सा होकर लेटा है।
पिंग पिंग ने मन ही मन हाथ में पकड़ी चीज़े गिननी शुरू की। हाँ चार तरह की सब्जी, दस अंडे, चावल, नूडल एवं एक पैकेट ब्रेड का। उसे तसल्ली हुई चलो हफ्ते के लिये खाने की चिंता तो दूर हुई। वो याद करने लगी गाँव में कई बार पूरा हफ्ता आलू या शक्करकंदी खाकर ही निकल जाता था। बर्फ से सनी सड़कों पर टूटे हुये तले वाले जूते पहन बाल्टी में आलू व शक्करकंदी भर वह दिन भर छोटी बहनों के साथ घूमती किन्तु कभी-कभी एक भी ग्राहक न मिलता। थक हारकर वो वापिस आती वही आलू शकरकंदी भून कर खाती। कई बार तीसरी छोटी बहन रोती चिल्लाती आलू शक्करकंदी फैंक कर जमीन पर लोटने लगती पर घर में कुछ और होता तो माँ देती। दोनों बड़ी बहनें चुपचाप खातीं, गला घुटता पर वो किसी तरह पेट में उढ़ेल ही लेती, पता था नहीं तो रात में भूख के मारे नींद नहीं आएगी।
वह पहले पहल शहर आई तो सुपर मार्केट में नौकरी मिली थी। वहां बच्चों को राजकुमारों सा सजा देख उसकी आँखें फटी रह गयी थी, "यह सारे क्या किसी शादी में जा रहे हैं?" फिर सुपर मार्केट में बच्चों के सामान का अलग सेक्शन देखकर तो वह कैसे चकरा गयी थी, "आई आ बच्चों का अलग से भी सामान होता है मुझे पता नहीं था।" बच्चे अलग से क्या खाते हैं। वो वहीं खड़ी रह गयी सारी चीज़ें गिनती हुई।
"चल भी यहाँ क्या कर रही है? उधर दूसरे सेक्शन में है तेरी ड्यूटी। पता नहीं रोज़ नये-नये लोगों को भर्ती कर लेते हैं। कुछ अक्ल नहीं होती इनको और सीखते ही भागने की करते हैं।"
उसने भी यही किया था पांच महीने। काम किया, डांट खायी, गलियाँ खायी, हंसी का पात्र बनी, पर सीखा बहुत और जैसे ही उसने सीख लिया दूसरी नौकरी ढूँढ ली।
नयी नौकरी इसलिये नहीं ढूंढी क्योंकि वहां सैलरी अधिक थी बल्कि वहाँ वो यहाँ की तरह फूहड़जन की तरह नहीं देखी गयी। यहाँ सब सीखने के बाद भी सभी लोगों के मन में पहले की छपी तस्वीर मिट नहीं पाई। दूसरी नौकरी इम्पोर्टेड वस्तुओं के स्टोर पर की तो विदेशी सामान के बारे में बहुत कुछ जान लिया। सैलरी बढ़ने पर माँ को छोटा सा पक्का घर बनवाने के लिये भी लिख दिया।
 धीरे-धीरे सब शहरी चोचले सीखे। सुंदर तो वह पहले भी थी अब स्मार्ट भी हो गयी सो अब एक ऑफिस में रिसेप्शनिस्ट है।
अरे ऑफिस की तरफ से बोनस भी मिला है उसे, पूरी एक मास की सैलरी। माँ तो खुश हो जाएगी! माँ की याद आते ही उसका मन फिर उदास हो गया।
वह फिर धीरे-धीरे चलने लगी। चलो थोड़ी देरी से घर पहुंचेगी। सड़क से बिÏल्डग की ओर मुड़ते हुए उसे याद आया इधर बिÏल्डग नम्बर तीन में लाओ माँ (बूढ़ी अम्मां) रहती हैं। वह तेज कदमों से अपनी दो नम्बर बिÏल्डग की ओर चलने लगी। जल्दी से सारा सामान किसी तरह घर में फैंक वापिस नीचे आकर फिर तीन नम्बर बिÏल्डग की तरफ बढ़ गयी लाओ माँ से मिलने के लिये।
चलो कोई तो होगा नये साल की पूर्व रात्रि में साथ देने के लिये और फिर लाओ माँ के साथ उसकी अच्छी छनती है। उसके साथ रहने वाली लड़कियाँ उसकी हंसी उड़ाती हैं।
"अरे तुम्हें कोई ओर नहीं मिला मन बहलाने को ? वो बूढ़ी जब देखो हिदायत देती रहती है। जरा उसके पास खड़े हो जाओ बस हो जाती है शुरू। "
पहले पिंग पिंग को भी यही लगता था कि यह बूढ़ी जब देखो कुछ न कुछ पूछती रहती है।
एक दिन उसने रजाई बिÏल्डग के पीछे बने अहाते में धूप में रखी, लेकिन घर आई तो बारिश इतनी थी कि हर तरफ जल थल। "ओह मेरी रजाई तो पानी पानी हो गयी हो होगी, अब क्या करूं? इतनी ठंडी में रजाई के बिना कैसे सो पायेगी? किसी दूसरी लड़की के साथ सोना पड़ेगा।"
किसी तरह छाता सम्भाल पीछे रजाई लेने पहुंची पर रजाई गायब। वापिस आकर बिÏल्डग के ऑफिस में पूछा तो किसी को कुछ मालूम नहीं। काफी प्रयास के बाद रजाई नहीं मिली तो रूं रूं करती हुई अपार्टमेंट में आ गयी। सब लडकियाँ उसे तसल्ली देने लगीं, "सब थोड़े-थोड़े पैसे इकट्ठे करके रजाई ले लेंगे जब सैलरी मिले तो दे देना।"
तभी लगा लाओ माँ की जोर-जोर से बोलने की आवाज़ आई। सब सखियाँ हंसने लगी, "इतनी उम्र में भी इतना ऊँचा बोलती है कि पूरी बिÏल्डग सिर पे उठा लेती है।" तभी आवाज़ निचली मंजिल से उनकी मंजिल पे आ गयी। पिंग पिंग ने अपना नाम सुना तो दरवाज़ा खोल दिया। सामने लाओ माँ उसकी रजाई पकड़े उपस्थित थीं ओर गुस्से में थीं। "यह तुम्हारी रजाई, अपना अपार्टमेंट नम्बर तो बताया होता कभी, सारी बिÏल्डग में नौ मंजिल घूम-घूम कर पूछ-पूछ कर पहुंची हूँ वो भी तुम्हें इस बिÏल्डग में आते देखती हूँ तो इतना ही जानती थी कि बिÏल्डग नम्बर दो में रहती हो।" सब लड़कियाँ कनखियों से एक-दूसरे को देख मुंह दबाकर हंसने लगी थीं पर उसने लाओ माँ को आलिंगन में ले लिया, "शिय शिय (धन्यवाद) लाओ माँ!"
अगले दिन वह ऑफिस से आते हुये लाओ माँ के घर गयी थी, दरवाज़ा एक नौजवान लड़के ने खोला और प्रश्नसूचक दृष्टि उस पर गढ़ा दी।
"लाओ माँ है?"
"नाए नाए (दादी), कोई वाए ती रेनन बाहरी आदमी है" कहता हुआ वह बाहर निकल गया। उसे क्रोध आ गया था, लड़की नहीं बोल सकता था, यह शंघाई वाले भी अपने आप को जाने क्या समझते हैं, हुंह!
तभी लाओ माँ आ गयी उसने उन्हें मफलर दिया, "यह मैं आपके लिये लायी हूँ" लाओ माँ थोड़ी नाराज़ हुई, "अब यह रिवाज़ सबके लिये नहीं होते, क्या जरूरत थी पैसे खर्च करने की? तुम इतनी दूर परिवार का दायित्व निभाने आई हो। मैं जानती हूँ तुम्हारी लायी भेंट तो लौटा नहीं सकती पर तुम्हें मेरी बात माननी पड़ेगी, आज रात का भोजन मेरे साथ करना होगा।"
ठीक है माँ पर यह लड़का कौन था?
आ... यह मेरा पोता है कहते हुए लाओ माँ की आँखों में ढेर सारी ममता उमड़ आई।
यह आपके साथ रहता है?
हाँ। यह ही तो रहता है, यही परिवार है मेरा। नौकरी करता है, मेरे पास तो महीने में एकाध बार ही आ पाता है, कभी कभी वो भी नहीं।
क्यों माँ? इसके माता-पिता अर्थात तुम्हारा बेटा व बहु?
हा...
चलो खाना खाते हैं यह फिर कभी सही, यह बता देती हूँ दोनों जीवित हैं।
लाओ माँ ने काफी कुछ बना रखा था, बड़े दिन बाद उसने छककर खाया था और लाओ माँ ने भी उसे बड़े लाड़ से खिलाया। बीच-बीच में शराब की चुस्की बहुत अच्छी लग रही थी।
आते हुये लाओ माँ ने दो जोड़ी ऊन की जुराबें उसके पकड़ा दी। "देखो मैंने स्वयं बुनी हैं, भेड़ की बढ़िया ऊन है। "
लाओ माँ, तुम इस शहर की नहीं हो। तुम भावुक हो, तुम्हारे मन में वाये ती रेन के लिये करुणा है।
आ... हूँ तो मैं भी शंघाई की, कहते हुए वह हंस पड़ी।
उसके बाद भी कई बार लाओ माँ के घर गयी, उनसे मिलके उसे बहुत अच्छा लगता। माँ का घर सदा ही साफ-सुथरा और व्यवस्थित मिलता उसे। अकेली माँ इतना काम करती हैं उसे सोचकर आश्चर्य होता।
वह लाओ माँ के घर पहुंची तो लाओ माँ अकेली थी घर पे।
मेज पर दस-बारह तरह के व्यंजन सजे हुए थे। दो तीन तरह की चिअउ (शराब) थी। माँ अभी भी रसोई में व्यस्त थी।
"शिन नियेन खुआये ल (नये साल की बधाई) लाओ माँ! मैं कुछ करूं?"
"आ... तुम इधर बैठो" खिली हुई माँ ने उसे हाथ पकड़ कुर्सी पर बिठा दिया स्वयं भी हाथ पोंछती हुई उसके पास बैठ गयी।
"घर में कोई अतिथि आने वाले हैं?"
"आ आ... अतिथि है ना नया साल! साल में एक बार ही तो आता है यह दिन।"
अच्छा हुआ लाओ माँ तुम घर पर मिल गयी मुझे, मेरा तो मन ही नहीं लग रहा था।"
लो नये साल में मन क्या लगाना, बस ख़ुशी से उसका स्वागत करो।"
अकेले?
नया साल है फिर अकेले हो या नहीं क्या फर्क पड़ता है। अं... शायद पड़ता ही हो। देखो तुम्हारे आने से मेरी ख़ुशी भी तो बढ़ गयी है। हाँ पर, मैं खुश पहले भी थी।
तुम्हारा पोता नहीं आया आज?
वह है तो शंघाई में पर आज सारे मित्र मिलके आनंद लेंगे किसी होटल में।
आज के दिन घर छोड़ कर होटल?
अरे यह आजकल के शहरी बच्चों का नया ढंग है और फिर नया साल कैसे मनाया जाये यह तो स्वयं की इच्छा पर निर्भर करता है।
अं अं... यह तो है।
किन्तु लाओ माँ का स्वर कुछ गंभीर हो गया, "तुम समझती नहीं, उसका परिवार है कहाँ जो उसको खींच सके।" फिर अकस्मात पलट कर कहने लगी, "चलो भोजन करते हैं नहीं तो अतिथि अकेला भोजन कर चला जायेगा, बारह बजे नया साल।"
दोनों खाने लगीं पीने भी लगीं। पिंग पिंग ने शायद पहली बार इतनी तरह का भोजन एक साथ खाया। लाओ माँ के अनुरोध करने पर पी भी कुछ ज्यादा ही। धीरे-धीरे नशा चढ़ रहा था उसे। लगा वह अंदर बाहर एकाकार होने लगा था। अंदर की बातें अंदर न रहीं।
इतने सारे विचार जैसे उसे लफंगों की तरह घेर कर उसके चारों ओर नाच नाच कर ऊधम मचाने लगे। उसे ऐसा प्रतीत हुआ ये विचार उसे आज कुचल मसल देंगे।
अच्छा लाओ माँ यह शंघाई रेन हम वाए ती रेन को नीची निगाह से क्यों देखते हैं? पर तुम ऐसी नहीं हो।
कितना बदल लिया स्वयं को, यहाँ की तरह ढाल लिया फिर भी जाने कैसे इनको दिखाई दे जाता है हम बाहर के हैं।
देखो अब मैं रोती हूँ तो बेआवाज़, हंसती हूँ तो मुंह बंद कर, किसी को दूर से पुकारती भी नहीं। बातें भी धीमी आवाज़ में करती हूँ।
"हं हं किन्तु अभी तक आँखों में और चाल में वो आत्मविश्वास नहीं छलकता।"
"हूँ... यह बात है। पर यहाँ की तरह भावरहित रबड़ के गुड्डों के जैसे तो मैं हो ही नहीं सकती।"
"हैं? यहाँ कौन है ऐसे?" लाओ माँ के स्वर में रोष उमड़ आया।
"देखा नहीं मेट्रो में सब एक तरह के लगते हैं, अपने-अपने मोबाइल में सर दिए हुए या या शून्य में ताकते हुए एकदम स्थिर, अपना स्टेशन आने पे उतरते हैं तो जान पड़ता है इनमें प्राण भी हैं।"
"हूँ... तो तुम भी शहर-पीड़िता हो।"
"नहीं-नहीं ऐसा नहीं। अपना घर खेती माँ छोड़ कर आई हूँ। अपने परिवार के लिये, अपने भाई-बहनों के लिये ताकि सब पेट भर रोटी खा सकें, यह सच है। पर मैं गाँव के बाहर की दुनियां भी देखना चाहती थी, विशेषतः यह शहर, रोशनियों का एवं जवानों के सपनों का शहर। वो समन्दर जिसकी एक बूँद पीने को तरसते हैं सभी पर किस्मत अपनी अपनी कोई उसमें मोती पाता है और कोई खारा पानी।"
वह हंसने लगी, उसकी हंसी अब खनखनाने लगी है, उसमें मीठी लहर है।
"और कई इसमें डूब भी जाते हैं।"
"आ... सही है।"
"तो तुम समन्दर के कोलाहल से भागती क्यों हो?"
"भागती नहीं मैं, न ही भागूँगी, यह शहर सबको आश्रय देने वाला है, भगाने वाला नहीं। यों ही कभी कभी कुछ खलने लगता है।"
"यहाँ का कोलाहल, आकाश को छूती स्वर्णिम इमारतें, सड़कों पर रंग-बिरंगी कारों की लहरियां, हर बात निराली है यहाँ की।"
अब लाओ माँ भी अपनी रौ में आ चुकी थी, "यहाँ के लोग भी तेरे मेरे गाँव से अलग हैं, यहाँ लड़की कितनी भी सुंदर क्यों न हो, चाहे जैसे भी कपड़े पहन कर निकल जाये, कोई उचक-उचक या घूर-घूर कर नहीं देखता।"
आ... लाओ माँ यहाँ की लड़कियाँ और औरतें, क्या बात है उनकी! सिग्रेट व शराब तो गाँव में भी सभी पीते हैं पर इनके पीने का तो अंदाज़ ही अलग है। यहाँ आकर मैंने देखा, उन्मुक्त अंदाज़ में हाथ में सिग्रेट के कश लेते हुये बड़ी गाड़ियों से निकलती हैं, ऐसे लगता है स्वर्ग की अप्सराएं यहीं उतर आयी हों। इनके वैभव को देखकर ही अहसास होता है कि सचमुच हमारा देश बहुत अमीर हो गया है, वरना गाँव की भुखमरी में कौन मानेगा कि हमारा देश कितना आगे बढ़ गया है।
"यहाँ के लोग, लड़कियाँ, लड़के-बच्चे सब सुंदर हैं लाओ माँ। गाँव की सुन्दरता तो गरीबी के पीछे छुप जाती है।"
पिंग पिंग कुर्सी से उठी सोफे में धंस गयी।
पर माँ तो कहती है सुंदर तन के साथ सुंदर मन भी जरूरी है वरन जीवन चलाने के लिये सुंदर तन नहीं सुंदर विचार होना जरूरी है। सब गलत है यहाँ आकर समझी बस व्यवहार कुशल होना ही आवश्यक है।
लो मैं तो बहुत बोल गयी पता नहीं कैसे यह सब विचार जबरदस्ती रेशमी स्कार्फ की तरह आसपास लहरा रहे हैं।
पिंग पिंग के कजरारे नयन मदिरा से गुलाबी हो रहे थे। बातों में थिरकन आने लगी। मदिरा है ही ऐसी चीज। भीतर छिपे कोने-कोने में घुसे या कब मर चुके एहसास भी जागकर सिर पे नाचने लगते हैं।
"लाओ माँ... यह शहरी लोग, गाँव के लोग, अमीर-गरीब, अतिसुंदर सुंदर असुन्दर क्या यह वर्गीकरण समाप्त नहीं हो सकता? जन्म से सब इन्सान ही तो हैं, एक हैं फिर यह वर्गीकरण क्यों?"
लाओ माँ भी दार्शनिक बन चुकी थी अब तक।
"तुम विचार छोड़ो, जीवन जीने के लिये ऊँचे नीचे विचार कोई काम नहीं आते बस परिस्थितियों के साथ निभाने की कला आनी चाहिए हा... हा...।" कहते हुए माँ ने हवा में हाथ लहराया।
"और तुम वर्गीकरण की बात करती हो, यह संसार वर्गहीन हो ही नहीं सकता। जन्मते ही वर्ग बन जाते हैं। शिशु गोरा है या गहरे रंग का, स्वस्थ है या कमजोर, मोटा पतला। उम्र के वर्ग हैं बच्चा जवान बूढ़ा, हैं? क्या नहीं हैं?"
"पर आज के आधुनिक समाज में ज्यादा ही हो गया है।"
"समाज आधुनिक कब न था? देखो मेरी उम्र अस्सी साल की हो गयी है जब से होश सम्भाला समाज आधुनिक हो गया है यही सुनते आये हैं। मैं तीस की थी समाज तब भी पहले से आधुनिक था। साल दर साल होता ही रहा है। समय सदा ही करवट लेता है।" कहते हुये लाओ माँ की आँखें बड़ी और गहरी हो गयी।
"पर आजकल हम जवानों की पीड़ा तो देखो, हम गरीब वाये ती रेन को कितना झेलना पड़ता है।"
"पीड़ा एवं व्यथा का भी अपना स्थान है जीवन में" लाओ माँ खिसक कर पिंग पिंग के करीब आ गयीं, "यही बात समझ आ जाये तो संघर्ष करने की प्रेरणा देती है पीड़ा।" फिर सिर पीछे करके सोफे पे टिका लिया।  "आजकल के बच्चे इच्छाओं के मारे भाग रहे हैं। और इस भागमभाग को पीड़ा कहते हैं।" फिर सीधी होकर बैठ जाती है।
"तुम गाँव नहीं गयी इसलिये नहीं कि अब खाने को रोटी नहीं, बल्कि इसलिये क्योंकि तेरे घर में सबको नई-नई चीजें चाहिए तुमसे। आ... उनकी इच्छायें और उन्हें पूरा करने की तुम्हारी स्वयं की इच्छा। नहीं पूरा करने का डर और पीड़ा।"
"तुम लोग क्या जानों पीड़ा तब होती है जब खाना न मिलने के कारण हफ्तों भूखे रहो और भूख के कारण जब आदमी घास चबाने लगे। अपनों को मरते देखो भूख से बिलखते हुए। मैंने झेला है सब, मेरे अंदर एक नया जीवन जन्म लेने वाला था और मैं स्वयं भूख से मर रही थी। मेरे अपने सारे मर चुके थे। पता नहीं गाँव से शंघाई कैसे पहुंची थी, कुछ पता नहीं। उन्माद ने घेर लिया था मुझे, मैं अकेली नहीं थी, मेरे जैसे बहुत थे। सहनशीलता खो दी है तुम सबने, धरती से उठके चाँद पकड़ना है, बहुत पीड़ित हो।" लाओ माँ ने उठके गिलास में थोड़ी शराब उड़ेली फिर सोफे पे आके बैठ गयी ।
पिंग पिंग बड़े ध्यान से लाओ माँ को ताकने लगी उसे लाओ माँ एक महान विचारक दार्शनिक न जाने क्या-क्या दिखने लगी। एक बूढ़ी जिसे सदा अनपढ़ ही समझती थी वो परिस्थितियों से उलझ उलझ कर उन्हें सुलझाना जानती है।
"सच ही तो कह रही है हम जीवन जीने के लिये हर साधन को पाना चाहते हैं। फिर उसे पाने के लिए भागदौड़, रेलमपेल, धक्का-मुक्की, चूहा दौड़। कई तो छोटी-छोटी चीजों को पाने के लिये स्वयं को ही छोटा कर लेते हैं।"
उसे याद आया उसके साथ रहने वाली एक लड़की विवाहित आदमी के साथ इटली घूमने गयी है, सब जानते हुए दूसरी लड़की ने पूछा तो उसने कहा था इसमें क्या है? यहाँ कौन है उसे जानने वाला? और फिर वह अपनी कमाई से तो इटली देखने से रही।
सोच में डूबी पिंग पिंग को देख कर लाओ माँ मुस्कुरा दी, सोचने लगी बिल्कुल सही समय पर हथौड़ा मारा है। मदिरा से पिंग पिंग के दिमाग के पलड़े खुल चुके थे और विचार आसानी से पलड़ों के भीतर होते गये।
पिंग पिंग थोड़ा ऊँघने लगी तो लाओ माँ ने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। "तुम मेरे गाँव की हो, तुम्हें समन्दर में खोने न दूँगी। मैंने मोती चुने हैं। यह कला तुम्हें भी सिखा दूँगी।" तभी चारों ओर पटाखों का शोर होने लगा, फट-फट की आवाज़ से पिंग पिंग जग गयी।
"आ... शिन नियेन खुआये ल (नव वर्ष की बधाई हो) कहते-कहते फिर से वहीं लुढ़क गयी। सुबह उठी तो नये साल की रंगत नई थी। उसका पोर पोर स्फूर्ति से सरोबार था। यह बढ़िया भोजन का असर था, मदिरा का, लाओ माँ का, या नये साल का? वह मुस्कुराने लगी।

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