ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
चीन में बदलाव का दौर
02-Jun-2017 02:40 AM 2369     

मेरे दादके और नानके गाँव में हैं, गाँव से मेरा रिश्ता बहुत गाढ़ा है। बचपन से ही हर छुट्टियों और शादी ब्याह में गाँव जाना होता रहता है। सो गाँव से मेरा गहरा लगाव रहा है। लेकिन दस साल से, जबसे शंघाई आये तो भारत जाने के दौरान गाँव जाकर रहना नहीं हुआ।
हम शंघाई आ गये लेकिन शंघाई में रहकर भी गाँवों से लगाव कम नहीं हुआ। जब पहले पहल शंघाई आये तो बिजनेस के सिलसिले में मेरे पति को काफ़ी दूरदराज कस्बों में भी जाना पड़ता था। गाँवों को देखने-जानने की ललक के चलते अनेक बार मैं भी उनके साथ चली जाती थी। सफर के दौरान जहां भी गाँव देखने को मिलता मैं ड्राईवर को टैक्सी रोकने को कहती और बाहर निकल गाँव का सौंदर्य निहारने लगती। हैट पहने हुए खेतों में काम करते लोग, पास में ही खेलते या बड़ों के साथ में ही कुछ पकड़े खेतों में चलते हुए छोटे-छोटे बच्चों को देख कर आश्चर्य-सा होता। तब हम चीनी भाषा बोल नहीं पाते थे सो मुस्कुराहटों का आदान-प्रदान ही कर लेते, लेकिन जब थोड़ा बोलना आ गया तो उनसे बातें करने का उनके बारे में जानने का अवसर भी मिल जाता था।
यह जानकर हैरानी हुई कि तकरीबन सभी गाँवों में कोई नौजवान नज़र नहीं आता, उन्होंने बताया कि अब बस अधेड़ लोग बचे हैं काम करने वाले जो खेती करते हैं और घर भी सम्भालते हैं। ज्यादातर अधेड़ बूढ़े माँ-बाप के साथ-साथ अपने पोते-पोतियों या नाती नातिन को भी पालते हैं। इन बच्चों के माँ-बाप शहर में पैसा कमाने गये हैं।
कहते हैं चीन में जितनी तेजी से शहरों का भौतिक व आर्थिक विकास हुआ उसके पीछे मेहनत गाँव से आये मजदूरों की ही है, जिन्होंने रात-दिन काम करके बड़ी-बड़ी बिÏल्डगें खड़ी कीं और देशभर में सड़कों और पुलों के जाल बिछाए, लेकिन उनके खुद के गाँवों की स्थिति बीसवीं सदी में नहीं बदली।
शहरों में अरबों के शीशमहल बनाने वाले साल में एकाध बार गाँव जाते तो उन्हें वही सदियों पुराना कच्ची सड़कों और कच्चे घरों वाला गाँव ही देखने को मिलता। कहीं किसी गाँव में इक्का दुक्का पक्के घर बन गये थे, जिन्होंने शहरों में अपनों से दूर रह कर जी तोड़ मेहनत करके पैसा कमाया उनका एक ही सपना था अपना पक्का घर बनाना।
 अब जब देहात और शहरी जीवन में अंतर की खायी दिन-ब-दिन चौड़ी होती गयी और पूरे विश्व की नजरों में आने लगी तब देहात व देहातियों को लेकर सरकार की भी चिंता बढ़ गयी। देहात और शहरों में असमानता सिर्फ आर्थिक ही नहीं बल्कि रोजमर्रा सुविधाओं में पढ़ाई के स्तर में भी बहुत ज्यादा है। यह असमानता चीन के पश्चिम क्षेत्र में अधिक है, क्योंकि यहाँ देहाती जीवन खेतीबाड़ी पर अधिक निर्भर करता है, जबकि पूर्व की तरफ व्यापार व टेक्नोलॉजी का प्रभाव अधिक है।
देहात में जिन मूलभूत सुविधाओं कमी नौजवानों को शहरों में धकेल ले गयी वो कमी सालों बाद भी वैसी ही थी। उनकी कड़ी मेहनत से फैक्ट्रियों के निर्यात से मालिकों और देश को खूब मुनाफा हुआ पर उनके देहात को इस मुनाफे से कुछ ज्यादा लाभ नहीं मिला था। पर अब बहुत कुछ बदल रहा है। देहातियों ने जी तोड़ मेहनत से शहरों का रूप बदला अब उनकी बारी है बदलाव की।
मेरी एक मित्र अभी खुश है क्योंकि उसके बूढ़े माँ-पापा शंघाई आने को तैयार नहीं थे और उसका गाँव दूरस्थ पहाड़ी इलाके में है। खाने-पीने का सामान कुछ भी लेना हो तो एक डेढ़ घंटे का कच्चा रस्ता पैदल चलके पास के कस्बे तक जाना पड़ता था। अंडे व मीट के लिए खुद ही मुर्गियाँ व सुअर पालने पड़ते और सब्जियां भी खुद ही उगानी पड़ती जो बुढ़ापे में मुश्किल होता जा रहा था। लेकिन अब गाँव तक पक्की सड़क बन गयी और रोज के सामान की दुकान भी खुल गई है।
यह तो दूरस्थ गाँव की बात थी। एक दूसरे मित्र जिनका गाँव फु चिएन प्रान्त में शहर से बहुत ज्यादा दूर नहीं है वह अपने गाँव में बदलाव से आई खुशहाली से बहुत खुश हैं। वह बताते हैं कि उनके गाँव में अब शहर वाली सब सुविधाएं व सभी सामान जैसे वाशिंग मशीन, माइक्रोवेव, एसी मौजूद हैं और उन्हें खरीदने के लिये लोगों के पास पैसा भी है। बिजली-पानी की कोई दिक्कत नहीं। लोगों के रहने का तरीका बदला है। सभी के पास अपनी गाड़ियाँ हैं। बच्चे पढ़ने के लिए शहरों में जाते हैं पर पढ़ाई पूरी करके वापिस गाँव आकर अपना खुद का व्यवसाय करना चाहते हैं और कुछ तो कर भी रहे हैं। क्योंकि अब इन्टरनेट के जरिये वो गाँव में रहकर भी अपने ग्राहकों से जुड़ सकते हैं। बल्कि इन्टरनेट आने के बाद उसके जरिये वो अपने ग्राहकों तक सीधे पहुंच रहे हैं सो बिचौलिये को देने वाले पैसे भी बचने लगे हैं। दूसरी ओर खेतीबाड़ी में भी साइंस व नई तकनीकों के जरिये बहुत सुधार आया है। पैदावार बढ़ी है। मांग भी बढ़ी है सो किसान अच्छा कमा रहे हैं।
फिर वह मुस्कुराकर कहने लगे हमारी सरकार ने बहुत काम किया है और आम आदमी भी बहुत मेहनतकश है। इसीलिए देश इतना आगे बढ़ा है। सुनकर लगा कहीं तो कुछ है जिसके कारण भारत का देहात अभी भी वहाँ नहीं पहुंच पाया जहां होना चाहिए।
हमारे एक व्यावसायिक मित्र हैं। हर बार हम रुइ आन शहर में उनके ऑफिस में ही जाते थे, लेकिन बार बार फैक्ट्री दिखाने के लिए कहने पर कई साल पहले उनकी फैक्ट्री में जाना हुआ था। रुइ आन शहर के बाहर काफी दूर उनके गाँव के पास ही उनकी फैक्ट्री थी। एक बहुत बड़े हॉल में पचास साठ वर्कर काम कर रहे थे। कमरे में धुंआ, धूल, मिट्टी उड़कर नाक में चढ़ रही थी, ज्यादा देर तक खड़े रहना मुश्किल था, तब समझ में आया कि वह हमें फैक्ट्री में क्यों नहीं ले जाना चाहते थे।
दो साल पहले दोबारा गये तो वहां पांच मंजिला खूब बड़ी चकाचक बिÏल्डग खड़ी थी। आगे बड़ा-सा लॉन हरी घास और फूलों वाले पौधों से सजा हुआ। अंदर गये तो ऊपर जाने के लिए लिफ्ट लगी थी। शीशों के अंदर साफ़ सुथरे कमरों में वर्कर काम कर रहे थे। अंदर गये तो हर कमरे में एसी चल रहे थे। वर्कर भी साफ कपड़ों में काफी अच्छी स्थिति में दिख रहे थे। हमें लगा हमारी हैरानी देख कर वह मुस्कुराये और बताने लगे अब पहले की तरह काम नहीं होता, पैसे आये हैं तो स्थितियाँ भी बदली हैं। देहाती मजदूर भी जागरूक हो गये हैं। फिर देहाती मजदूरों के पक्ष सरकार की नीति भी कठोरता से लागू हुई हैं।
हमारे घर की कामवाली भी स्स छुआन के दूरस्थ गाँव की है। दस साल से हमारे यहाँ काम करती है। वो पन्द्रह साल से शंघाई में रहती है। दस साल पहले देहात की बात होती थी तो यही कहती थी कि गाँव अभी तक वैसे ही हैं जैसे मेरी माँ के बचपन में थे। फर्क इतना है कि हम सब जवान लोग बाहर शहरों में आकर कमाने लगे हैं तो गाँव में भी सभी को भर पेट खाना मिल जाता है नहीं तो वो लोग कई बार भूखे सोये हैं। अब ऐसा नहीं है, वह घर पैसा भेजते हैं तो खेतों के लिए बीज समय पर खरीद लेते हैं सो खेती में सुधार आया है। लेकिन उसके लिए हमें बच्चों से दूर रहना पड़ता है। बच्चे गाँव में माँ के पास रहते हैं। जब भी नये साल पे गाँव जाती तो दुखी लौटती है, क्योंकि बेटा साथ आने के लिए रोता था तो उसे समझाना पड़ता था कि अगर उसके माँ-पापा शहर में काम करते हैं तो उसको सर्दी में पहनने के लिए अच्छे गर्म कपड़े मिल रहे हैं। खाने के लिए बहुत-सी चीजें मिलती हैं और वो पढ़ सकता है। वो गाँव रहेंगे तो उसे भी उनकी तरह भूखे रहना पड़ेगा। अब बच्चे बड़े हो गये हैं। उसने गाँव के पास कस्बे में तीन कमरों वाला घर खरीद लिया है और माँ-बाप के लिए भी पक्का बढ़िया घर बनवा दिया है सो वह अपनी मेहनत और त्याग के लिए दुखी नहीं होती। बहुत कुछ मिला भी तो है।    रे दादके और नानके गाँव में हैं, गाँव से मेरा रिश्ता
    बहुत गाढ़ा है। बचपन से ही हर छुट्टियों और शादी
    ब्याह में गाँव जाना होता रहता है। सो गाँव से मेरा गहरा लगाव रहा है। लेकिन दस साल से, जबसे शंघाई आये तो भारत जाने के दौरान गाँव जाकर रहना नहीं हुआ।
हम शंघाई आ गये लेकिन शंघाई में रहकर भी गाँवों से लगाव कम नहीं हुआ। जब पहले पहल शंघाई आये तो बिजनेस के सिलसिले में मेरे पति को काफ़ी दूरदराज कस्बों में भी जाना पड़ता था। गाँवों को देखने-जानने की ललक के चलते अनेक बार मैं भी उनके साथ चली जाती थी। सफर के दौरान जहां भी गाँव देखने को मिलता मैं ड्राईवर को टैक्सी रोकने को कहती और बाहर निकल गाँव का सौंदर्य निहारने लगती। हैट पहने हुए खेतों में काम करते लोग, पास में ही खेलते या बड़ों के साथ में ही कुछ पकड़े खेतों में चलते हुए छोटे-छोटे बच्चों को देख कर आश्चर्य-सा होता। तब हम चीनी भाषा बोल नहीं पाते थे सो मुस्कुराहटों का आदान-प्रदान ही कर लेते, लेकिन जब थोड़ा बोलना आ गया तो उनसे बातें करने का उनके बारे में जानने का अवसर भी मिल जाता था।
यह जानकर हैरानी हुई कि तकरीबन सभी गाँवों में कोई नौजवान नज़र नहीं आता, उन्होंने बताया कि अब बस अधेड़ लोग बचे हैं काम करने वाले जो खेती करते हैं और घर भी सम्भालते हैं। ज्यादातर अधेड़ बूढ़े माँ-बाप के साथ-साथ अपने पोते-पोतियों या नाती नातिन को भी पालते हैं। इन बच्चों के माँ-बाप शहर में पैसा कमाने गये हैं।
कहते हैं चीन में जितनी तेजी से शहरों का भौतिक व आर्थिक विकास हुआ उसके पीछे मेहनत गाँव से आये मजदूरों की ही है, जिन्होंने रात-दिन काम करके बड़ी-बड़ी बिÏल्डगें खड़ी कीं और देशभर में सड़कों और पुलों के जाल बिछाए, लेकिन उनके खुद के गाँवों की स्थिति बीसवीं सदी में नहीं बदली।
शहरों में अरबों के शीशमहल बनाने वाले साल में एकाध बार गाँव जाते तो उन्हें वही सदियों पुराना कच्ची सड़कों और कच्चे घरों वाला गाँव ही देखने को मिलता। कहीं किसी गाँव में इक्का दुक्का पक्के घर बन गये थे, जिन्होंने शहरों में अपनों से दूर रह कर जी तोड़ मेहनत करके पैसा कमाया उनका एक ही सपना था अपना पक्का घर बनाना।
 अब जब देहात और शहरी जीवन में अंतर की खायी दिन-ब-दिन चौड़ी होती गयी और पूरे विश्व की नजरों में आने लगी तब देहात व देहातियों को लेकर सरकार की भी चिंता बढ़ गयी। देहात और शहरों में असमानता सिर्फ आर्थिक ही नहीं बल्कि रोजमर्रा सुविधाओं में पढ़ाई के स्तर में भी बहुत ज्यादा है। यह असमानता चीन के पश्चिम क्षेत्र में अधिक है, क्योंकि यहाँ देहाती जीवन खेतीबाड़ी पर अधिक निर्भर करता है, जबकि पूर्व की तरफ व्यापार व टेक्नोलॉजी का प्रभाव अधिक है।
देहात में जिन मूलभूत सुविधाओं कमी नौजवानों को शहरों में धकेल ले गयी वो कमी सालों बाद भी वैसी ही थी। उनकी कड़ी मेहनत से फैक्ट्रियों के निर्यात से मालिकों और देश को खूब मुनाफा हुआ पर उनके देहात को इस मुनाफे से कुछ ज्यादा लाभ नहीं मिला था। पर अब बहुत कुछ बदल रहा है। देहातियों ने जी तोड़ मेहनत से शहरों का रूप बदला अब उनकी बारी है बदलाव की।
मेरी एक मित्र अभी खुश है क्योंकि उसके बूढ़े माँ-पापा शंघाई आने को तैयार नहीं थे और उसका गाँव दूरस्थ पहाड़ी इलाके में है। खाने-पीने का सामान कुछ भी लेना हो तो एक डेढ़ घंटे का कच्चा रस्ता पैदल चलके पास के कस्बे तक जाना पड़ता था। अंडे व मीट के लिए खुद ही मुर्गियाँ व सुअर पालने पड़ते और सब्जियां भी खुद ही उगानी पड़ती जो बुढ़ापे में मुश्किल होता जा रहा था। लेकिन अब गाँव तक पक्की सड़क बन गयी और रोज के सामान की दुकान भी खुल गई है।
यह तो दूरस्थ गाँव की बात थी। एक दूसरे मित्र जिनका गाँव फु चिएन प्रान्त में शहर से बहुत ज्यादा दूर नहीं है वह अपने गाँव में बदलाव से आई खुशहाली से बहुत खुश हैं। वह बताते हैं कि उनके गाँव में अब शहर वाली सब सुविधाएं व सभी सामान जैसे वाशिंग मशीन, माइक्रोवेव, एसी मौजूद हैं और उन्हें खरीदने के लिये लोगों के पास पैसा भी है। बिजली-पानी की कोई दिक्कत नहीं। लोगों के रहने का तरीका बदला है। सभी के पास अपनी गाड़ियाँ हैं। बच्चे पढ़ने के लिए शहरों में जाते हैं पर पढ़ाई पूरी करके वापिस गाँव आकर अपना खुद का व्यवसाय करना चाहते हैं और कुछ तो कर भी रहे हैं। क्योंकि अब इन्टरनेट के जरिये वो गाँव में रहकर भी अपने ग्राहकों से जुड़ सकते हैं। बल्कि इन्टरनेट आने के बाद उसके जरिये वो अपने ग्राहकों तक सीधे पहुंच रहे हैं सो बिचौलिये को देने वाले पैसे भी बचने लगे हैं। दूसरी ओर खेतीबाड़ी में भी साइंस व नई तकनीकों के जरिये बहुत सुधार आया है। पैदावार बढ़ी है। मांग भी बढ़ी है सो किसान अच्छा कमा रहे हैं।
फिर वह मुस्कुराकर कहने लगे हमारी सरकार ने बहुत काम किया है और आम आदमी भी बहुत मेहनतकश है। इसीलिए देश इतना आगे बढ़ा है। सुनकर लगा कहीं तो कुछ है जिसके कारण भारत का देहात अभी भी वहाँ नहीं पहुंच पाया जहां होना चाहिए।
हमारे एक व्यावसायिक मित्र हैं। हर बार हम रुइ आन शहर में उनके ऑफिस में ही जाते थे, लेकिन बार बार फैक्ट्री दिखाने के लिए कहने पर कई साल पहले उनकी फैक्ट्री में जाना हुआ था। रुइ आन शहर के बाहर काफी दूर उनके गाँव के पास ही उनकी फैक्ट्री थी। एक बहुत बड़े हॉल में पचास साठ वर्कर काम कर रहे थे। कमरे में धुंआ, धूल, मिट्टी उड़कर नाक में चढ़ रही थी, ज्यादा देर तक खड़े रहना मुश्किल था, तब समझ में आया कि वह हमें फैक्ट्री में क्यों नहीं ले जाना चाहते थे।
दो साल पहले दोबारा गये तो वहां पांच मंजिला खूब बड़ी चकाचक बिÏल्डग खड़ी थी। आगे बड़ा-सा लॉन हरी घास और फूलों वाले पौधों से सजा हुआ। अंदर गये तो ऊपर जाने के लिए लिफ्ट लगी थी। शीशों के अंदर साफ़ सुथरे कमरों में वर्कर काम कर रहे थे। अंदर गये तो हर कमरे में एसी चल रहे थे। वर्कर भी साफ कपड़ों में काफी अच्छी स्थिति में दिख रहे थे। हमें लगा हमारी हैरानी देख कर वह मुस्कुराये और बताने लगे अब पहले की तरह काम नहीं होता, पैसे आये हैं तो स्थितियाँ भी बदली हैं। देहाती मजदूर भी जागरूक हो गये हैं। फिर देहाती मजदूरों के पक्ष सरकार की नीति भी कठोरता से लागू हुई हैं।
हमारे घर की कामवाली भी स्स छुआन के दूरस्थ गाँव की है। दस साल से हमारे यहाँ काम करती है। वो पन्द्रह साल से शंघाई में रहती है। दस साल पहले देहात की बात होती थी तो यही कहती थी कि गाँव अभी तक वैसे ही हैं जैसे मेरी माँ के बचपन में थे। फर्क इतना है कि हम सब जवान लोग बाहर शहरों में आकर कमाने लगे हैं तो गाँव में भी सभी को भर पेट खाना मिल जाता है नहीं तो वो लोग कई बार भूखे सोये हैं। अब ऐसा नहीं है, वह घर पैसा भेजते हैं तो खेतों के लिए बीज समय पर खरीद लेते हैं सो खेती में सुधार आया है। लेकिन उसके लिए हमें बच्चों से दूर रहना पड़ता है। बच्चे गाँव में माँ के पास रहते हैं। जब भी नये साल पे गाँव जाती तो दुखी लौटती है, क्योंकि बेटा साथ आने के लिए रोता था तो उसे समझाना पड़ता था कि अगर उसके माँ-पापा शहर में काम करते हैं तो उसको सर्दी में पहनने के लिए अच्छे गर्म कपड़े मिल रहे हैं। खाने के लिए बहुत-सी चीजें मिलती हैं और वो पढ़ सकता है। वो गाँव रहेंगे तो उसे भी उनकी तरह भूखे रहना पड़ेगा। अब बच्चे बड़े हो गये हैं। उसने गाँव के पास कस्बे में तीन कमरों वाला घर खरीद लिया है और माँ-बाप के लिए भी पक्का बढ़िया घर बनवा दिया है सो वह अपनी मेहनत और त्याग के लिए दुखी नहीं होती। बहुत कुछ मिला भी तो है।
देहात में जो सबसे बड़ा बदलाव आया वो है महिलाओं का सशक्तिकरण। पीढ़ियों तक देहाती लड़कियों और  महिलाओं को परिवार में सिर्फ काम करने के लिए ही माना जाता रहा है । वो खेतों में काम करें, घर सम्भालें व घर में पाले हुए जानवरों की देखभाल करें। अधिकार के नाम पर उसके पास कुछ नहीं था। साठ सत्तर की उम्र की महिलाएं आज भी मानती हैं कि उनकी स्थिति घर के पालतू जानवर से कुछ अच्छी थी। मर्द के लिए खेतीबाड़ी के बाद शराब पीना, पत्ते खेलना, गाँव चौपाल में बैठकर बातें करना और फिर घर आकर खाना खाकर सो जाना या पत्नी पे हाथ उठाना। उसके जिम्मे यही काम था। औरत के लिए कहा जाता था कि उनका मुंह धरती की तरफ ओर पीठ आसमान की तरफ रहनी चाहिए अर्थात खेतों में झुकी हुई पीठ से काम करती रहें। लड़की पढ़ भी नहीं सकती थी यह अधिकार भी लडकों का था। माओत्ज़ तोंग के "महिलाएं आधे आसमान की हकदार हैं" नारे के बावजूद यह आसमान शहरी महिलाओं के हिस्से ही आया लेकिन दो दशकों से स्थिति बदली है सो धीरे धीरे देहाती महिलाएं भी अपना आसमान ले रही हैं।
जहां एक दशक पहले देहात में बच्चों के सपने शहर जाकर कुछ काम करके पेट भरने के लिए पैसे कमाने के होते थे वहीं अब लड़कों के संग लड़कियाँ भी किसी अच्छी यूनिवर्सिटी में पढ़के कुछ बनने के सपने देखने लगीं हैं। देहाती जीवन का यह बड़ा बदलाव है। देहाती अब देहात में बैठकर भी अन्जान नहीं रहे हैं

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