ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
रॉनी
01-Nov-2016 12:00 AM 3924     

इधर कुछ दिनों से स्टाफ़-रूम में बैठकर चाय पीना मेरे लिए एक सज़ा से कम नहीं था। दूसरी टीचर्स की बातों में छिपा व्यंग्य और कटाक्ष मुझे अक्सर ही झेलना पड़ता था। रॉनी के बारे में मि. ह्यूबर्ट के किए गए कमेंट्स, "माई गॉड, यह लडक़ा! सज़ा का भी इस पर असर नहीं है।" या "स्पेयर द रॉड..." यह सब क्यों? बस, सिर्फ़ इसलिए कि मैंने रॉनी को क्लास-रूम में बुलाकर समझाने की कोशिश क्यों की और पूछा था कि क्या उसे चोट लगी है? दूसरी टीचर्स की निगाह में या तो यह नया-नया जोश था या फिर अपने को दूसरों से ऊँचा और अलग दिखाने का दंभ भरा प्रयास।
एक दिन लिज़ ने मुझे समझाने की कोशिश की। कहा, "मिस रीमा, आप यूनिवर्सिटी से डिग्री लेकर अभी नई-नई आई हैं। चार दिनों बाद सब असलियत समझ में आ जाएगी। तब यह जोश ठंडा पड़ जाएगा।"
और सैली भी छूटते ही बोली, "और क्या, मिस रीमा! यह इनर सिटी का स्कूल है। जब यहाँ के बच्चों से डील करना पड़ेगा तब आपको पता चलेगा। मिस्टर ह्यूबर्ट को इन बच्चों को पढ़ाने का बहुत एक्सपीरिएंस है। रॉनी जैसे बच्चों से डील करना उन्हें मालूम है।"
मैं क्या बोलती? अधिकतर तो मैं उन सबकी बातें चुपचाप सुन लेती थी; किंतु आज मेरा जी तिलमिला उठा। मन में आया, कह दूँ तुम सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हो। सबका एक ही रंग है। नहीं तो आज तक रॉनी के लिए किसी ने तो न्याय की माँग की होती। किंतु समय की नज़ाकत को समझते हुए मैं किसी से मिलने का बहाना बनकर वहाँ से चुपचाप उठ गई।  
रॉनी की माँ सिंथिया ब्रिटेन आने से पहले सेंट किट्ज़ द्वीप में रहती थी। वहीं उसकी मुलाकात फ्रैंक से हुई थी। फ्रैंक वेल्स से सेंट किट्ज घूमने गया था, और वहीं "बीच" पर उन दोनों की मुलाकात धीरे-धीरे एक तरह की मित्रता में बदल गई। आते समय तक रॉनी अपने वज़ूद का एहसास करा चुका था। सिंथिया सब कुछ छोडक़र फ्रैंक के साथ इंग्लैंड आने को तैयार थी।
उसने फ्रैंक से कहा, "फ्रैंक, मैं तुम्हारे साथ चलूँगी। मैं अब यहाँ अकेले नहीं रह सकती।"
फ्रैंक ने उसे समझाते हुए कहा, "सिंथिया, मेरे लिए भी तुम्हें अकेले छोड़कर जाना आसान नहीं है; पर मैं वहाँ जाकर, अपने माँ-बाप को समझाकर सब इंतज़ाम करने के बाद ही तुमको बुला लूँगा।
"फ्रैंक उसे अपना झूठा पता देकर वेल्स वापस आ गया और अपने पिता के पब में हाथ बँटाने लगा। वह सिंथिया का नाम भी भूल गया। कुछ महीने इंतज़ार करने के बाद, जब पत्रों के जवाब भी नहीं आए तब सिंथिया के पास जो भी जमा-पूँजी थी, सब एक एजेंट को देकर वह किसी तरह इंग्लैंड आ गई। आते समय माँ ने उसे अपनी दूर के रिश्ते की एक बहन का पता दिया था और कहा था, "मुसीबत के समय आंटी लीना के पास जाना।"
यहाँ आकर भी उसकी मुसीबतों का कोई अंत नहीं था। फ्रैंक का गलत पता लिये वह कहाँ-कहाँ नहीं भटकी थी। बचे-बचाए पैसे भी धीरे-धीरे खत्म हो रहे थे। फिर पता लगाकर वह आंटी लीना के पास चली गई। तीन महीने बाद उसने कौंसिल फ़्लैट के लिए अर्जी दे दी। काफ़ी दौड़-भाग के बाद उसे टॉवर ब्लॉक में फ़्लैट मिल गया।
इतने दिनों पश्चात् पहली बार अपने घर में रहने के एहसास से सिंथिया और रॉनी दोनों के चेहरों पर सुख और सुकून की अपूर्व आभा फैल गई। घर में पड़ी टूटी-फूटी चीज़ें भी रॉनी को अमूल्य लगीं। वह कभी उन्हें सँभालता, कभी इधर-उधर रखता व्यस्त हो गया। सिगरेट के ख़ाली डिब्बे, बियर के पिचके हुए टिन, पन्नियां, चिप्स के ख़ाली पेपर्स, सूखे मुरझाए पौधे गमलों में लुढ़के पड़े थे। सभी को उठा कर देखता, इधर-उधर रखता।
सहसा उसके मन में एक विचार उठा। वह दौड़कर गया और एक गिलास में पानी लाकर पौधों की जड़ों में डाल दिया। उसने सोचा, अगर ये हरे हो गए तो मम्मी को सरप्राइज दूँगा। वह उठा और पौधों को सीढ़ी के नीचे रख दिया। दूसरे दिन वह बड़े सबेरे उठा और लहलहाते पौधों को देखकर बेहद खुश हुआ। अब फूल आने पर माँ को बताऊँगा। इनर सिटी के इस इलाके में बेरोज़गारी, जुर्म, ड्रग्स और उससे जुड़े तमाम अपराधों के बीच पल-बढ़ रहे बच्चों की समस्या यहीं नहीं खत्म होती। बहुत से बच्चे माँ-बाप में से एक ही को जानते थे या फिर साथ रहते तो भी घर की परिभाषा उन पर सटीक नहीं बैठती थी। लड़ाई-झगड़ा, मार-पीट, प्यार का अभाव तथा लापरवाही बच्चों के हिस्से में पड़ती थी। ऐसे ही घरों के बच्चों में रॉनी भी एक था। सिंथिया रॉनी का हर तरह से खयाल रखती; पर उसे क्या मालूम था कि बच्चे की एक छोटी सी मासूम इच्छा दोनों के लिए क़यामत बन जाएगी और पुलिस उसे बिना अपराध के पकड़कर जेल में डाल देगी। एक रात पुलिस ने छापा मारा और सिंथिया के रोने-गिड़गिड़ाने के बावजूद पौधों में हेरोइन होने का आरोप लगाकर उसे पकड़कर ले गई। सिंथिया "माई सन, माई सन" कहती जा रही थी। "वी केम ओनली टू डेज़ बिफोर... प्लीज़। इट्स नॉट माई प्लांट... आई डोंट नो नथिंग..." रॉनी फॉस्टर पेरेंट्स के पास रहने लगा। माँ जेल में, पिता का पता नहीं। असुरक्षा की भावना जिसे रॉनी खुद ही नहीं सँभाल पा रहा था। रॉनी सोशल वर्कर और फॉस्टर पेरेंट्स के बीच एक घर से दूसरे घर भटकता। घर बदलने के साथ-साथ रॉनी का भाग्य भी बदलता। मि. ह्यूबर्ट रॉनी के क्लास टीचर थे। छह फुटे मि. ह्यूबर्ट बड़े ही रोब-दाबवाले थे। उनकी रगों में शुद्ध एंग्लो-सैक्सन खून बहता था और वह शुद्ध अंग्रेज़ी या जिसे "क्वींज इंग्लिश" कहते हैं, बोलते थे क्लास में कोट-टाई- हैट पहनकर आते और टाई की नॉट हमेशा हिला-हिलाकर कसते रहते, जैसे सारी खुदाई को अपने वश में रखना चाहते हों! बड़ी ही सतर्क निगाहों से चारों तरफ़ देखते रहते गरज कि उनकी निगाह से कोई गलत काम छिपा न रह जाए। निगाह का यह पैनापन कभी स्वयं अपनी तरफ नहीं किया, यह उनके चारों तरफ घूमती थी। रक्त एवं भाषा की शुद्धता से वह अपने को सबसे ऊपर समझते थे। रॉनी जैसे ब्रोकेन अंग्रेज़ी बोलनेवालों को बड़ी ही नीची निगाह से देखते थे। उन्हें रॉनी की आँखों में एक चुनौती भरी अवज्ञा दिखाई पड़ती थी, जो कि वास्तव में रॉनी के दिल में भरे हुए तूफ़ान का अक्स थी लेकिन मि. ह्यूबर्ट ने उसे अपने लिए एक चुनौती मान उससे एक तरह की दुश्मनी ठान ली थी। जब-तब स्टाफ-रूम में उसकी शरारतों का ब्योरा लेकर बैठ जाते और खूब बढ़ा-चढ़ाकर उसकी गलतियों का जिक्र करते। उसमें रॉनी के लिए ज़हर भरा रहता। लेकिन यह सब तो हर दिन ही होता था। रॉनी के बारे में हर टीचर को पहले ही बता दिया जाता था। ताकीद होती थी। निगाह रखना, ज़रूरत पड़ने पर तो सख्त-से-सख्त सज़ा भी मना नहीं थी। मुझे आगाह किया गया था; पर प्रोबेशनरी टीचर होने के नाते बिना ज़्यादा कहे सब कुछ बता दिया गया था और सावधानी बरतने को कहा गया था। लेकिन मेरी भी अपनी सीमाएँ थीं, साथ ही कुछ अपेक्षाएँ थीं। टीचर्स का कहना था कि रॉनी के लिए यही एक रास्ता है। रॉनी को बिना कसूर भी मार पड़ते मैंने देखा है। और उसकी  सफ़ेद कौड़ियों-सी आँखों में बेबस दर्द उभर आया था। रॉनी का दुर्भाग्य कि बच्चे भी उसे नीची निगाह से देखते थे। उसे बैठना होता था सलीम और रहीम के साथ, जो उसे बिलकुल पसंद नहीं करते थे; बल्कि "साले अफ्रीकन" जैसी गाली देते।
एक दिन रहीम बोला, "सलीम, मेरे अब्बा कहते हैंं सिद्दी न, मतलब काले सारे-के-सारे चोर होते हैं। साले दुकान से स्वीट चुरा ले जाते हैं।" सुनते ही रॉनी का चेहरा तमतमा गया और रहीम की कॉपी खींचकर वह उसे धक्का देते हुए भाग गया। सात साल का रॉनी एक मिनट भी शांत नहीं बैठता था। हमेशा कुछ-न-कुछ शरारत कागज फाड़ना, किताबें गंदी करना, टीचर की आँख बचाकर पास के बच्चे की कॉपी खींच लेना और फिर मार खाना। मिस्टर ह्यूबर्ट रॉनी की ग़लतियों को लिए कड़ी सज़ा देना अपनी शान समझते, मारते भी ख़ूब। कोशिश रहती कि चोट बाहर से दिखाई न पड़े। और उस दिन तो क़यामत ही आ गई। लंच से पहले की आई.टी. क्लास में कुछ बच्चे कागज़ के हवाई जहाज़ बनाकर एक-दूसरे पर फेंक रहे थे। उसी समय मि. ह्यूबर्ट अचानक क्लास में वापस आकर अपनी टेबल पर बैठे ही थे कि एक हवाई जहाज़ उनकी टेबल पर आकर गिरा।
"किसने फेंका? किसकी बदमाशी है?" सख्त निगाहों से उन्होंने लड़कों की तरफ देखा और गरजे, "इधर आओ!" और अनायास ही सब बच्चों की निगाहें रॉनी की तरफ़ घूम गईं।
मि. ह्यूबर्ट अपनी कुरसी से उठे और धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे। रॉनी काँप उठा और आँखें बंद कर झट से सीने पर क्रॉस बनाने लगा। उसे याद आया माँ कहती थीं, "गॉड सच्चे दिल से याद करने पर बेगुनाह को सज़ा नहीं देता।" रॉनी धीरे-धीरे बुदबुदाता रहा, "मैंने तो कुछ नहीं किया है। मैंने तो... गॉड, मैं तो, मैं तो... अच्छा बनना चाहता हूँ। मुझे बचा लो।"
मि. ह्यूबर्ट चिल्लाए, "हाथ आगे करो!" सटाक्!  सटाक्!
वह अस्फुट स्वर में सिसकता हुआ बोला, "ममा, मैंने इस बार गॉड से कितना कहा! लेकिन ममा, मैं जानता हूँ, तुमने भी तो कुछ नहीं किया था, फिर वे तुम्हें क्यों जेल ले गए?" रॉनी के अंदर भी चट-चट कुछ टूट गया। लंच-ब्रेक में रॉनी आँसू पोंछता हुआ बाहर आया। कौन पूछता रॉनी से। बस आँसू पोंछ वह अपने को तैयार कर लेता किसी और हादसे के लिए। उस दिन घर आते समय रॉनी, तालाब के किनारे एक फिशिंग टेबुल पड़ी थी, उसी पर बैठ गया। बतखों के छोटे बच्चे चारों तरफ से बतख को घेर कर तैर रहे थे, बतख उन्हें कीड़े- मकौड़े खिलाती जाती थी। रॉनी उठा, पत्थर मार-मारकर उसने सारी बतखों को भगा दिया।
यह इतनी खुश क्यों है? आज यह खूब चिल्लाएगी - कहकर पत्थरों की बौछार करना फिर शुरू किया। टेबुल को जोर से किक किया, वह चीं-चीं करती दूर जा गिरी। यू ऑल गो टू हेल कहता हुआ चला गया।
घर पहुँचकर रॉनी ने अपना बस्ता एक तरफ डाल दिया। थोड़ी देर इधर-उधर करता रहा, फिर अपनी फॉस्टर माँ मिसेज़ विल्सन के पुकारने पर बड़े ही बेमन से खाना खाकर टी.वी. देखने बैठा।
प्रोग्राम खत्म होने से पहले ही टी.वी. बंद कर दिया और उठकर अपने कमरे में जाकर पेंसिल से कुछ लिखने बैठा तो लगा, हथेली में दर्द हो रहा है। उसे लगा, जैसे सलीम हँस रहा है। वह सोचने लगा, मैं तो पीछे बैठता हूँ। और यह सलीम खुद क्या है?ै
मुझे कभी निगर, कभी ब्लैकी या सिद्दी कहता है; वह भी तो पाकी है। लेकिन उसकी माँ रोज़ आती है उसको लेने, लेकिन मेरी माँ... ममा, तुम कहाँ हो?
तुम्हें वे जेल क्यों ले गए? ममा, ये लड़के मुझे चारों तरफ से घेरकर खड़े हो जाते हैं। मुझे बहुत डर लगता है। ममा, मेरे पैर काँपने लगते हैं। मैं तो भाग भी नहीं पाता, ममा! रहीम मेरी बाजू को दबा-दबाकर नाखून से खरोंच लगा देता है। कभी मेरे बालों को खींचता है।
क्यों ममा, मैं तुम्हारे पास रहूँगा तो कोई मुझे नहीं सताएगा? मैं काला हूँ तो क्या, मैं इन सबसे तेज़ दौड़ता हूँ। आएँ मेरे साथ रेस करें, मैं आगे निकलकर न दिखा दूँ तो कहें। मेरा रंग काला है न! गॉड मुझे... नहीं-नहीं, मैं कल मिसेज़ विल्सन का पाउडर लगाकर आऊँगा। खूब सफेद; तब मि. ह्यूबर्ट शायद गुस्सा न हों। मि. ह्यूबर्ट तो पेंसिल छीनकर मेरी उँगलियों को मरोड़ देते हैं। चोट लगती है, ममा। तुमको कैसे बताऊँ? मि. ह्यूबर्ट, मैं जो भी लिखता हूँ उसे फाड़कर पैरों से कुचल देते हैं।
कल मैंने धीरे से कहा था, "फूल"। मि. ह्यूबर्ट ने मेरे बाल खींच लिये। गुस्से में मैंने भी अपने बाल नोच लिये थे।
ममा, मेरा मन यहाँ नहीं लगता। मैं क्या करूँ? मैं भी तुम्हारे पास जेल में आना चाहता हूँ। ममा, वे तुम्हें क्यों ले गए? अच्छा ममा, तुम कब आओगी? कभी-कभी जब मिस रीमा मेरे पास खड़ी होती हैं, मुझे लगता है, ममा, तुम खड़ी हो। मिस रीमा, मैं अब चुपचाप रो लूँगा। मि. ह्यूबर्ट गुस्सा करेंगे, तब भी। मुझे तुम ममा जैसी लगती हो। मैं तो अब खूब पढ़ूँगा।
यह सब ऐसे ही चल रहा था। मेरे मन के किसी कोने में एक दर्द-सा था रॉनी के लिए एमाँ जेल में, बाप का पता नहीं। जिस दिन रॉनी की शिकायत घर जाती, फॉस्टर पेरेंट्स उसे ग्राउंडेड करते। उसे खेलने के समय काम करना पड़ता, टी.वी. नहीं देख सकेगा वगैरह।
मैंने निश्चय किया कि ट्रेनिंग के समय पढ़ी रोजर की "प्राइजिंग थ्योरी" का प्रयोग करूँ। शायद कुछ असर रॉनी पर हो।
कई बार ऐसा होता है, मैं बैठे-बैठे सोचती रहती हूँ; फिर किसी काम में मेरा मन ही नहीं लगता। एक अपराध-बोध अंदर-ही-अंदर मुझे झुलसाता।
क्या रॉनी की ही तरह मेरे बच्चे को भी टीचर ने समझा था कि यह स्वर्ग है। यहाँ कहीं भी अन्याय नहीं।
मैं सोचती थी कि यहाँ की सड़कें ही नहीं, लोगों के मन भी साफ हैं। लेकिन आज लगा, सड़कें तो साफ हैं, लेकिन मन...। मुझे आश्चर्य होता, शिक्षक, जो ज्ञान और न्याय की मूर्ति हैं, उनका ऐसा ओछा व्यवहार? जब कभी मेरे बच्चे ने स्कूल में हुई कोई दुर्घटना बताई, मैंने उसे हमेशा यही कहा, "तुम अपनी टीचर की इज़्ज़त करो।" या बच्चे अगर उसे सताते थे तो कहती थी कि जाने दो, वे खुद ही चुप हो जाएँगे। काले बच्चों का क्या हश्र होता है, यह मुझे आज महसूस हो रहा है।
सोमवार को जब मैं स्कूल गई तो हेड टीचर ने कहा, "मिस रीमा, आज आप मि. ह्यूबर्ट की क्लास भी ले लें। वे बीमार हैं। सप्लाई टीचर भी नहीं मिल सकी।"
मैंने कहा, "ठीक है।"
मेरा स्कूल ओपन प्लान था, मुझे कुछ अच्छा ही लगा। हेड टीचर जाते-जाते कह गईं, "मिस रीमा, रॉनी पर निगाह रखिएगा।"
रजिस्टर लेने के बाद मैंने बच्चों को वर्क-शीट दी और खुद जाकर उनका काम देखने लगी। रॉनी की मेज़ के नजदीक आने पर मैं खड़ी हो गई। रॉनी चुपचाप बैठा था। उसने अभी कुछ काम शुरू नहीं किया था। मैंने रॉनी को पुकारा। मेरी आवाज़ सुनकर वह थोड़ा सा घबराया, फिर मेरी तरफ देखकर बोला, "यस मिस रीमा।"
उसकी घबराहट देख मेरा मन करुणा से भर गया मैं उसके पास बैठ गई और सोचा, रॉनी से पूछूँ कि उसने अभी तक काम क्यों नहीं शुरू किया है? उसे पेंसिल हाथ में देते हुए मैंने कहा, "रॉनी, कागज़ पर अपना नाम लिखो।"
रॉनी का हाथ काँपने लगा। उससे कुछ लिखा नहीं जा रहा था। ध्यान से देखने पर लगा, उसका चेहरा लाल था। फिर मैंने उसके माथे पर हाथ रखा, वह भी उसी तरह तप रहा था।
मैंने कहा, "रॉनी, क्या बात है?"
रॉनी बुदबुदाया, "आई डोंट नो, मिस।"
मेरा स्नेहिल स्पर्श उसे कहीं गहरे तक छू गया।
मैंने कहा, "रॉनी, मैं तुम्हें घर भेज दूँ! तुम घर जाकर सो जाना। तुम्हें तो तेज़ बुखार है। रॉनी हथेली में मुँह छिपाकर रोने लगा, "ममा, ममा!" और उसकी हिचकी बँध गई। जब वह शांत हुआ तो मैंने पूछा, "रॉनी, तुम घर क्यों नहीं जाना चाहते?"
वह बोला, "मिस रीमा, मेरी ममा जेल में हैं। मिसेज़ विल्सन घर जाने पर नाराज़ होंगी, शाम को टी.वी. नहीं देखने देंगी।"
क्लास के दूसरे बच्चे थोड़ा अशांत हो रहे थेे। टीचर रॉनी से इतनी बातें क्यों कर रही है?
एक लड़की मुझसे बोली, "मिस रीमा, मि. ह्यूबर्ट तो रॉनी से कभी बात नहीं करते। यह हमेशा डाँट खाता है।"
मैंने "चुप रहो" कहकर घुड़कती निगाहों से उसे देखा। रॉनी का हाथ पकड़कर कहा, "मेरे साथ आओ।" वह बेहद घबरा गया। मैंने उसे समझाते हुए कहा, "तुम रेस्ट-रूम में आराम कर लो। मैं तुम्हें घर नहीं भेजूँगी।"
रॉनी के लिए इतनी चिंता कभी किसी ने नहीं की थी। रॉनी के चेहरे पर आश्वस्ति का भाव देख रोजर की प्राइजिंग थ्योरी की उपयोगिता समझ में आ गई। यदि बच्चा अपराध करके सज़ा से बच जाय तो उसे स्वयं अपनी गलती का एहसास होता है; किंतु बिना अपराध के सज़ा बच्चे के लिए डेथ ऐट ऐन अर्ली एज है।
मेरे आने के बाद रॉनी बिस्तर पर इधर-उधर करवटें बदलता रहा। "मुझे मिस रीमा अच्छी लगती हैं। ममा, जब तुम लौटकर आओगी तो मैं तुम्हें मिस रीमा से मिलवाऊँगा। तुम भी तो मुझे आराम करने को कहती थीं, जब मेरी तबीयत खराब होती थी। मेरे पास तीस कंचे थे, सब रहीम ने छीन लिये। ममा तो दूसरे खरीद देती थीं; लेकिन मिस रीमा, तुम मेरे कंचे दिलवा देना। मि. ह्यूबर्ट तो बस गुस्सा करते थे। मिस रीमा तो प्यार करती हैं और गुस्सा भी नहीं करतीं। मैं तो अपनी फिंगर क्रॉस करके रखूँगा, मि. ह्यूबर्ट कभी न आएँ। मैं मिस विल्सन से भी नहीं कहूँगा मिस रीमा के बारे में। मैं जानता हूँ, मिस विल्सन तो मि. ह्यूबर्ट की फ्रेंड हैं। वो भी मुझे डाँटती रहती हैं। मिस रीमा, मैं तुम्हारे लिए कल एक फूल लाऊँगा।"
रॉनी को हेल्प करने की मेरी तमाम कोशिशें एक हादसे में बदल गईं। तीन बजे जब रॉनी की फॉस्टर माँ उसे लेने आई तो उसे कुछ अच्छा नहीं लगा, "एक काले लड़के की हिमायत करना।" रॉनी तो खराब है ही, वह कभी भी अच्छा नहीं बन सकता। इसी आधार पर उसके प्रति सबका व्यवहार क्रूर बन गया। मि. ह्यूबर्ट कुछ दिनों बाद स्वस्थ होकर लौट आए। साथ ही लौट आया रॉनी का दुर्भाग्य भी। उसके बाद से रॉनी हर दिन लंच में बाहर जाते वक्त मेरी क्लास के दरवाज़े पर एक पल को रुकता, मेरी तरफ देखता और फिर चला जाता। यही क्रम चलता रहा। कभी उसकी लाल आँखें, कभी उदास चेहरा; लेकिन उस एक क्षण में उसकी आँखों में चमक कौंध जाती।
आज फिर लंच ब्रेक में रॉनी दिखा। हथेली में ढँका सिसकता हुआ चेहरा। मुझे लगा, बाएँ पैर से लँगड़ाकर चल रहा है। मैंने सोचा, कुछ हुआ होगा। स्कूल में क्रिसमस की तैयारी शुरू हो गई थी,मैं भी उसी में व्यस्त हो गई थी। बच्चों से कार्ड बनवाने के लिए मुझे कुछ सामान स्ट्रांग रूम से लाना था। क्लास-रूम हेल्पर ब्रश वगैरह साफ कर रही थी। मैंने उससे कहा, "एंजला, मैं जरा स्ट्रांग-रूम तक जा रही हूँ, बच्चों को देखना।"
मैं अभी स्ट्रांग-रूम के दरवाज़े तक ही पहुँची थी के अंदर से आती तेज़ आवाज़ सुनकर ठिठक गई। मि. ह्यूबर्ट किसी को धमका रहे थे, "अगर तुमने स्कूल या घर पर किसी से कुछ भी कहा तो मैं हेड मास्टर को बता दूँगा कि तुम स्ट्रांग-रूम में चोरी करने आए थे। और फिर हेड मास्टर तुम्हें स्कूल से निकाल देंगे! तुम्हें खेलते में चोट लगी है, समझे। चलो, निकलो यहाँ से!" कहते हुए उसे कमरे के बाहर ढकेल दिया।
रॉनी धक्के को सँभाल नहीं पाया और फर्श पर लुढक़ गया। वह जल्दी से एक हाथ से अपनी पैंट पकड़ते हुए उठा, दूसरे हाथ से आँसू पोंछे और घिसटता हुआ एक तरफ चला गया। सबकुछ देख-सुन कर मैं सकते में आ गई। तो बेचारा रॉनी किसी से शिकायत भी नहीं कर सकता? खैर, उसकी शिकायत सुनता ही कौन? बस, अब मैं क्या करूँ, छोड़ दूँ इस बेगुनाह बच्चे को किसी की वहशियाना तबीयत का शिकार बनने के लिए या आगे बढ़ूँ? मन में एक तरफ अपना कैरियर, दूसरी तरफ़ इंसाफ का तकाज़ा।
इसी समय दरवाज़ा खुला और "ब्लडी निग" कहकर पैंट की जिप बंद करते हुए मि. ह्यूबर्ट बाहर निकले। अब उनके चौंकने की बारी थी। बोले, "सारे काले चोर होते हैं।"
मैं चुपचाप वहाँ से चली आई। मेरा मन फिर कुछ भी करने में नहीं लगा। मैं प्रोबेशनरी टीचर हूँ। मेरी बात अगर कोई माने भी तो उससे क्या होगा? क्या रॉनी को कुछ मिलेगा? मान लो, न्याय मिल भी जाय, तो क्या प्यार मिलेगा? यदि मेरा प्रोबेशन न पूरा होगा तो क्या होगा? मेरा तो कैरियर ही खत्म हो जाएगा। इसी उलझन में कुछ तय नहीं कर पा रही थी। एक तरफ मेरा कैरियर तो दूसरी तरफ रॉनी की उदास-सूनी आँखों से बहते आँसू, जिन्हें वह अपनी हथेलियों से पोंछता रहता था। छोड़ दूँ उसे अपने आँसू खुद ही पोंछने के लिए और सबकुछ निगल जाऊँ। यह सब कोरी भावुकता है। लेकिन मेरा मन काँप उठता था। मैंने एक निश्चय किया और इस्तीफा लिखकर अपने पर्स में रख लिया। दूसरे हफ्ते स्कूल जाने पर कुछ हलचल का आभास हुआ। रॉनी की फॉस्टर मदर सोशल वर्कर के साथ स्कूल आई थी। हेड टीचर मेरी तलाश में थी।
कॉरीडोर में मिलते ही धीरे से पूछा, "मिस रीमा, क्या आपको कुछ मालूम है, फ्राइडे को रॉनी के साथ क्या हुआ था?"
"क्यों, क्या बात है? रॉनी कहाँ है?" मैंने कुछ भाँपते हुए पूछा।
वह बोली, "रॉनी आज स्कूल नहीं आया है।" बातें करते-करते वह मुझे अपने ऑफिस में ले गईं और कहा, "सोशल वर्कर और रॉनी की फॉस्टर मदर आई हैं। रॉनी को गहरी चोट आई है। सोशल वर्कर ने केस अपने हाथ में ले लिया है और पता कर रही है कि रॉनी को चोट कैसे आई है। रॉनी डिलिरियम में है और बार-बार आपका नाम ले रहा है।" मैं समझ गई, मुझे अब क्या करना है। मैंने अपनी सारी हिम्मत जुटाकर कहा, "हाँ, मैं फ्राइडे को स्ट्रांग रूम में कुछ सामान लेने गई थी; पर अंदर से आती गुस्से और धमकी भरी आवाज़ सुनकर वहीं रुक गई। मैंने अपने कानों से सब कुछ खुद सुना है और मुझे रॉनी के लिए गवाही देने में कोई हिचक नहीं होगी।" और उस दिन की सारी घटना उन्हें बता दी। उसके बाद मेरा मन एक अजीब उदास सुकून से भर गया। मैं क्लास रूम में आकर कुरसी पर बैठ गई। बच्चे शोर कर रहे थे। सोचा, उन्हें काम देकर शांत कर दूँ। उठी, ड्रॉर में से वर्कशीट निकालकर उन्हें दिया और समझाने लगी कि उन्हे क्या करना है। वे चुपचाप शांत हो काम करने लगे।
मैंने रजिस्टर निकाला, बच्चों के नाम पुकारने लगी। रॉनी का नाम आते ही एक पल को चुप हो गई।
बच्चों ने कहा- "मिस, रॉनी नहीं आया है।" मैंने रजिस्टर का पेज पलटा। सामने एक छोटा लिफाफा पड़ा था। मैंने खोला, देखा, लिखा था- "मिस रीमा, आई लव यू।"

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