ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
नदी के द्वीप
01-Sep-2016 12:00 AM 4391     

हम नदी के द्वीप हैं।
हम नहीं कहते कि हमको छोड़ कर स्रोतस्विन बह जाय।
वह हमें आकार देती है।
हमारे कोण, गलियां, अन्तरीप, उभार, सैकत-कूल,
सब गोलाइयां उसकी गढ़ी हैं।
 
मां है वह। है, इसी से हम बने हैं।

किन्तु हम हैं द्वीप। हम धारा नहीं हैं।
स्थिर समर्पण है हमारा। हम सदा से द्वीप हैं स्रोतस्विनी के
किन्तु हम बहते नहीं हैं। क्योंकि बहना रेत होना है।
हम बहेंगे तो रहेंगे ही नहीं।
पैर उखड़ेंगे। प्लवन होगा। ढहेंगे। सहेंगे। बह जायेंगे।
 
और फ़िर हम चूर्ण हो कर भी कभी क्या धार बन सकते?
रेत बनकर हम सलिल को तनिक गंदला ही करेंगे-
अनुपयोगी ही बनायेंगे।
 
द्वीप हैं हम। यह नहीं है शाप। यह अपनी नियति है।
हम नदी के पुत्र हैं। बैठे नदी के क्रोड में।
वह वृहद् भूखण्ड से हम को मिलाती है।
और वह भूखण्ड अपना पितर है।
 
नदी, तुम बहती चलो।
 
भूखण्ड से जो दाय हमको मिला है, मिलता रहा है,
मांजती, संस्कार देती चलो। यदि ऐसा कभी होे
तुम्हारे आह्लाद से या दूसरों के किसी स्वैराचार से, अतिचार,
तुम बढ़ो, प्लावन तुम्हारा घरघराता उठे -
यह स्रोतस्विनी ही कर्मनाशा कीर्तिनाशा घोर काल-प्रवाहिनी बन जाय-
तो हमें स्वीकार है वह भी। उसी में रेत होकर
फ़िर छनेंगे हम। जमेंगे हम। कहीं फ़िर पैर टेकेंगे।
कहीं भी खड़ा होगा नये व्यक्तित्व का आकार।
मातः, उसे फ़िर संस्कार तुम देना।

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