btn_subscribeCC_LG.gif btn_buynowCC_LG.gif

आधुनिक हिंदी सिनेमा की प्रासंगिकता
01-May-2017 01:52 PM 2739     

पहली बोलती फिल्म "आलमआरा" से लेकर अब तक, हिंदी सिनेमा एक बहुत लम्बा सफ़र तय कर चुका है। अच्छी बात यह है कि यह यात्रा केवल इसे बनाने की तकनीक में परिवर्तन तक ही सीमित नहीं है बल्कि सिनेमा बनाने के पीछे की सोच में भी तेज़ी से परिवर्तन आया है। आधुनिक सिनेमा सच्चे अर्थों में समाज का दर्पण बन चुका है जो अपने मुख्य उद्देश्य मनोरंजन तक ही सीमित नहीं है बल्कि समाज व आम आदमी की बुलंद आवाज़ बनकर उभरा है। फिर चाहे वह अंधविश्वास, धर्म, भ्रष्टाचार, आतंकवाद या समलैंगिकता जैसा कोई भी मुद्दा हो। आज की फ़िल्में हर मसले को निर्भीकता से खुलकर सामने रखती हैं। आज के सिनेमा में विचारशीलता है, गतिशीलता है, सामाजिक व्यवस्थाओं से आम आदमी को लड़ने की शक्ति प्रदान करने की चाह है। कई आधुनिक फ़िल्में किसी राजनीतिक व्यवस्था या समाज के शक्तिशाली तबके पर निर्भर रहने की बजाय एक आदमी को आत्मनिर्भर होकर अपनी सब समस्याओं से लड़ने का हौसला देती हैं। उसे अपनी इच्छानुसार सिर उठाकर, स्वतंत्रता से जीने का सबक सिखाती हैं।
आधुनिक फ़िल्में बेहिचक और बिना संकोच आम आदमी की मनोवैज्ञानिकता के दरवाज़े खटखटाती हैं। इसीलिए ऐसी फ़िल्में बेहद पसंद की जाती हैं जो सच्चाई को बेपरवाह, बेखटके सबके सामने लाती हैं और साधारण व्यक्ति के दिल में घुसकर उसे सोचने-समझने पर मजबूर कर देती हैं। आज के दौर में कई ऐसी फ़िल्में बनी हैं तथा बन रही हैं जिनका आधार या लक्ष्य आम आदमी को जागरूक करना है। इस समय, मैं आपके सामने आज के दौर की दो फिल्मों के नाम रख रही हूँ और वे हैं - "पीके" और "अ वेडनेस्डे"। इनके नाम पढ़ते ही आपके मस्तिष्क में तुरंत ये विचार आया होगा कि हाँ, ये दोनों ही फ़िल्में आम आदमी को झिंझोड़ती हैं। लेकिन क्यों? क्या आपने कभी सोचा है कि इन दोनों ही फिल्मों में ऐसी क्या समानता है? शायद आपका उत्तर होगा कि ये दोनों ही अलग-अलग पृष्ठभूमि पर रची गई हैं और इनमें कोई समानता नहीं है। "अ वेडनेस्डे" जहाँ आतंकवाद सरकार, संविधान और क़ानून व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाती है वहीं "पीके" का संबंध अंधविश्वासों व धर्म के नाम पर ढोंगी स्वामियों से है जो आदमी को अकर्मण्य तथा असंवेदनशील बनाकर हमारे समाज की जड़ों को खोखला कर रहे हैं।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इन दोनों ही फिल्मों की आधारशिला एक ही है और वह है "भय"। यह भय ही है जो इन दोनों फिल्मों को आपस में जोड़ता है। एक ऐसा "शब्द" जो केवल एक शब्द नहीं है बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में किसी न किसी रूप में अपना डेरा डाले हुए है। अँधेरे का डर, ऊँचाई का डर, पानी का डर या बंद जगहों का डर, इन फिल्मों ने इस भय की जनसाधारण की पहुँच को न ही केवल पहचाना है बल्कि इसका पूरा फायदा उठाकर आम इंसान को अपना मन टटोलने पर विवश कर दिया है।
"पीके" फिल्म बहुत खूबसूरती से व मनोरंजक ढंग से आदमी के हृदय में गहराया हुआ अपनी असफलताओं और कमजोरियों का डर दर्शाती है। यह फिल्म बताती है कि कैसे यह डर मनुष्य को भगवान पर या ढोंगी साधुओं पर निर्भर रहने पर मजबूर कर देता है। कहीं न कहीं हर व्यक्ति स्वयं यह जानता है कि इसमें कुछ गलत है परन्तु उसके अन्दर का भय उसे अपनेआप या समाज से विद्रोह करने की अनुमति नहीं देता। "पीके" जैसी फ़िल्में उसकी सुप्त अंतरात्मा पर दस्तक देती हैं, उसे संबल और साहस देती हैं। अब यह आदमी अपने भय के साथ अकेला खड़ा है ऐसा महसूस नहीं करता। ये फ़िल्में उसे बताती हैं कि यह उस अकेले की समस्या नहीं है पता नहीं कितने और इसके शिकार हुए हैं। हाथ पर हाथ धरकर बैठने की बजाय यदि कुछ किया जाए तो उसके साथ-साथ समाज का भी भला होगा।
"अ वेडनेस्डे" फिल्म आतंकवाद जैसा मुद्दा उठाती है जिसे सामान्यतया और अनन्य रूप से सरकार की समस्या मानकर आम आदमी सरलता से अपने दायित्वों से हाथ झाड़ लेता है। यह फिल्म व्यक्ति को अपनी इस सोच पर पुन: विचार करके, एक साधारण व्यक्ति को उसकी ताकत का अहसास करवाती है। इस फिल्म के ख़त्म होते ही हर दर्शक अपने आपको कहीं बहुत ज़्यादा सबल और सक्षम महसूस करता है। यह फिल्म आतंकवाद, जो एक जोंक की तरह खून चूसकर पूरे विश्व को सुरक्षा कवच टूटने के भय से ग्रस्त कर रहा है उसे खींचकर निकाल फेंकने का सुगम रास्ता दिखाती है।
आतंकवाद और धार्मिक गुरु, ये दोनों व्यवसाय ही डर की बुनियाद पर टिके हैं जो मैं फिर से कहूँगी हर व्यक्ति के दिल में कम और ज्यादा मात्रा में रहता ही है। यह भय दीमक की तरह इंसान के अंतर्मन पर मिट्टी की ऐसी परत चढ़ाता जाता है जिससे चाहकर भी व्यक्ति पूरी तरह छुटकारा नहीं पा सकता। अब बड़ा प्रश्न यह है कि ऐसा क्यों है जब आदमी कहीं न कहीं सब समझता है तब भी कुछ करता क्यों नहीं। उत्तर वही है "भय", नया रास्ता चुनकर अपनी जिम्मेदारियाँ न निभा पाने का भय, परिवार की नज़रों से गिरने का भय या अपनों को खो देने का भय। यह भय उसकी शक्तियों पर सर्प की तरह कुंडली मार कर बैठा है जो अपनी ही योग्यता पर शंका पैदा करता है और आदमी आसान रास्ता अपनाता है कि जैसा चल रहा है चलने दो। वह यह कहकर अपने आप को समझा लेता है कि एक हमारे ही करने से क्या समाज का उद्धार हो जाएगा?
मासूम जानों से खेलते, मानव के मूल अधिकारों की धज्जियाँ उड़ाते, हर आतंकवादी हमले के बाद प्रत्येक आम आदमी के मन में कभी न कभी ये बात ज़रूर आती है कि इन आतंकवादियों को तो एक पंक्ति में खड़ा करके गोली मार देनी चाहिए। वह यह भी जानता है कि उसकी दृष्टि में न्यायसंगत होते हुए भी ये काम न तो वह स्वयं कर पाएगा और न ही सरकार। इसका अर्थ यह बिलकुल नहीं है कि यह फिल्म कानून को अपने हाथ में लेने को सही बताती है बल्कि सामाजिक और राजनीतिक अव्यवस्था के प्रति जो एक आम आदमी के मन में निराशा, कुंठा और रोष है उसे दर्शाती है। "अ वेडनेस्डे" फिल्म साधारण व्यक्ति के क्षोभ और रोष को उसके सामने लाकर उसे एक आत्मिक संतुष्टि देती है।
इसके साथ ही "पीके" फ़िल्म कहीं न कहीं आज की अनेक सामाजिक परिस्थितियों को खुलकर उजागर करती है। इसमें मीडिया के गिरते स्तर, अन्धविश्वास, ढोंगी स्वामियों के बढ़ते मायाजाल, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, वैश्यावृत्ति जैसे सामयिक विवादों को कुशलता व सहजता से बुना गया है। भारत पाकिस्तान के संबंध कैसे दोनों देशों की आम जनता को प्रभावित कर रहे हैं। ये मसला भी बेझिझक उभारा गया है।
वैश्वीकरण के दौर में जहाँ व्यक्ति अपने रोज़गार और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए एक देश से दूसरे देश में जाता है और कैसे अजनबी संस्कृति, धर्म, व भाषा के बीच सामंजस्य बिठाकर वहीं का हो जाता है। इस फिल्म में भले ही पीके को दूसरे ग्रह का प्राणी बताया गया है परन्तु अगर आप इसे आज के परिपेक्ष्य में देखेंगे तो वह भी अपनी क्षमताओं व धारणाओं के साथ विदेश की भूमि पर कदम रखता है जहाँ एक ओर नए वातावरण से सीखता है वहीं दूसरी ओर अपने विचारों व क्षमताओं से उस देश की संस्कृति को भी कहीं न कहीं प्रभावित करता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की परवरिश उसे भिन्न संस्कार, विचार व क्षमता प्रदान करती है। क्या यह हम सबके लिए सही नहीं है? यदि आप कभी थाईलैंड गए हों तो बैंकॉक के हवाई अड्डे पर लगे हुए निर्देशों में विदेशियों को "एलियन" शब्द से संबोधित किया गया है।
कुप्रथाओं या अराजक तत्वों से भिड़ने के लिए दृढ इच्छाशक्ति व आत्मविश्वास की ज़रूरत होती है। परिवर्तन लाने के लिए क्रांति की आवश्यकता होती है जिसके लिए साहस और कभी-कभी दुस्साहस की भी आवश्यकता होती है। शायद बहुत से लोगों के मत में, "अ वेडनेस्डे" में जो नसीर ने किया वह दुस्साहस कहा जा सकता है या पीके में रोंग नंबर अभियान कट्टरपंथियों की दृष्टि में दुस्साहस ही कहा जाएगा। परन्तु मेरी दृष्टि में अगर कुछ बदलाव लाने की इच्छा हो तो वह लीक से हटकर चलने की माँग करता है जिसे समाज शुरू में स्वीकार नहीं करता। परन्तु ये फ़िल्में बिना समाज के डर के हमें आत्मविश्वास के साथ कदम बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं और अपने अंदर के डर से दो-दो हाथ करने की ताकत देती हैं।
हिंदी सिनेमा हमेशा से ही लोगों को गहराई से छूने और प्रभावित करने में सक्षम रहा है। हमारे कपड़े, हमारा रवैया, जीवनशैली यहाँ तक कि भाषा में बदलाव और उसका फैलाव, ये सभी निर्धारित करने में हिंदी फिल्मों का बड़ा हाथ रहा है और रहेगा। आधुनिक फ़िल्में समाज केन्द्रित हैं जो समाज के हर क्षेत्र के हर पहलू पर विचार करती हैं। साथ ही समसामयिक होने के कारण समाज के विकास और उन्नति में एक बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। ऐसी फ़िल्में मेरी पसंदीदा फ़िल्में हैं जो मुझे मेरे दिमाग के घोड़े दौड़ाने पर विवश करती हैं। प्रत्येक साधारण व्यक्ति को जागरूक कर असाधारण ताकत प्रदान करती हैं। लोगों को शक्तिवान तथा सामथ्र्यवान बनाती हैं, उन्हें अपनी कुंठाओं का सामना करने की प्रेरणा देती हैं तथा अपने और समाज के प्रति केवल अपने कर्तव्यों का कोरा अहसास नहीं करवातीं बल्कि उन्हें निभाने के लिए मार्ग भी प्रशस्त करती हैं।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^