ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मीडिया पर "लाल" पहरा
CATEGORY : तथ्य 01-Apr-2017 12:12 AM 527
मीडिया पर

मैंने ये फ़ैसला कर लिया था कि अब मैं अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे अशेष के साथ चीन चली जाऊँगी। आखिर मैं कब तक घर, नौकरी सबकुछ अकेली संभालती रहती। वैसे भी ग्रेजुएशन के बाद से ही शिक्षण, अख़बार, रेडियो, टेलीविज़न में काम करते-करते किसी हद तक मेरी कैरियर संबंधी लिप्सा शांत हो चुकी थी। फिर इस उड़ान की तो कोई सीमा है ही नहीं। इच्छाओं की मरीचिका के पीछे कब तक भागना! ये ज़रूर है कि मेरे इस फ़ैसले पर घर के लोगों ने प्रश्न-चिह्न लगाया। यहाँ तक कि चैनल हेड ने भी मुझे त्यागपत्र न देने की सलाह दी। लेकिन इस बार मैं अपने फ़ैसले पर अटल थी। लिहाज़ा चीन के लिए मैं ऑथराइजड स्ट्रींगरशिप लेटर, आईकार्ड और माइक पप्पू लेकर कार्यालय में सबको अलविदा कह आई। लेकिन मेरे पुराने पत्रकार मित्रों ने मुझे आगाह कर दिया था कि मैं जिस देश में जा रही हूँ वहाँ पत्रकारों पर विशेष नज़र रखी जाती है और भारत के विपरीत वहाँ लिखने-बोलने की आज़ादी नहीं है, सो जो भी लिखूं और करूँ सोच-समझकर और धैर्यपूर्वक करूँ। उनकी सलाह को मैंने गंभीरता से लिया। चीन आने के बाद मैंने टेलीविजन के बजाय अख़बारों, पत्रिकाओं और ऑनलाइन न्यूज़ पेपर के लिए काम करने का फ़ैसला किया। सो अंग्रेज़ी मीडिया हाउस की मेरी तलाश शुरू हो गई। इसी बीच मेरी नज़र "ओपन" पत्रिका पर पड़ी। इस मासिक पत्रिका में आलेख मैंडरीन के अलावा अंग्रेज़ी में भी छपते हैं। लिहाज़ा मैंने इसे हर माह पढ़ना शुरू कर दिया। पढ़ने के बाद समझ आया कि ये पत्रिका वास्तव में विदेशी पाठकों को केन्द्र में रखकर ही छापी जाती है। इसमें शहर के पर्यटक स्थलों पर आधारित लेख के अलावा, विदेशियों को आकर्षित करने वाले स्थानों और शहर की प्रमुख गतिविधियों का लेखा-जोखा भी मिला। सूजों में रह रहे विदेशियों के आलेख देख मेरी बाँछे खिल उठीं। भविष्य में जुड़ने की संभावना को सोच मैं इसकी नियमित पाठक बन गई, लेकिन इस पत्रिका से जुड़ने के लिए मुझे सूजों के अपने अनुभवों को समेटकर कलमबंध करना ज़रूरी था। इसी बीच एक दिन अशेष के सहकर्मी के साथ रात्रि भोजन का अवसर मिला। उन्हें पता था कि मैं पत्रकार हूँ सो मीडिया की स्वतंत्रता पर बात छिड़ गई। बेन एक खुले दिमाग़ वाले चीनी हैं लिहाज़ा हमारी बातें सरहदों की तंग नीतियों के पार पहुंच गईं। बातों-बातों में मीडिया पर अंकुश को लेकर चीनी सरकार के प्रति उनकी खुन्दक प्रकट हो गई। उन्होंने मुझे आगाह किया कि यहां के टेलीविजन और अखबारों पर ज्यादा भरोसा मत कीजिएगा, क्योंकि ज्यादातर मीडिया हाउस का स्वामित्व सरकार को प्राप्त है। ऐसे में वे सरकारी भोंपू से ज्यादा कुछ भी नहीं और जो सरकारी कब्जे से मुक्त हैं उन्हें भी लिखने की आजादी नहीं है। मुझे सहसा ही मेरे पत्रकार मित्रों की सलाह याद हो आई। मैंने बेन से कहा इसका अनुमान तो मुझे पहले से ही था पर ये नहीं जानती थी कि यहाँ की आम और सरल जनता भी इस बात को स्वीकारती है। बेन ने कहा चीन में आर्थिक क्रांति के बाद क्षेत्रीय स्तर पर विकास तो हुए साथ ही संचार सुविधा में भी बड़ी क्रांति आई। कई वेब न्यूज साइट अंग्रेजी भाषा में भी खुल गईं। हां ये जरूर है कि उन्हें लिखने की स्वच्छंदता नहीं मिली, लेकिन जनता तक सच पहुंचाने के विकल्प जरूर बढ़ गये। यहां औद्यौगिक विकास के साथ विदेशियों की तादाद बढ़ी तो चीन से बाहर की दुनिया को समझने और जानने का बेहतर अवसर क्षेत्रीय लोगों को मिला। शिक्षा प्रणाली में भी बदलाव आये और लोगों में मैंडरीन के अलावा दूसरी भाषा के प्रति रुचि बढ़ी (सबसे ज़्यादा अंग्रेज़ी भाषा के प्रति)। नतीजतन लोग विभिन्न माध्यम से चीन के बाहर की दुनिया से धीरे-धीरे जुड़ने लगे। ऐसे में चीजों को देखने और समझने का उनका नजरिया अधिक व्यापक हो गया।
मैं बेन की बातों को ध्यान से सुन रही थी। वो कहते जा रहे थे और मीडिया पर लगे "लाल पहरा" के प्रति उनकी नाराजगी उजागर होती जा रही थी। बेन ने कहा न्यूज चैनल, अखबारों और वेब पेज पर वैसी ही खबरें दिखाई जाती हैं  जिससे समाज और देश की सिर्फ साफ-सुथरी छवि लोगों के सामने आये। खाना ख़त्म हो चुका था लेकिन बातें अभी बाक़ी थी। चूँकि रात काफी हो चुकी थी सो अपनी चर्चा को बीच में ही विराम देकर हम लोगों ने घर निकलने का फ़ैसला किया। लंबे समय बाद किसी के साथ अनौपचारिक चर्चा कर मुझे अच्छा लगा।
न्यू ईयर का समय नज़दीक था। अशेष और मैंने नये साल में शंघाई जाने का फ़ैसला किया। हमने 31 दिसंबर की रात शंघाई में बिताने का फैसला किया और बुलेट ट्रेन, होटल की टिकटें बुक करवा ली। इसी बीच हमारे एक भारतीय मित्र का शंघाई से फ़ोन आ गया। उन्होंने 31 दिसंबर की रात अपने घर पर पार्टी रखी थी सो हमसे उसमें शामिल होने का आग्रह किया गया। हमने सोचा न्यू ईयर सेलीब्रेशन पर शंघाई तो जाना ही था अच्छा हुआ यहाँ रह रहे भारतीयों की ईयर एंड पार्टी में शामिल होने का मौका मिल गया। 31 की शाम हम शंघाई पहुँच गये। हमारी पार्टी सुबह चार बजे तक चली। सुबह के करीब आठ बजे हम लोग पर्ल टावर देखने के लिए तैयार हो चुके थे तभी अशेष ने बताया कि रात में बंड (शंघाई के पुसी और पुडोंग क्षेत्र को एक विशाल नदी जोड़ती है) क्षेत्र में नव वर्ष कार्यक्रम के दौरान भगदड़ मच गई जिसमें क़रीब 40 लोगों की जानें चली गई हैं (बाद में कुछ मीडिया सौ से अधिक लोगों के मरने की बातें कह रही थी)। जान गँवाने वालों में महिला छात्रों की संख्या अधिक है। हमें पर्ल टावर जाने के लिए बंड होकर ही जाना था सो सोचा इसी बहाने लाइव रिपोर्टिंग का मौका मिल जाएगा।
वहाँ पहुँचने पर हम दंग रह गये। घटना को अभी 12-15 घंटे महज़ हुए होंगे लेकिन उस जगह को देखकर कोई ये नहीं कह सकता कि बीती रात यहाँ इतनी बड़ी घटना घटी है। न तो ख़ून के धब्बे, न ही बिखरे पड़े लोगों के सामान और न ही स्पॉट से लगातार लाइव टेलिकास्ट करती मीडिया की टीम। पूरा इलाक़ा एकदम साफ़-सुथरा ।
नव वर्ष का मज़ा लेने आये पर्यटकों के लिए कोई रोक-टोक नहीं! हाँ इतना ज़रूर था कि चप्पे-चप्पे पर पुलिस बल तैनात कर दी गई थी। मैंने अशेष से कहा अगर ये घटना दिल्ली या मुंबई में घटी होती तो जाँच के नाम पर पूरे इलाक़े को सील कर दिया जाता और मीडिया की टीम दो दिनों तक लगातार अपनी खोजी पत्रकारिता से ऊपर उठकर सीबीआई की भूमिका निभाते हुए सच्चाई की तह तक पहुँचने के नाम पर स्पॉट से लाइव टेलिकास्ट का बड़ा ड्रामा करती। स्पॉट से प्रत्यक्षदर्शियों के लाइव इंटरव्यू के नाम पर पुलिस-प्रशासन की नाकामी का ऑपरेशन किया जाता। लेकिन यहाँ तो कुछ भी नहीं हो रहा। रात की हृदयविदारक घटना से बेख़बर लोगों को किसी तरह की कोई भनक नहीं लग सकती थी। शाम के वक़्त भी पूरा इलाक़ा रोशनी से नहा रहा था। सिर्फ़ पर्ल टावर की लाइट दो मिनट के बाद ही बंद कर दी गई। घूम-फिरकर देर रात हम सूजों वापस आ गये, लेकिन भगदड़ की सही वजह जानने की उत्सुकता में बार-बार चाइना न्यूज़ और वेब पर आने वाली अलग-अलग न्यूज़ एजेंसी की ख़बरें देखते रहे। घटना के कई दिनों बाद तक विभिन्न न्यूज़ एजेंसियों पर "शंघाई भगदड़" हेडलाइन बनी रही। ज़्यादातर ख़बरों में यही बताया जा रहा था कि इतने बड़े कार्यक्रम को देखने आई भीड़ को संभालने के लिए वहाँ नाकाफ़ी पुलिस बल था। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम पर इतनी भीड़ का जुटना अपेक्षित था परन्तु पुलिस-प्रशासन की अदूरदर्शिता की वजह से घटना इतनी बड़ी हो गई। दुनिया के अन्य देशों की पुलिस-प्रशासन की तरह शंघाई पुलिस ने भी मीडिया की इन ख़बरों को बेबुनियादी बताते हुए अपने ब्लॉग पर घटना की अलग कहानी पेश की। हद तो तब हो गई जब अचानक एक दिन सभी न्यूज़ वायर पर "शंघाई भगदड़" से संबंधित हर तरह की अपडेट पर रोक लगा दी गई। ये फ़ैसला चीन सरकार की तरफ से आया था। इस सरकारी फ़रमान के बाद से किसी भी मीडिया पर इस घटना के बारे में कोई भी ख़बर नहीं आ रही थी और हुआ यूँ कि आम जनता घटना की सही वजह और दोषी के बारे में मिलने वाली जानकारियों से वंचित कर दी गई। लोगों को अब अस्पताल में भर्ती घायलों की भी सूचना मिलना बंद हो गई और इस तरह धीरे-धीरे घटना की चर्चा पूरी तरह से खत्म हो गई। लोग अपनी दुनिया में पूर्ववत व्यस्त हो गये। घटना में घायल लोगों में कितने स्वस्थ होकर घर लौटें? पता नहीं! घटना में अपने जिगर के टुकड़ों को खोने वाले माँ-बाप को न्याय मिला या नहीं? पता नहीं!
इस घटना की कवरेज पर "लाल" पहरा लग चुका था जिसे तोड़कर अंदर घुसने की हिम्मत किसी मीडिया हाउस या पत्रकार में नहीं थी।

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