ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
प्रतीति की भाप
01-Sep-2016 12:00 AM 4682     

भाषा एक सेतु की तरह लगती है जिसे मन और बुध्दि के बीच बाँधना पड़ता है। पीड़ाओं के खारेपन में हिलुरते भवसागर में अपनी नौका खेते कवि की आँखें बार-बार भर आती हैं और छलककर सागर में झर जाती हैं। कवि की आँखों का स्रोत उसके हृदय में ही तो है जिस पर प्रतीतियों की भाप छायी रहती है और जैसे ही काव्य-प्रकाश इस भाप को वेधता है, हृदय पर एक खिड़की खुलती है, एक दर्पण जिसमें कवि अपना चेहरा निहारते हुए जल की पारदर्शी गहरायी में उन सीपियों को खोजता है जिनमें उसके आँसू पकते रहते हैं। जरूरी नहीं कि प्रत्येक सीपी में काव्य-मुक्ता रूप पक ही गये हों। वे अक्सर खाली होती हैं और उनमें काव्य-भ्रम भासता है। फिर जीवन जल के दर्पण से मुख हटाकर कवि उस मृग की तरह मन के मरुथल की रेत पर दौड़ता है जहाँ रह-रहकर रेत में लहर लेती रेत ही दीखती है -- रेत पर ठिठकी हुई सूखी लहर उड़कर आँखों में भर जाती है और धीरे-धीरे हृदय स्रोत की तली में जमकर उसे उथला करती जाती है। जल में लहर लेता जल और रेत में लहर लेती रेत -- अभिन्नता दोनों में है, एक में बहती हुई और एक में ठहरी हुई। ठिठकी हुई अभिन्नता शब्द और अर्थ से एक ऐसी दूरी बनाती है, जो रेत में ओझल जल की तरह है और जिसे बार-बार रेत उलीचकर उठाना पड़ता है। वहाँ शब्द और अर्थ की अभिन्नता का तरंगायित विलास नहीं झलकता। कवि का स्थायी निवास उसके हृदय का जल ही है और कविता नदी वहीं से निकलती है जो सदा विद्या के सागर में मिलने को आतुर है। भामिनी विलास का आरम्भ करते हुए पण्डितराज जगन्नाथ कहते हैं कि -- माधुर्य की सीमा को प्राप्त होने वाली, पान करने में आनन्द देने वाली मेरी कविता संसार में अमृत है। प्रत्येक समय की काव्य-प्रवृत्तियाँ विद्यारूपी सागर के मंथन पर अवलम्बित रहती हैं। गुणात्मक न्याय से देखें तो प्रत्येक काल में कविता के बीते हुए युग भी वर्तमान बने रहते हैं और कवियों को अपने हृदय का जल मथने का अभ्यास भी बना रहता है। वे जल पर पड़ने वाली सृष्टि की विराट छबियों को अनादिकाल से मथते ही रहे हैं -- कालिदास और तुलसीदास ने जल के दर्पण में ही निहारकर हिम और भूमिजा छबियों का मंथन किया है। अपनी कविता के भावक का जो रूप प्रेमी कवि घनानंद ने एक कबित्त में रचा है, वह भी जरा देखना चाहिए। वे कहते हैं कि -- कविता हृदयभवन में मौन का घूँघट डाले अपने को छिपाये बैठी है। वह कोमल और मंजुल पदार्थों से सजी-सँवरी है। उसमें मृदु-मंजु रस और रूप बसे हुए हैं। उसके अलंकार उसकी देह पर बोझ नहीं, वे तो रस-दीप्ति के लिए हैं। यह कविता रसना की सखी है और यह सखी ही कविता को हृदय तक ले आती है। कविता को श्रवण की गलियों में अटकाये बिना सहृदयता की सेज तक पहुँचाती है। इस कविता दुल्हन पर वही रीझ सकता है जो सुजान ,प्रवीण और सहृदय है, वही अपनी काव्य-प्रतीति के अंक में भर उसे अपनी रस-प्रतीति की गोद में लेकर विलसता है –
उर भौन में मौन कौ घूँघट कै दुरि बैठी बिराजति बात बनी। मृदु-मंजु पदारथ भूषन सो सु लसै हुलसै रस-रूप मनी।
रसना अली कान गली मधि ह्वै पधरावति लै चित सेज सनी।
घनआँनद बूझनि अंक बसै बिलसै रिझवार सुजान धनी।
हमारा समय मानससागर को मथकर जीवन को तत्त्वतः जानने के लिए लिए कितना कम उत्सुक दिखायी पड़ता है। वह तो रेत को मथकर तेल निकालने के लिए जाना जा रहा है। शायद इसीलिए कविता में छबियाँ लुप्त होती जा रही हैं वे संज्ञा की तरह प्रकट नहीं, सर्वनाम में ओझल हैं। संज्ञा की विशेषता खोजना पड़ती है और सर्वनाम कवियों को इस झंझट से छुटकारा दिला देता है। छबि मंथन करने वाले कवियों में विरक्त, भक्त और आसक्त -- तीनों ही तरह के कवि होते आये हैं पर अभी बिलकुल अभी के कवियों को कोई और विशेषण देना पड़ेगा। फिलहाल उन्हें विभक्त कहना ही ठीक हो। फिर भी यह उम्मीद तो कवियों से अभी भी है कि वे काल पाकर शब्द और अर्थ की सम्पृक्ति से फिर भर उठेंगे।
संस्कृत काल को पुरातन, भक्तिकाल को पुनरुत्थान और रीतिकाल को सामन्तवाद की काल कोठरी में डालकर कविता की अहल्या भूमि को नहीं जोता जा सकेगा। हकीकत तो यह है कि प्रत्येक समय में रामायण पढ़ने से उजड़ी हुई अयोध्या आबाद हो जाती है। आचार्यगण कहते हैं कि कुछ काव्य ऐसे होते हैं जो एक मण्डल तक ही सीमित रह जाते हैं, कुछ ऐसे होते हैं जो प्रजा को व्यापते हैं और कुछ ही होते हैं जो जगत को व्यापते हैं। पर अभी हमारे समय की कविता तो मण्डल में ही सिमट गयी है और कभी-कभी तो वह केवल कवि के प्रभामण्डल में ही सिमटी और शरमायी-सी दिखायी देती है। सबकी बोली-ठोली, लाग-लपेट, टेक-भाषा, मुहावरा-भाव, आचरण-इंगित, भोली-भूली इच्छाएँ, बिखरा हुआ रूप सौन्दर्य, विविध तरंग-भंग करती लहराती-गाती स्वरधारा, मनुष्य, आवारा, गृही, सभ्य-असभ्य, शहराती-देहाती और इतिहास विश्व का -- इन सबको हमारे ही समय के कवि त्रिलोचन कविता के घर में आ बसने का निमंत्रण देते हैं। कविता में इतनी छबियों को निमंत्रित करने के लिए कवियों के पास बड़ा शब्द निवेश होना चाहिए। कवियों की गरीबी रामायण पढ़े बिना दूर नहीं हो सकेगी ।
भारत में कवियों की गरीबी आयातित है और उसे अपने दर्शन और काव्य की समृध्द परम्परा के सान्निध्य से बेशक दूर किया जा सकता है। जब अराजक वैभव का पागलपन सिर चढ़कर बोल रहा है और प्रतिभा बिकाऊ है तब प्रतिभा को प्रज्ञा की ओर उठा सकने वाली साहित्य साधना की जरूरत बनी ही रहेगी। वाग्वैभव पर जैसे किसी का ध्यान ही नहीं। ज्यादातर साहित्य वाग्दारिद्रय से ग्रस्त होकर मनुष्य की काव्य संवेदना को कोई पोषण ही नहीं दे पा रहा है। अनेक प्रकार के दारिद्रय में प्रजा को पालते राज्य से अप्रसन्न होकर कविगण भले ही यह कहते फिरें कि -- आप महाराज हैं तौ हों हूँ कविराज हौं। सिर्फ इतना कह देने भर-से कवि की सत्ता प्रमाणित नहीं होती। समकालीन सत्ता और साहित्य, दोनों ही दरिद्रता के अहंकार को ढो रहे हैं। अपने-अपने क्षीण आभामण्डल में एक-दूसरे को आपस में कोस रहे हैं।
कविवर शमशेर बहादुर सिंह की एक कविता याद आ रही है, जिसका शीर्षक है -- सुन के ऐसी ही-सी एक बात। इस कविता को उन्होंने हिन्दी साहित्य में गुटबंदी के किसी घृणित रूप की प्रतिक्रिया में विवश होकर लिखा होगा -
क्या यही होगा जवाब एक कलाकार के पास
रख्खा जायगा कलम जूती ओ पैजार के पास
क्या यही जोड़े हैं संस्कार के संस्कार के पास
क्या यही संकेत हैं साहित्य के व्यापार के पास
सुन के ऐसी ही-सी इक बात...
क्या कहूँ, बस, अब।
दुख और कष्ट से मैं सोच रहा था यह सब।
नये मानों की, नये शिल्प, नये चेतन की
नये युग लोक में क्या अब यही व्याख्या होगी
जो कला कहती थी -- जय होगी तो होगी मेरी।
आज अधरों पे है उसके ही यह कैसी बोली
इन बड़ों का नहीं साहित्य का सिर झुकता है।
अपने पाठक के ये हैं -- सोचते दम रुकता है।
देवताओ मेरे साहित्य के युग-युग के, सुनो –
साधनाओं की परम शक्तियो, इतना वर दो,
(अपने भक्तों की चरणधूलि जो समझो मुझको)
एक क्षण भी मेरा व्यय ऐसों की संगत में न हो।
एक वरदान यही दो जो हो दाया मुझ पर,
स्वप्न में भी न पड़े ऐसों की छाया मुझ पर।
कौन जाने शमशेर जैसे संवेदनशील कवि को किस घृणित साहित्यिक घटना ने इतना आहत किया होगा कि उन्हें यह संकल्प करना पड़ा -- जहाँ साहित्य का सिर झुकता है, ऐसी कोई छाया मुझ पर न पड़े। शमशेर ऐसी ही छाया से बचकर अपने जीवन से वह कविता पा सके, जो बेमिसाल है। शमशेर के हृदय से फूटी कविता के आईने में कवि अपना चेहरा जरूर देखते होंगे। पर आज कवियों की फेस-बुक से जो चेहरे स्क्रीन पर दिखायी पड़ रहे हैं, उनमें से बहुत से शमशेर के काव्य दर्पण में भी अपना चेहरा कहाँ देख पा रहे होंगे। बाजार के लोभ ने किसी भी समय कवियों को बड़ा नहीं बनाया। बाजार उस आधुनिक मारीच की तरह अनुभव में आता है जो कवियों को उनकी प्रकृति से दूर लिए चला जा रहा है और बाजारू बहुरूपिये कविता को अकेली पाकर न जाने कहाँ लिये जा रहे हैं। साहित्य के देवताओ, साधना की परम शक्तियो और साहित्य के आधुनिक पीठाधीश्वरो सुनो, शमशेर की आवाज सुनो।

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