ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
फिजी में रामायण मेला
CATEGORY : संस्मरण 01-Feb-2017 12:22 AM 767
फिजी में रामायण मेला

भारत से लगभग बारह हजार किलोमीटर सुदूर पूर्व दिशा में बसे छोटे से फिजी द्वीप में, अक्तूबर 2016 में, पहला अन्तर्राष्ट्रीय रामायण सम्मेलन हुआ। यह सर्वविदित है कि हमारे देश से 1879-1916 के बीच लगभग साठ हजार नागरिक, अंग्रेज सरकार ने पानी के जहाज द्वारा फिजी में गन्ने की खेती के लिए भेजे थे। रोजगार के लोभ में वे सभी लगभग छह माह की कठिन यात्रा करते हुए वहाँ पहुँचे। मार्ग का उबाऊ एवं दुखदाई समय काटने के लिए उनके पास रामचरित मानस की गुटका प्रति थी, जो वे अपनी पोटली में बँधे अपने फटे-पुराने कपड़ों के साथ ले जाना नहीं भूले थे। फिजी में, चार-पाँच पीढ़ियाँ बीत जाने के बाद भी, उनके वंशज रामचरित मानस से अपना नाता नहीं भूले हैं। उनके निर्वासन के जीवनकाल में रामचरित मानस, जिसे वे अब "तुलसी रामायण" कहते हैं, निरन्तर उनके साथ आशा की किरण बनकर सम्बल प्रदान करती रही है।
उनके फिजी के प्रारम्भिक जीवन काल की एक घटना आज रामकथा के प्रति उनकी आस्था का प्रमाण बनकर चिर-स्मरणीय बन चुकी है। अंग्रेजी शासन काल में जब स्थानीय अधिकारी जनता के बीच "एलिजाबॅथ महरानी की जय" का नारा लेकर पहुँचे तो जनता ने "रामायण महारानी की जय" का नारा लगाया। मानस आज भी "तुलसी रामयण" बनकर उनकी जीवन शैली का अभिन्न अंग बनी हुई है। अधिकांश भारत-वंशियों के घर पूजागृहों में रामचरित मानस की प्रति पाई जाती है और उनके पारस्परिक वार्तालाप में उसकी चौपाइयाँ उध्दृत होती रहती हैं। यद्यपि उनकी भाषा मूल फिजीवासियों की भाषा के प्रभाव में बदलते हुए कुछ नया रूप ले चुकी है, फिर भी उनकी भाषा में अवधी-भोजपुरी आदि के अनेकानेक शब्द स्पष्ट रूप से सुनाई देते हैं।
उनके विद्यालयों में बच्चों को मानस पढाई जाती है और आए दिन उनके बीच मानस अथवा रामकथा पर आधारित भाषण, अभिनय आदि की प्रतियोगिताएँ होती रहती हैं। अनेक विद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है और अब यह प्रयास चल रहा है कि आठवीं जैसी प्रारम्भिक कक्षाओं तक हिन्दी अनिवार्य कर दी जाए। देश में अनेकानेक रामलीला मंडलियाँ हैं जो अपने-अपने ढंग से राम-कथा का प्रचार-प्रसार करती हैं। ऐसे वातावरण में आश्चर्य है तो बस यह कि अब तक रामायण को आधार बनाकर कोई बड़ा, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का कार्यक्रम क्यों नहीं हुआ! यह भी सर्वविदित है कि ़फिजी की भाँति ही मॉरिशस, त्रिनिडाड, सुरीनाम आदि देशों में भी भारतीय मजदूर भेजे गए थे और वहाँ भी वे सब भारतीय संस्कृति को कुछ अंशों में अपनी जीवन-शैली में बनाए रखे हैं।
ऐसे रामकथा-प्रेमियों के मन में रामायण पर सत्संग का विचार उत्पन्न हो तो क्या आश्चर्य! इसी के फलस्वरूप एक फिजी सेवा संघ नामक स्थानीय संस्था ने रामायण पर महासम्मेलन करने का बीडा उठाया और उन्हें सहयोग दिया फिजी में भारत के उच्चायोग ने। अनेक भारतीय मूल के व्यवसायी संगठनों ने भी आर्थिक सहयोग का आश्वासन दिया और परिणाम-स्वरूप एक तीन-दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय रामायण सम्मेलन की योजना बनी।
इस सम्मेलन में रामकथा सम्बंधी सभी विषयों पर चर्चा का प्रयास किया गया जिसमें काव्य, चरित्र-चित्रण, जन्म का समय, राम-जन्म की प्रामाणिकता, तत्कालीन शासन-व्यवसथा, वन-यात्रा का मार्ग रामलीला का मंचन आदि अनेकानेक विषय सम्मिलित किए गए। इसमें भाग लेने के लिए भारत, मॉरिशस, त्रिनिडॉड, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेसिया, गायना आदि के अनेकानेक विद्वानों ने भाग लिया, साथ में कुछ स्थानीय विद्वान तो थे ही।
व्यवस्था यह थी कि प्रात: साढे आठ से रात को साढे आठ तक, बीच में भोजन तथा चाय-पान के लिए लगभग दो घंटे निकालकर, निरन्तर विद्वानों द्वारा रामकथा सम्बंधी प्रसंगों पर चर्चा होगी। दिन में चार-पाँच सत्र होते थे, जिनमें पाँच-छ: वक्ता होते थे। व्यवस्था यह थी कि प्रत्येक को बोलने के लिए लगभग 20-25 मिनट का समय ही मिल पाता था।
जहाँ वक्ताओं को समय की कमी का दुख था वहीं आयोजकों को चिन्ता यह थी कि कोई वक्ता समयाभाव के कारण छूट न जाय, क्योंकि वक्ताओं के अतिरिक्त उनके कार्यक्रम में अयोध्या से बुलाई गई एक रामलीला मंडली द्वारा प्रसंग-विशेष का मंचन भी समायोजित होना था और स्थानीय कलाकारों, विद्यालयों द्वारा कुछेक रामकथा सम्बंधी प्रस्तुतियाँ भी होनी थीं। साथ ही योजना यह भी थी विदेश से आए हुए वक्ताओं का समुचित सम्मान हो और किसी स्मारिका के लिए उन सबके चित्र भी लेकर सहेजे जाएँ।
इन सबके साथ अच्छा यह होता कि कुछ समय प्रश्नोत्तर आदि के लिए भी निकाला जाता। हाँ, यह भी सच है कि प्रश्नोत्तरों में अनेक व्यर्थ के प्रश्न पूछे जाते हैं और बहस बढ़ती ही जाती है, भटकन की सीमा तक। कार्यक्रम की योजना देखते हुए आयोजक उतना ही कर पाए जितना उनसे हो पाया।
ऐसे आयोजनों में अपेक्षा यह रहती है अधिक श्रोता उपस्थित रहें। इस दृष्टि से किसी को निराशा नहीं हुई। थोड़ी-बहुत देर से ही सही, सम्भवत: दस बजते-बजते आयोजन का दीर्घाकार प्रेक्षागृह लगभग भर जाता था। चाय एवं भोजन के अवकाश में कुछ श्रोताओं और वक्ताओं के बीच सम्वाद भी होते रहते थे।
देश-विदेश से आए वक्ताओं में भारत के अलावा मॉरिशस, त्रिनिडाड, सिंगापुर, गायना, ऑस्ट्रेलिया, फिजी तथा निकटवर्ती द्वीपों से आए विद्वान शामिल थे।
इस वृहद आयोजन के प्रमुख सूत्रधार थे फिजी में भारत के उच्चायुक्त श्री विश्वास सपकाल और उनके द्वितीय संस्कृति अधिकारी श्री अनिल जोशी। वैचारिक प्रस्तुतियों से इतर योगदान था डॉ. मुनिअप्पन का जिन्होंने रामायण कालीन शासन व्यवस्था का विशेष विवरण दिया।
इन तीन दिनों के बाद भी कुछ दिन सूवा और नंदी में बिताने का अवसर मिला। सूवा और नंदी के विश्वविद्यालयों में भी वैचारिक आदान-प्रदान का अवसर प्राप्त हुआ।
फिजी एक बहुत ही खुला हुआ और साफ-सुथरा छोटा-सा देश है। कहीं भी थोड़ी ही दूर पर सागर-तट आ जाता है। हवा शुध्द और प्रदूषण रहित है। पानी अत्यंत साफ और शुध्द इतना कि "फिजी वाटर" नाम से अनेकानेक देशों को बोतलों में बंद करके निर्यात किया जाता है। कुछ दूरी पर एक झरना है, जहाँ का पानी अनेकानेक रोगों से मुक्त करने का गुण रखता है - ऐसी मान्यता है। वहाँ पहुँचने के लिए विदेशों से रोगी भी आते रहते हैं। हाँ सुना है वहाँ रोगियों की लम्बी पंक्ति रहती है, जहाँ प्रतीक्षा में कभी-कभी एक सप्ताह तक का समय लग जाता है। इस पानी का उल्लेख गूगल पर "फिजी मिरेकॅल वाटर" नाम से उपलब्ध है।
फिजी में ताजमहल या अक्षरधाम जैसे दर्शनीय स्थल तो नहीं हैं किन्तु प्रकृति की गोद में, भीड-भाड से दूर, साँस लेने का सुख भरपूर है। हाँ भारतवंशियों के लिए एक चिन्ता का विषय यह है कि वहाँ की जन-संख्या में उनकी भागीदारी, पचास प्रतिशत से घटकर अब चालीस प्रतिशत से भी कम रह गई है। कारण बस यह कि उनकी नयी पीढ़ी पढ़-लिख कर व्यवसाय के लिए ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, अमेरिका जैसे समृध्द देशों की ओर पलायन करती रहती है। परिणामस्वरूप, राजनीतिक भागीदारी एवं प्रभाव में भी उनकी कमी आई है।

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