ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
राजनीतिक रंगमंच
01-Dec-2016 12:00 AM 2692     

शेक्सपियर ने कहा था कि सारी दुनिया एक रंगमंच है और सभी लोग सिर्फ किरदार हैं। खैर, शेक्सपियर के अनुसार तो हम सब पैदाइशी अभिनेता हैं जिनका सूत्रधार भगवान है। जाने दीजिये। हम उन लोगों की बात कर रहे हैं जो पैदाइशी नहीं बल्कि मुखौटा पहन कर अभिनय करते हैं। यूँ तो हमें भी अभिनय का शौक़ था। स्कूल और कॉलेज में बहुत से पुरस्कार भी जीते हैं। यानि अच्छा खासा किरदार निभा लेते हैं; लेकिन भैया राजनीति के मंच पर जो अभिनेता अवतरित हैं उनका मुक़ाबला कोई नहीं कर सकता। अरे साहब एक से बढ़ कर एक हैं झूठ बोलने में माहिर। यूँ तो राजनीति में हमेशा से ही झूठ बोलने और जनता के सामने अपनी झूठी तस्वीर रखने का रिवाज़ रहा है। अरे भाई वोट हासिल करने के लिये "कुछ भी करेगा" तो नेताओं का मूल मन्त्र है। इसके लिये रोकड़े की ज़रूरत भी लाज़मी है। अब नेताओं को अपने आराम के लिये तो चाहिये ही, साथ ही चुनाव लड़ने के लिये भी रक़म का इंतज़ाम करना पड़ता है। कहते हैं कि एक मंत्री से चुनावोपरान्त पूछा कि वे जीतने के बाद क्या-क्या करेंगे। मंत्री जी पसीना पोंछते हुए बोले "अरे भाई मैं तो यह सोच रहा हूँ कि अगर मैं हार गया तो क्या करूँगा।" खैर यह सब तो जग ज़ाहिर है। अभी तो ताजातरान बात यह है कि जब से मोदी जी प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हुये हैं, तब से विरोधी पार्टियों में ऐसी हड़कम्प मच गयी है जैसी कि कामराज के दिल में भी नहीं हुई होगी जब उनकी अंडर पेटेंटी में पली-बढ़ी इंदिरा गाँधी ने उन्हें अंगूठा दिखाया था। हमेशा एक-दूसरे के खिलाफ ज़हर उगलने वाली सभी पार्टियां एकजुट हो गयीं हैं। काम-धाम तो पहले भी नहीं करते थे ये नेता लोग, अब तो बस सब भूल कर एक ही काम रह गया इनके पास -- मोदी हटाओ! मणिशंकर अय्यर पाकिस्तान जाकर फरमाते हैं (गिड़गिड़ाते हैं) "इन्हें (मोदी को) हटाओ, हमें लाओ" और मोदी से पूछते हैं "पाकिस्तान क्यों गये?" शर्म भी नहीं आती। राहुल (पप्पू) भैया तो प्रतिक्रियावादी अभिनेता हैं। उनका पूरा राजनीतिक जीवन गवाह है कि वे बेमन से इस मंच पर टिके हैं (उत्तराधिकारी जो हैं कांग्रेस के)। वे कर्म (ठ्ठड़द्य) नहीं करते, केवल प्रतिक्रिया (द्धड्ढठ्ठड़द्य) करते हैं, हर घटना पर। पहले काले धन को लेकर ख़ाली डिब्बे की तरह खड़कते रहे; और जैसे ही करेंसी पर वार हुआ -- हाहाकार करने लगे। भाईजान मसला क्या है? काला धन बन्द किया जाये या नहीं? असलियत सब जानते हैं। एक चुटकुला मुख पुस्तक पर घूम रहा है। राहुल बाबा ने सोनिया से कहा "मम्मी मम्मी, ये मोदी तो हमारा सारा काला पैसा बन्द कर रहा है, मैं बैंक जा कर कुछ नोट बदलवा लेता हूँ। सोनिया ने कहा "पागल मत बन। हमारा सारा पैसा स्विस बैंक में है।" पप्पू जी बोले "मैं बुद्धू नहीं हूँ माँ। मैं स्विस बैंक ऑफ़ इंडिया (च्एक्ष्) ही तो जा रहा हूँ।"
 दूसरे अभिनेता है -- गप्पू केजरीवाल। मुखौटे पे मुखौटा। खुद की छवि के लिये जनता के करोड़ों रुपये विज्ञापन पर खर्च करना और केंद्र सरकार के हर काम में नुक्स निकलना। यहाँ तक कि नये नोटों में भी अजीमुश्शान ग़लती निकाल दी, कहा कि उनमें गाँधी जी के चश्में का नम्बर ग़लत है। हा हा। और तो और मिस्टर ईमान्दार ने दौड़ कर ममता दीदी का आँचल पकड़ लिया जो कब से शरद चिट फंड घोटाले में फंसीं हैं।
खुद को महानायिका समझने वाली मायावती दरअसल खलनायिका हैं। वे विलाप कर रही हैं कि मोदी ने नोट-बन्दी के मामले को गोपनीय रख के अपना इंतज़ाम कर लिया (परोक्ष में -- हमें भी मौका दिया होता)। देवी जी जब मौका दिया था तब आपने समस्त राज्य में अपनी मूर्तियां स्थापित करने का बन्दोबस्त कर लिया था जो जनता को क़तई पसन्द नहीं आया। अब क्या कारगुज़ारी करेंगी? जो कर रहा है उसे करने दें कृपया।
विपक्ष का कोई भी नेता इस तथ्य की ओर ध्यान नहीं खींच रहा है कि कश्मीर में हत्या पथराव बन्द हो गए हैं क्योंकि पाकिस्तान से आने वाला पैसा बन्द हो गया है। आतंकवाद कम हो गया है इसी नोटबन्दी के कारण। थोड़ी बहुत दिक्कत हो रही है, लेकिन उसे बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जा रहा है। पप्पू भैया 75 लाख की गाड़ी में 8000 का पेट्रोल खर्च करके और सुरक्षा कर्मियों की सेना लेकर केवल 4000 रुपये निकालने बैंक गये और मुस्कुरा-मुस्कुरा के फोटो खिंचवाई। बोलते हैं कि सिर्फ गरीब लाइन में हैं अमीर नहीं। हुज़ूरेवाला अमीर तथा पढ़े लिखे लोग कार्ड इस्तेमाल कर रहे थे और प्रतीक्षा कर रहे थे कि भीड़ कम हो जाए तब बैंक जाएँ। पप्पू भी कार्ड ही इस्तेमाल करते हैं, बैंक तो महज़ दिखावे के लिए गये थे।
साहबान! बात को समझने और समझाने के लिये अक्सर हम प्रतीकों का सहारा लेते हैं। परियों की कहानियां, राजा-रानियों की गाथायें या फिर पशु- पक्षियों को प्रतीक बना कर कही गयी कथायें बड़ी सार्थक होती हैं। राजनीति के इस रंगमंच पर भी यदि हम नेताओं को जानवरों का लिबास पहना दें -- उन्हें एक प्रतीकात्मक किरदार प्रदान करने के लिये तो उनका चरित्र कुछ यूँ होगा : ---
मोदी : शेर। भाई साहब यह प्रशंसा भी हो सकती है उनकी बहादुरी के लिये तथा आलोचना भी हो सकती है उनके तानाशाही व्यवहार के लिये। कुछ भी हो, सिंह के चरित्र में वे फिट बैठते हैं।
अरविन्द केजरीवाल : रंगा सियार। कोई दुविधा नहीं है। यह चरित्र इन्हीं पर फिट बैठता है, 100 फीसदी। जो आदमी लालू प्रसाद को गलियां देकर चुनाव जीते और फिर लालू से गलबहियां डाल कर फोटो खिंचवाये, आम आदमी का प्रतिनिधि बन कर ख़ास आदमी बन जाये, मतलब ये कि मौका पड़ते ही गधे को बाप और लोमड़ी को बहन बना ले वह रंगा शृगाल नही तो और क्या है?
लालू : कुकुर। वैसे तो हमारे सभी गाँवों और छोटे शहरो में हर तीसरे टॉमी का नाम लालू होता है, लेकिन हमारे लालू यादव वो जिनावर नहीं हैं। उनकी खुशदिली (राज्य को लूट कर), चालाकी (जनता को मूर्ख बना कर) और विदुषकी देख कर उन्हें बन्दर का किरदार दिया जा सकता है।
राहुल बाबा : टेडी बेयर। भारतीय बच्चे कभी बड़े नहीं होते। आज भी उनकी ज़िन्दगी के निर्णय उनके माँ-बाप ही करते हैं -- चाहें शादी का हो या करियर का। तो बेचारा पप्पू भी बेमन की राजनीति में फंसा हुआ है। संसद में बोर होकर सोता हुआ पाया जाता है तो कभी कुछ कर दिखाने की धुन में खाट पंचायत क़र गुज़रता है, जहाँ और कुछ तो हुआ नहीं खटोले ज़रूर चोरी हो गये। वो दो-चार सौ खाटें नहीं संभाल सके और मोदी से कहते हैं कि नोटों का इंतज़ाम पहले से क्यों नहीं किया। इसे कहते हैं कथनी और करनी का फर्क। बहुत ही प्यारे, भोले, बेचारे पप्पू की राजनीति ना जाने क्यों बेस्वाद और बेरंग होती है। सुना है कि वे सोनिया से पूछ रहे थे- "मम्मी लोग मुझ पे हंसते क्यों हैं।"
ममता बनर्जी : लोमड़ी। टाटा को भगा कर किसानों की सहानुभूति बटोरना, चिट फंड के ज़रिये काला धन जमा करना, मौका परस्ती के तहद दुश्मनों से हाथ मिलाना; ऐसी मानसिकता वाली महिला को चालाक लोमड़ी नहीं कहेंगे तो किसे कहेंगे?
मायावती : क्तन्र्ड्ढदठ्ठ लकड़बग्घा। ये बड़ा विचित्र किन्तु सत्य किरदार है। सुना है कि यह शिकार को देख कर ज़ोर ज़ोर से हंसता/हंसती है। ऐसा है - अंग्रेजी में अक्सर इसको स्त्रीलिंग में ही प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन क्या फ़र्क़ पड़ता है। इनका दबंगपन, स्वार्थपरता तथा होशियारी देख कर लकड़बग्घे का चरित्र ही इनको शोभा देता है। बाकी जंतुओं को बक्श देते हैं। जो जिस नेता का अनुयायी हो उसे उसी से मिलता-जुलता किरदार दिया जा सकता है। वैसे भी दल-बदलुओं के परिवेश में क्या पता कौन कब खेमा बदल ले।
दोस्तों! व्यक्ति का और देश का चरित्र मुसीबत के वक़्त सामने आता है। बकौल ग़ालिब - अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे, मर के भी चैन ना आया तो किधर जायेंगे। मरना और मरने जैसी मनः स्थिति में पहुँच जाना कोई गर्व की बात नहीं है। देश ने आपात्काल भी झेला है। वो वक़्त भी गुज़र गया। लाइनों में तो हम हमेशा से लगते आये हैं। रेल के, राशन के, सिनेमा के, और ना जाने किस-किस के टिकट लेने के लिये हम लाइन में नहीं लगे? ये तो हुई लेने की बात; हुज़ूर हम हैं देने के लिये भी लाइन में खड़े रहते हैं। बिजली का बिल, जायदाद का कर, इनकम टैक्स वगैहरा-वगैहरा के पैसे हम देते हैं लेते नहीं, फिर भी! अरे साहब तिरुपति के मन्दिर में पांच घन्टे लाइन में खड़े होकर एक मिनट के दर्शन करते हैं; और कोई गारंटी नहीं कि भगवान ने हमारी सुनी भी या नहीं। आज देश में एक अच्छा बदलाव लाने के लिये दो घन्टे लाइन में लग भी गये तो शिकायत क्यों? बदलाव कष्टदायक नहीं होता, उसका विरोध कष्टदायक होता है। बिना दर्द के किसी बच्चे का जन्म हुआ है क्या?
आम आदमी के नाम पर घड़ियाली आंसू बहाने वाले नेता क्या सचमुच लोगों की परवाह करते हैं? "कौन रोता है किसी और की ख़ातिर ऐ दोस्त, सबको अपनी ही किसी बात पे रोना आया।"  जी हाँ सारे के सारे दिलजले अपने काले धन के लिये रो रहे हैं। बता सकते नहीं, अतः आम आदमी के नाम को भुना रहे हैं। साहबान! हमने कितने साल लालू को झेला है, माया और अखिलेश को देखा है और अभी तक गप्पू केजरी को बर्दाश कर रहे हैं। चलो, इस सरकार को भी परख लेते हैं। पर थोड़ा वक़्त तो दो। कांग्रेस और लालू जैसे हाहाकारियों ने क्या अच्छा कर दिखाया है (जनता के लिये) जिसके दम पर इतना उछल रहे हैं? सूरज की रौशनी जुगनुओं को रास नहीं आती। समय बतायेगा कि कौन सा ड्रामा हिट होगा और कौन-कौन से अभिनेता नेपथ्य में चले जाएंगे। तेल देखो तेल की धार देखो।

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