ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कवि-सम्मेलन बनाम वार्षिक मिलन समारोह
CATEGORY : रपट 01-Apr-2017 01:22 AM 291
कवि-सम्मेलन बनाम वार्षिक मिलन समारोह

भारतवंशियों की युवा पीढ़ी परम्परागत संस्कृति और उसके आयोजन में रुचि नहीं
लेती, इस धारणा को बदलना होगा। हमें युवाओं को आगे बढ़कर मंच पर
सहभागिता के लिये प्रेरित करना होगा ताकि वे अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति को
उजागर कर सकें और भविष्य में इस तरह के दायित्व को संभालें।

विगत दिनों अखिल विश्व हिंदी समिति, न्यूयॉर्क तथा अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, नई दिल्ली संस्थाओं के संयुक्त तत्वावधान में हिंदू सेन्टर, किसेना बुलेवार्ड, फ्लशिंग, न्यूयॉर्क में वार्षिक मिलन समारोह एवं कवि सम्मेलन आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. विजय कुमार मेहता ने की और संचालन डॉ. बिंदेश्वरी अग्रवाल बिंदु ने किया। यह कार्यक्रम मूलतः होली के अवसर पर आयोजित किया गया था। इस अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन में शामिल होने वाले अधिकतर कवि समिति से जुड़े हुए थे। उन्होंने अपनी-अपनी कविताओं का पाठ किया। कुछ कवियों ने अपनी कविताएँ तथा डॉ. जावेरी ने काका हाथरसी की रचनाओं को सुनाया जो वाकई में गुदगुदा गईं। इसके अलावा उन्होंने कई चुटकुलेनुमा पैरोडी को भी प्रस्तुत किया। डॉ. विजय कुमार मेहता ने भी अपने काव्य संग्रह से कविताओं के अंश पढ़े। कुछ कविताओं का स्तर वाकई में बहुत अच्छा था परंतु अधिकतर कविताएं या तो अपने पुराने जमाने की जुगाली के रूप में प्रस्तुत की गईं या फिर वाट्सएप जैसे सोशल मीडिया के मंच से कॉपी पेस्ट के आधार पर सुनाई गई।
इस तरह के आयोजन के बारे में अक्सर ही यह धारणा बनती है कि वे एकांगी और आत्ममुग्धता से भरे होते हैं। अच्छा होता कि हम इस तरह के आयोजनों में युवा पीढ़ी को जोड़ पाते या फिर कुछ अच्छे स्तरीय रचनाकारों को भी अपनी बात रखने का मौका देते जिससे कि आयोजन में कुछ गंभीरता आती। इस तथ्य से संभवत: सभी सहमत होंगे कि आज के समय के किसी आयोजन में जब तक हम युवा पीढ़ी को नहीं जोड़ते हैं तब तक उस कार्यक्रम में नयापन नहीं लाया जा सकता। अब समय आ गया है कि हम इस तरह के पूर्वाग्रह से मुक्त हों कि युवा पीढ़ी की रुचि इस तरह के कार्यक्रमों में नहीं होगी। यह पुरानी पीढ़ी का दायित्व होना चाहिए कि वे विविध तरह के प्रयासों, प्रोत्साहन से नई पीढ़ी के रचनाकारों को इस तरह के प्लेटफार्म पर आमंत्रित करें और उन्हें अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति को उजागर करने का मौका दें। अगर बुजुर्ग पीढ़ी भारतवंशियों की युवा पीढ़ी को अपने से जुड़ने का अवसर प्रदान करती है तभी वह वास्तविक रूप से अपनी  कला, संस्कृति और विशेष रूप से विभिन्न उद्देश्यों के लिये स्थापित की गई संस्थाओं की गतिविधियों को संचालित करते रहने के दायित्व को अपनी अगली पीढ़ी को सौंप सकेंगे।
भारत से बाहर रहने वाले भारतवंशियों द्वारा संचालित विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों के संचालन के मद्देनजर यह प्रश्न भी उपस्थित होता है कि क्या वे सच में अपनी कलाओं, संस्कृति और साहित्य को सहेजने तथा उनसे अपनी भावी पीढ़ी को परिचित करवाने के लिए वाकई संवेदनशील हैं अथवा केवल अपनी स्थापित दुकानों को बनाये रखने के लिये येन-केन भ्रम बनाये रखने का प्रयास करते रहेंगे। जबकि हमारा भविष्य इसी बात पर निर्भर करेगा कि हम किस तरह से अधिकाधिक लोगों को कला साहित्य की रचनात्मकता की मुहिम से जोड़ सकते हैं।

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