ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
लोक मतलब सामूहिकता और समानता
CATEGORY : जन्नत की हकीकत 01-Mar-2017 08:34 PM 770
लोक मतलब सामूहिकता और समानता

सन् दो हजार में पहली बार अमरीका जाना हुआ। अमरीकी राज्य ज्योर्जिया की राजधानी अटलांटा की धरती पर पाँव रखते ही एक रोमांच-सा हुआ। 1965 में अमरीका में गोरे अमरीकियों के गुलाम रह चुके अफ़्रीकी मूल की नीग्रो नस्ल के कालों के लिए मानवाधिकारों की माँग करने वाले अप्रतिम योद्धा और मिलेनियम मार्च के अगुआ और इसी अपराध(!) के कारण 1968 में मार डाले गए अमरीकी गाँधी मार्टिन लूथर किंग जूनियर की जन्मस्थली अटलांटा।
काले अफ़्रीकी-अमरीकी इतिहास से जुड़े यहाँ के बहुत से स्थानों, साहित्य और दृश्य-श्रव्य सामग्री के माध्यम से कई जानकारियाँ मिलीं। बाद में अन्य राज्यों में भी जाने का अवसर मिला। वहाँ भी सभी जगहों पर अमरीकी इतिहास में कालों की भूमिका और इतिहास को दर्शाने वाले बहुत स्थान, पुस्तकालय और म्यूजियम देखने को मिले। दुनिया के विभिन्न देशों में इतिहास लेखन को लेकर जिस कूटता, चालाकी और झूठ का सहारा लिया जा रहा है और इतिहास को विकृत किया जा रहा है वह हो सकता है किसी का तात्कालिक राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध कर दे, लेकिन कालान्तर में उस देश के लिए बहुत घातक सिद्ध होने वाला है। अमरीका में भी इस बारे में पूर्ण सत्यता की गारंटी नहीं दी जा सकती है, लेकिन तुलनात्मक रूप से उन्होंने इतिहास को कम विकृत किया है। और बहुत अप्रिय तथ्यों को भी साहस के साथ उजागर किया है जिससे यह सिद्ध होता है कि अमरीका की संकल्पना और अमरीकी संविधान रचना करने वाले लोग अपने समय के बहुत साहसी लोग थे।
मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने 1965 में काले लोगों के लिए मानवाधिकारों की माँग करते हुए मिलेनियम मार्च का आयोजन किया। इसके बाद एलेक्स हैली ने अपनी अफ़्रीकी वंशावली खोजते हुए प्राप्त तथ्यों को आधार बनाकर 1976 में एक उपन्यास "रूट्स" लिखा  जिस पर अमरीका का सबसे अधिक देखा जाने वाला सीरियल भी बना। लेकिन इसकी नींव रखने वाली थीं रोज़ा पार्क (1913-2005) जिन्होंने 1955 में बस में बैठने के अपने अधिकार के लिए संघर्ष किया। कोई एक साल तक वहाँ के हजारों लोग बीसियों मील पैदल चलकर ड्यूटी पर जाते रहे लेकिन बसों में नहीं बैठे। अंत में यह असहयोग आंदोलन सफल हुआ। जूनियर किंग इन्हीं पार्क के कनिष्ठ साथी थे। और इन सबके पीछे रही है महान मानवतावादी अब्राहम लिंकन की परंपरा जो एक किसान का उदहारण देते हुए कहते थे- जब मैं अच्छा काम करता हूँ तो अच्छा अनुभव करता हूँ और बुरा काम करता हूँ तो बुरा। बस, मैं तो इतना ही धर्म जानता हूँ। तुलसी के शब्दों में - दया धरम का मूल है, पाप मूल अभिमान।
सोच सकते हैं कि काले गुलामों को खरीदकर उनसे पशुओं की तरह काम लेने वाले अमरीकी गोरों को गुलाम-प्रथा छोड़ने के लिए बाध्य करने वाले लिंकन की राह कितनी कठिन रही होगी। और उन काले गुलामों की पीड़ा कल्पनातीत। अफ़्रीकी देशों से लाए गए ये काले लोग कोई पशु नहीं थे। वे सब अपने समाजों के वैसे ही सामान्य और सम्मान्य सदस्य थे जैसे कि हम। उन्हें अपने आप को गुलाम स्वीकारने में कितनी पीड़ा हुई होगी और क्या वास्तव में उन्होंने कभी अपने मनुष्य होने को भुलाकर स्वयं को गुलाम मान लिया होगा? क्या पशु की तरह पूर्ण समर्पण कर दिया होगा?
वैसे उनके मालिकों ने इस दिशा में प्रयत्न तो अवश्य किए होंगे। अमरीका का काले गुलामों का इतिहास पढ़ने और एलेक्स हैली के आत्मकथात्मक उपन्यास को पढ़ते हुए इस प्रक्रिया से साक्षात्कार होता है कि "रूट्स" के नायक किंटे के आत्मसम्मान को तोड़ने के लिए कैसे-कैसे निर्मम उपाय अपनाए जाते हैं।
अपने देश, समाज और परिवेश से काटकर नितांत नए देश में लाए गए उस निरीह काले प्राणी को सबसे पहले एक नया नाम दिया जाता था जैसे कि पालतू पशु को उसका मालिक कोई नाम देता है। भाषा तो उसे वही बोलनी ही है जो उसके मालिक की है। अपनी भाषा बोलने पर पिटाई। धर्म कोई नहीं, पशु-पक्षी का भी कोई धर्म होता है क्या? कालान्तर में मालिकों ने गुलामों की आत्मा का उद्धार करने और ईश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए के लिए बहुत से गुलामों को ईसाई बनाया।
गुलामों के इतिहास को पढ़ने से ज्ञात होता है कि किस प्रकार उनकी भाषा, संवाद, संपर्क, सामाजिकता को योजनाबद्ध तरीके से समाप्त किया गया। उनके बच्चों को भी अपने माता-पिता के साथ नहीं रहने दिया जाता था। क्या पता इससे उनके बीच संबंध स्थापित हो जाए। बच्चों को संभालने का काम कोई बुढ़िया करती थी। गुलामों को जहाँ तक संभव हो आपस में मिलने का कम से कम अवसर दिया जाता था। एक स्थान पर उल्लेख है- एक मालिक कहता है, मुझे तलवार से इतना डर नहीं लगता जितना इन गुलामों का अपनी बोली में जोर-जोर से अपने गीत गाने से लगता है।
क्या हैं ये गुलामों के गीत? ये गीत, ये कविताएँ उनकी सामूहिकता है, उनका संगठन है, उनकी सम्मिलित शक्ति है, समानता के एक धरातल पर खड़ी उनकी विराट सत्ता है; श्रम से श्रांत किसानों मजदूरों के लिए हवा का एक झोंका है, तपती दोपहरी में ठंडे पानी की एक घूँट है, खैनी की एक चुटकी है, बीड़ी का एक कश है, उनको संगठित करने वाला, उन्हें निर्भय करने वाला एक मन्त्र है, जिससे किसी भी शोषक को, अन्यायी को, चोर को, डाकू को डर लगता है। इसलिए वे इस लोक साहित्य को, लोकगीत को, लोक कविता को, लोक नाट्य को, लोक के बल को डर, लालच, विभेद, धर्म, जाति, भाषा, व्यक्तिवाद, अस्मिता आदि कई नामों और रूपों से छलने, दलने, विभाजित करने के उपक्रम किए जाते हैं।
लोक साहित्य और कलाएँ मात्र मनोरंजन नहीं है या सुविधा संपन्न नागर जनों का मनबहलाव नहीं है। इनके संरक्षण और विकास के नाम पर जनशक्ति  के संवाद, मेल, सामूहिकता और संगठन को स्वत्त्वहीन करने के षड्यंत्र हैं। यदि हम चाहते हैं कि एक-एक करके हमारा शिकार न किया जा सके तो हमें खुद को अर्थात "लोक" को और उसकी कविता, कला, नृत्य, गीत आदि में छिपी भागीदारी की सामूहिकता हो बचाना होगा।
यदि अपने दो शे"रों में कहूँ तो-
आओ कसकर हाथ पकड़ लें
हम दोनों का साझा डर है।
बारिश-धूप नहीं रुकते पर
जैसा भी है अपना घर है।

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