ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
पचमढ़ी : एक शब्द चित्र
CATEGORY : कविता 01-Mar-2017 11:56 PM 1120
पचमढ़ी : एक शब्द चित्र

विन्ध्य की अंतिम हद को छूकर बहती,
पवित्र नर्मदा की अथाह जलराशि के पार,
सतपुड़ा की सुरम्य पहाड़ियों पर,
प्रकृति की अलौकिक छटाओं के बीच बसी-
सलोनी पचमढ़ी!

घुमावदार पहाड़ी रास्तों के ढ़लानों पर,
बेल, आम, नीम, साल, सागौन के
जाने-पहचाने, देखे-चीन्हें
और करधई, चिरचिटा, ककाई, दारु हल्दी...
जैसे कितने ही पौधों से पहली मुलाकात।
खूबसूरत फर्न, मरकत-हरित "हर्रा", लाल-कचनार,
तमाम दुर्लभ औषधीय वन सम्पदा से भरी,
गुलमोहर, अमलतास के बिखरते रंगों के बीच,
सदाबहार, पर्णपाती वनों से सजी-
सुहानी पचमढ़ी!

मनमोहक पुष्प वाटिका के बीच,
मँझोली पहाड़ियों पर "पाण्डव गुफायें",
पाण्डुपुत्रों के अज्ञातवास की आश्रयस्थली।
निकट स्थित "द्रौपदी कुण्ड"-
पांचाली की दिनचर्या की कड़ी,
उत्तुंग शिखर स्थित देवस्थल "चौरागढ़",
अदृश्य स्त्रोत नि:सृत धाराओं से स्नात्-
देवाधिदेव "महादेव"
पातालोन्मुख, गहरी गुफाओं में-
भस्मासुर से छिपकर बैठे "जटाशंकर",
पुराणों का जादू- बिखेरती...,
जनमानस को आस्था से अभिभूत करती,
पावन पचमढ़ी!


चतुर्दिक सतत् प्रवाहित धारायें और प्रपात,
"जमुना", "रजत", "जलावतरण", मानो स्वर्ग की सौगात।
सुन्दर भवन, वाटिकायें, उद्यान और चर्च,
गौरवपूर्ण स्वतंत्रता को रेखांकित करता-
स्वतंत्र भारत के "प्रथम पुरुष" का रोपा वटवृक्ष।
पुरातन सभ्यताओं की विकास यात्रा के साक्षी-
माँडा-देव, निम्बू-भोज, जंबुदीप, भ्रांतनीर
धुआंधार के शैलाश्रय,
और उनकी दीवारों पर अंकित अद्भुत भित्तिचित्र
वक्त के बहाव में ठहरी सी-
निराली पचमढ़ी!

और अब सबसे ऊँचे शिखर की ओर,
कुछ और ऊँचाई पर-
पचमढ़ी की हर सुहानी सुबह और
खूबसूरत शाम को एक नया अर्थ देता-
उतना ही सुहाना "धूपगढ़",
पूरब में - हर दिन सूर्योदय होने पर,
हजारों वर्ष पहले छिटके लावे से बनी,
दो सहोदर पहाड़ियां-
एक छोटी और दूसरी कुछ ऊँची,
घने जंगल के निस्संग एकान्त में-
आमने-सामने खड़ी,
उसी लावे से बनी कपासी, काली मिट्टी वाली,
गहरी..., हरी-भरी घाटी को दिन भर निहारती,
और रात भर फिर इंतजार करती,
सूरज की पहली किरन का
जिसकी उजास से भरकर हर सुबह हो आती है जीवन्त,
और घाटी - और भी ज्यादा हरी-भरी।
नित नवेली पचमढ़ी!


अब पश्चिम की ओर -
"धूपगढ़" का अगला पड़ाव "सूर्यास्त बिन्दु",
हौले-हौले, मंधर गति से ढ़लता जाता दिन,
चीं-चीं, चूँ-चूँ चहकती चिड़ियों का कलरव,
प्रतीक्षारत अपार भीड़,
इंतजार इक जादुई पल, दिवस के अवसान का,
सारी निगाहें सूरज के मद्धम पड़ते गोले पर,
आसमान के पल-पल बदलते रंगों पर,
और - जाती उजास को शान्त भाव से
आत्मसात् करती प्रकृति पर,
चिर प्रतीक्षित, सुन्दर सूर्यास्त।।
सूरज के उगने-ढलने का जादुई मंजर सहेजती,
सम्मोहक पचमढ़ी!

धीमे कदमों से अपने ठिकानों को लौटते यात्री-
प्रसन्न, परिपूर्ण, पुलकित,
गहराती जाती सांझ, और आस-पास के पेड़ों से
कानों में पड़ता पक्षियों का तीव्र कोलाहल
मानो कहता-
"अच्छा गुजरा दिन, खूब रही चहल-पहल,
सुकून भरी रात के बाद-
इंतजार रहेगा - आना फिर कल।"

वापसी में -
हौले-हौले हिलते विदाई देते वृक्ष,
पत्तों से छन कर आती सुनहरी धूप,
बार-बार पेड़ पर चढ़ती उतरती,
अपने साथी के साथ खेल करती-
सुनहरी-काली, चंचल गिलहरी,
जीवन्त प्रकृति, मुखर मौन,
महुवे की मीठी गंध, मन्द पवन,
हर जाने वाले को एक बार फिर
आने का निमंत्रण देती
सदाबहार, मनमोहक
दर्शनीय पचमढ़ी।।

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