ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मानस प्रबंधन अंग्रेजी से अनुवाद राजेश करमहे भाग : तीन
CATEGORY : अनुवाद 01-Jul-2016 12:00 AM 1832
मानस प्रबंधन अंग्रेजी से अनुवाद राजेश करमहे भाग : तीन

सामान्य बोध में असामान्य क्या है?
1776 के आरम्भिक समय में, जब थॉमस पेन लोगों को प्रेरित कर रहे थे; अमेरिका की ब्रिाटिशा शाासन से स्वतंत्रता प्रायः सन्निकट थी। यह जुलाई में घटित भी हुआ। पेन के प्रेरित करने वाले चिट्ठे का शाीर्षक था - सामान्य बोध। लोगों ने इसे लिया और अवलोकन किया। सामान्य बोध की ऐसी शाक्ति थी। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सामान्य बोध का अनेक उपयोग है।
किताबी ज्ञान, प्रज्ञा के बिना मूल्यहीन है। सामान्य बोध व्यवहार का मर्म है। यह प्रशाासन की आत्मा है। कार्य-व्यापार में सामान्य बोध के अभाव से अनेक समस्याएँ उभरकर सामने आती हैं। अगर व्यक्तिगत व्यवहार में सामान्य बोध का अभाव हो, तो अंतर-वैयक्तिक सम्बन्ध प्रभावित हो जाता है। अच्छे प्रोफेशानल (व्यवसायी) के लिए कोई विशोष योग्यता नहीं होती है, सिवाय सामान्य बोध के। यह कहा गया है कि बिना सामान्य बोध के शिाक्षा से बेहतर है बिना शिाक्षा के सामान्य बोध होना। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अत्यधिक तेज दर से विकास होने के साथ-साथ आज अन्य समय की अपेक्षा सामान्य बोध की बराबर रूप से ज़्यादा ज़रूरत है। यह सच है कि थोड़े से सामान्य बोध से ज़्यादातर लड़ाईयों और झड़पों से बचा जा सकता है। लेकिन वत्र्तमान रुझान सामान्य बोध के कमते स्तर को दिखाता है। रिक आर्चर ने सामान्य बोध का मृत्यु संवाद लिखा। उनके शाब्द शाब्द इस प्रकार हैं - एक चेतावनी देती सच्चाई :
आज हम प्रिय वृद्ध मित्र, सामान्य बोध के गुजर जाने का शाोक प्रकट करते हैं, वे हमारे साथ वर्षों तक रहे। निशिचत रूप से कोई नहीं जानता है कि वे कितनी उम्र के थे, चूँकि बहुत पहले उनके जन्म का विवरण नौकरशााही के लाल धागे में गुम हो गया। वे ऐसे बहुमूल्य पाठ की नींव रखने के लिए जाने जाएंगे : जानकर कि वर्षा ऋतु में कब आना है; / शाीघ्रगामी चिड़ियाँ कीड़े को पाती है; / ज़िंदगी सदैव सुंदर नहीं होती; / हो सकता है यह मेरा दोष हो।
सामान्य बोध सरल और मजबूत वित्तीय नीतियों (कमाई से ज़्यादा खर्च मत करिये) और वि·ासनीय रणनीतियों (बच्चे नहीं वयस्क प्रभार में हों) के साथ ही जीवित रहा। सामान्य बोध का स्वास्थ्य तब तेजी से बिगड़ना शाुरू हो गया, जब पूर्व अभिप्राय से लेकिन अति भारी भरकम विनियमन को लागू कर दिया गया। छह वर्षीय बच्चे पर अपनी सहपाठी का चुम्बन करने पर यौन उत्पीड़न का आरोप; खाना खाने के बाद गुटके का सेवन करने के कारण किशाोर का विद्यालय से निलम्बन और उद्दंड छात्र को सजा देने पर शिाक्षक के नौकरी से निकाले जाने जैसी खबरों ने सामान्य बोध की स्थिति बदतर कर दी।
सामान्य बोध ने तब अपना वजूद खो दिया जब माँ बाप अपने उद्दंड बच्चों को अनुशाासित करने के बजाए शिाक्षकों पर आक्रमण करने लगे। यह तब बद से बदतर होता गया जब विद्यालय को छात्र के लिए उसके माँ-बाप से बुखार की दवा की, धूप की जलन से बचाव का मलहम या घाव की पट्टी की स्वीकृति लेने की ज़रूरत होने लगी, लेकिन जब जब एक छात्रा गर्भवती हो गई और उसने गर्भपात कराना चाहा, तब वे माँ-बाप को सूचित नहीं कर सके।
सामान्य बोध ने अपनी जीजिविषा को खो दिया, क्योंकि दस ई·ारीय आदेशा निषिद्ध हो गए, गिरिजाघर व्यापार हो गया और अपराधी से पीड़ित की अपेक्षा बेहतर सलूक किया जाने लगा।
सामान्य बोध मारा गया जब आप अपने ही घर में अपने आप को लुटेरों से बचा नहीं सके और न ही लुटरे आप पर घायल करने के लिए नालिशा कर सके।
सामान्य बोध ने अन्ततः जीने की आशाा तब छोड़ दी, जब एक महिला भाप निकलते हुए कॉफी कप को गर्म महसूस कर पाने में नाकाम रही। उसने थोड़ी कॉफी अपनी गोद में गिरा ली और उसे त्वरित गति से एक बड़े मुआवजे की राशिा का भुगतान किया गया। सामान्य बोध को उसके माँ-बाप, सत्य और विशवास; उसकी पत्नी, विवेक; उसकी बेटी उत्तरदायित्व और उसके पुत्र कारण के द्वारा मृत्यु की ओर धकेला गया।
उसके तीन सौतेले भाई जीवित रहे; मैं अपना अधिकार जानता हूँ, किसी दूसरे पर दोष मढ़ो और मैं पीड़ित हूँ।

क्यों ज़रूरतमन्दों को सुरक्षित सेक्स को बढ़ावा देना चाहिए?
एक बुजुर्ग औरत, जिसे तीन पीढ़ियों के पुरुष और महिला के सम्बंधों का अनुभव था, ने कहा, "सुनो बच्चे! प्रेम पवित्र होता है।' विवाह और प्रेम में कुछ भी उभयनिष्ठ नहीं है। हम परिवार पाने के लिए विवाह करते हैं, समाज के निर्माण के लिए हम परिवार का सृजन करते हैं। समाज विवाह के बिना फैल नहीं हो सकता है। अगर समाज को एक हार कहें तो प्रत्येक परिवार इसकी एक कड़ी है। इस कड़ी के जोड़ को बनाये रखने के लिए हमें सदा एक ही व्यवस्था रूपी धातु की ज़रूरत होती है। जब हम विवाह करते हैं, हमें उचित शार्तों को निशिचत रूप से साथ-साथ लाना चाहिए; हमें सौभाग्य को मिलाना चाहिए, समान नस्लों को मिलाना चाहिए और समान ध्येय अर्थात् धन-सम्पदा और बच्चों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। मेरे बच्चे, हम सब एक ही बार शाादी करते हैं क्योंकि संसार हमसे यह अपेक्षा रखता है, लेकिन अपने जीवन काल में हम बीसियों बार मोहब्बत करते हैं, क्योंकि प्रकृति ने हमें इसी तरह बनाया है। देखो, शाादी-ब्याह एक कानूनी व्यवस्था है, लेकिन प्रेम मूल भाव है, जो कभी सीधे-सीधे तो कभी टेढ़े-मेढ़े मार्ग पर हमें धकेलता है। संसार ने हमारे जैवीय मूल भावों को नियंत्रित करने के लिए इन कानूनों को बनाया है, क्योंकि ऐसा करना समाज व्यवस्था को कायम रखने के लिए ज़रूरी था; लेकिन हमारे मौलिक भाव सदैव ज्यादा ताकतवर होते हैं और हमें उनसे ज्यादा प्रतिरोध नहीं करना चाहिए। क्योंकि मौलिक भाव ई·ार प्रदत्त हैं, जबकि विधि-व्यवस्था मानव निर्मित प्रावधान हैं। अगर हम अपने जीवन को यथासंभव प्रेम से सुगन्धित नहीं करेंगे, जैसा कि हम बच्चों की दवा में शाहद मिलाकर करते हैं; तो फिर सामान्य रूप में इसे कोई ग्रहण नहीं करेगा।
- गाए दे मौपासां
सेक्स पर खुलकर बातचीत करने का समय आ गया है। सेक्स मौलिक ज़रूरत है। इस ज़रूरत को पूरा करने के लिए ज़रुरतमंदों को सुरक्षित साधनों और व्यवहार को प्रयोग में लाना चाहिए। हस्तमैथुन के विषय में गलत धारणाएं हैं। इस अंधवि·ाास के चलते लोग बलात्कार और असुरक्षित सेक्स जैसे मारक तरीके को अपनाते हैं, जिससे एच.आई.वी./ एड्स जैसा मारक संक्रमण हो सकता है। आधुनिक विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि हस्तमैथुन सुरक्षित और स्वस्थ आदत है; इससे बलात्कार और एड्स को दूर रखा जा सकता है। अतएव, हर किसी को अज्ञानता से बाहर निकलना चाहिए।
डॉ. चंद्रपाल देवानी का अवलोकन है, "सेक्स बहुत उत्तेजक होता है। यह पुरुष और स्त्री के जीवन और आनंद के लिए भोजन की तरह आवशयक है। सुरक्षित और भयरहित सेक्स अधिकतम आनंद और संतुष्टि देता है। सेक्स सहमति से होना चाहिए। यह पूर्वनियोजित हो न कि तत्क्षण। अज्ञात लोगों या अनधिकृत वेशयाओं से सेक्स को टालना चाहिए। नियंत्रित अवस्था में कोई भी आनंददायक, भयरहित और संतुष्टिदायक सेक्स कर सकता है।'
शाादी-ब्याह सामाजिक मान्यता प्राप्त भयरहित सेक्स सम्बन्ध बनाने के लिए स्थापित संस्था के अलावे कुछ भी नहीं है। बहुत सोच-विचार करने के बाद हमारे पूर्वजों ने शाादी-ब्याह की संस्था के अलावे समाज अधिकृत वेशया व्यवस्था को खोजा, ताकि समाज में सामान्य व्यवहार की प्रवृत्ति बनी रहे। अन्यथा, सेक्स से संबंधी असंतुष्टि से असम्बद्ध व्यक्तित्व का विकास होता है।

क्या अच्छी नींद सचमुच ज़रूरी है?
ह्मदय कभी नहीं सोता है। फेफड़े कभी नहीं सोते हैं। रक्त-संचरण कभी नहीं रुकता है। मष्तिष्क लगातार काम करता रहता है।
गति का अर्थ जीवन है। इस तरह से, शारीर को कभी भी सोने की ज़रूरत नहीं पड़ती है। बस आराम की ज़रूरत होती है।
आराम दो तरह का होता है- पहला, सचेतन आराम, जैसे लेटना, योग, संगीत सुनना, जप-ध्यान आदि; जबकि दूसरा अचेतन आराम है नींद। अगर नींद को आराम के रूप में लें, तो यह अच्छा है। अगर नींद को बस नींद के वास्ते ही समझेंगे, तो यह खतरनाक है। इसी कारण कुछ लोग नींद में ही मर जाते हैं। विशोषज्ञ कहते हैं कि सचेतन आराम सदैव अचेतन आराम अर्थात् नींद से बेहतर है। क्योंकि किसी चिकित्सकीय आपात स्थिति में, सचेतन आराम तुरंत चिकित्सकीय हस्तक्षेप का अवसर देता है।
एक अध्ययन, जो लम्बे समय अंतराल तक सोने को बढ़ावा नहीं देता है, का कहना है कि देर तक सोने से रक्त का प्रवाह धीमा हो जाता है, परिणामस्वरूप ह्मदय की आंतरिक धमनियों में ब्लाक का जमाव हो जाता है और ज्यादा समय तक जमाव से धमनियाँ अवरुद्ध हो जाती हैं।
बेंजामीन फ्रेंकलिन ने कहा था, "मरने के बाद अत्यधिक समय होगा। अतएव ज़िन्दगी जीने के लिए है। जागो और कुछ करो।'

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