ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
साबरमती के तट पर
CATEGORY : स्मरण 01-Oct-2016 12:00 AM 2575
साबरमती के तट पर

साबरमती नदी के तट को सीमेंट का बना दिया गया है। दूर से देखने पर अब वह पेरिस की सेन नदी के तट की फूहड़ आकृति जान पड़ता है। साबरमती के ही तट पर गांधी आश्रम, जिसे "साबरमती आश्रम"  नाम से जाना जाता है, स्थित है। यह आश्रम महात्मा गांधी और उनके करीब 20 सहयोगियों के लिए 20वीं शताब्दी के दूसरे दशक में बनाया गया था।
अभी हाल में संयोग से मैं वहां गया था। आश्रम से जुड़ा हुआ गांधी स्मारक है। इसे देश के प्रसिद्ध वास्तुकार चाल्र्स कोरिया ने परिकल्पित किया है। यह बिना दीवारों के अत्यंत खुला हुआ और उजला स्थापत्य है। इसमें कुछ जगहों को दीवारों से घेरा भी गया है। इन घिरी हुई जगहों यानि कमरों में महात्मा गांधी की तस्वीरें प्रदर्शित हैं।
एक तस्वीर में गांधी जी किसी छोटे सरोवर में नहा रहे हैं। एक तस्वीर में वे नौवाखली की एक टूटी हुई दीवार के बीच से निकल रहे हैं। एक चित्र में वे बा की गोद में खेल रहे एक बहुत छोटे से बच्चे की अंगुलियां पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं। यहां एक तस्वीर गांधी जी के पिता और एक तस्वीर उनकी मां की भी लगी है।
जिस समय मैं इन तस्वीरों को देख रहा था, अहमदाबाद में शाम घिर आई थी और गांधी संग्रहालय के बाहर मानो देश भर की चिड़ियां इकट्ठा होकर चहचहा रही थीं। हम चिड़ियों की चहचहाहट के बीच गांधी जी के जीवन के विभिन्न ऐतिहासिक और आत्मीय क्षणों से दो-चार हो रहे थे। साबरमती आश्रम में एक कुटी बल्कि छोटा-सा मकान ऐसा है जिसमें गांधी और कस्तूरबा रहा करते थे।
"गांधी जी का इस घर में कोई व्यक्तिगत कमरा नहीं था।" लता बता रही थीं।
लता बेहद सौम्य व्यक्ति हैं और गांधी आश्रम के आगंतुकों को आश्रम को समझने में सहायता करती हैं। वे बाहरी बरामदे के एक कोने के बाद के कमरे को दिखाती हुई बताती हैं कि गांधी जी देशी-विदेशी मेहमानों से इसी कमरे में मिला करते थे। कमरे की जालियों में झांककर मैंने देखा कि वहां एक गद्दी बिछी है और उसकी किनार पर तकिया रखा है। पास ही बेहद खूबसूरत चरखा रखा है।
"बापू जब भारत लौटकर आए, उन्हें वह चरखा कहीं देखने को भी नहीं मिला, जो वे बचपन में देखा करते थे। यह चरखा ढूंढकर लाया गया पर समस्या यह थी कि गांधी जी को इसे चलाना नहीं आता था। पास के गांव से एक व्यक्ति को आमंत्रित किया गया कि वह आकर गांधी जी को चरखा चलाना सिखाए।" लता जी ने बताया।
मेरे साथ गुजराती कवि और रंगकर्मी प्रवीण पंड्या और उनके रंग समूह के एक युवा कलाकार जफर थे। प्रवीण अहमदाबाद के नागरिक हैं। बरसों से वहां रंगकर्म कर रहे हैं। उन्होंने प्रसिद्ध संस्कृत रंगकर्मी और रंगस्थापित गोवर्धन पांचाल के साथ नाटक किए हैं। अब वे अपना रंगमंडल संचालित करते हैं। वे गांधी जी की कुटी के बाहर बरामदे की ओर इशारा करते हुए बोले- "जब नेल्सन मंडेला भारत आए थे, उन्होंने इसी जगह खड़े होकर अपना वक्तव्य दिया था। हम गांधी कुटी के भीतर गए। वहां बीच तरफ बरामदे से घिरा छोटा सा मगर सुंदर आंगर था। बरामदे के एक कोने में छोटा सा गड्ढा था। यह ओखली है। यहां गांधी जी के लिए नीम की चटनी तैयार की जाती थी।"
लता जी ने बताया।
उस ओखली को देखकर मुझे सिहरन सी हो गई। लगा मानो मेरी आंखों से सामने वह पूरा घर नब्बे वर्ष पुरानी आवाजों से भर गया है। गांधी जी खाने की थाली का इंतजार कर रहे हैं, घर के भीतर से कोई शायद बा उनके लिए छोटी-सी ओखली में तेजी से नीम की पत्तियां पीस रही हैं। गांधी जी रसोई में बैठकर खाने की नहीं अंग्रेजों से निपटने की अगली युक्ति के बारे में सोच रहे हैं। भीतर के तीन कमरों में से एक रसोईघर है, एक बा का कमरा है और एक कमरा वह है जिसमें आश्रम की महिला अतिथि ठहरा करती थीं।
"यहां कई बार सरोजिनी नायडू रुकी थीं।" बा के कमरे की खिड़की इस तरह लगी है कि डूबते सूरज की किरणें कमरे के भीतर चुपचाप फैल गई।
"इस कमरे में हमेशा धूप और रोशनी आती है।" "बा ने सोच-समझकर यह कमरा अपने लिए चुना होगा।" मैंने कहा। "यहां आने वाले पुरुष अतिथि कहां ठहरते थे?" मैंने पूछा। लता जी मुस्कुराई और वे खिड़की से बाहर देखते हुए बोलीं- "आपको वह इमारत दिखाई दे रही है, जो इस छोटे से मैदान के दूसरी ओर है। उसे "नंदिनी भवन" कहा जाता है। सरदार पटेल भी वहीं रहते थे। उसका नाम नंदिनी भवन इसलिए रखा गया था क्योंकि वह आनंददायी इमारते हैं।"
मैंने खिड़की से बाहर झांका मैदान में एक गोरे दंपत्ति कुछ बच्चों को फुटबाल खेलना सिखा रहे थे। सबसे पीछे लाल रंग की दीवारों का नंदिनी भवन बढ़ते अंधेरे में धुंधला सा दिखाई दे रहा था। हम गांधी जी की कुटी से बाहर निकलकर मैदान के एक और किनारे की ओर बढ़े। वहां एक छोटी सी कुटी बनी थी, जिसके ऊपर विनोबा भावे और मीरा बेन का नाम लिखा था। अब तक चारों तरफ अंधेरा छा चुका था। हम गांधी आश्रम में धुंधलाती हुई इमारतों के बीच गांधी और उनके आसपास के जीवन की कल्पना करते हुए धीरे-धीरे आश्रम से बाहर जा रहे थे।


साबरमती आश्रम में गांधी जी की कई चीजें सहेजकर रखी गई हैं।
वहां वह चरखा भी बड़े करीने से रका है जिसे भारत लौटकर आने
के बाद उन्होंने मंगवाया था। चरखा चलाना सीखने के लिए
उन्होंने गांव के एक व्यक्ति से मदद ली थी।


हम गांधी जी की कुटी से बाहर निकलकर मैदान के एक और किनारे की ओर
बढ़े। वहां एक छोटी सी कुटी बनी थी, जिसके ऊपर विनोबा भावे और मीरा बेन
का नाम लिखा था। अब तक चारों तरफ अंधेरा छा चुका था। हम गांधी आश्रम
में धुंधलाती हुई इमारतों के बीच गांधी और उनके आसपास के जीवन की
कल्पना करते हुए धीरे-धीरे आश्रम से बाहर जा रहे थे।

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