ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
फ़िल्मों के विस्मृत इतिहास पुरुष निरंजन पाल
01-Jan-2017 12:34 AM 3145     

ब्रिटिश और भारतीय फ़िल्मों के निर्माण में साझेदारी की नींव रखने वाले फ़िल्म-कहानीकार, पटकथा लेखक, फ़िल्म निर्माता और साहित्यकार निरंजन पाल ऐसे पहले भारतीय थे, जिन्होंने अपनी कृतियों द्वारा भारतीय और योरोपीय संस्कृतियों का सुन्दर समन्वय किया। वे इन दो संस्कृतियों का संगम ही नहीं बने, बल्कि साहित्य और फ़िल्मों की दो विधाओं को जोड़ने वाले सेतु भी बने। उन्होंने रंगमंच की मुख्यधारा के लिये नाटक लिखे, जिनका लन्दन के मुख्यधारा के बड़े थियेटर्स में सफल मंचन हुआ। वे ऐसे पहले भारतीय फ़िल्मकार थे, जिसने प्रथम महायुद्ध में भाग लेने वाले भारतीय सैनिकों पर डाक्युमेंटरी बनाई और जिनकी फ़िल्म लाइट ऑफ़ एशिया (1925) का तत्कालीन ब्रिटिश सम्राट् जॉर्ज पंचम के महल विंड्सर कासल में प्रदर्शन किया गया।
कहते हैं कभी-कभी नियति व्यक्ति के जीवन की पूरी धारा को बदल देती है। ऐसा ही कुछ निरंजन पाल के साथ हुआ। वे अंग्रेज़ों के विरोधी क्रांतिकारी बनने जा रहे थे कि उनके पिता उन्हें उस दिशा से मोड़ते हुए डॉक्टरी की पढ़ाई करने लंदन ले आये। लंदन में भी वे क्रांतिकारी बन जाते, लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। वह उन्हें साहित्य और फ़िल्मों की ओर ले गई और वे नाटककार, उपन्यासकार, फ़िल्मों के कहानीकार, पटकथा लेखक और फ़िल्म-निर्माता बन गये।
बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों में भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में तीन अग्रणी राष्ट्रनेता थे- लाल-बाल-पाल, यानि लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चन्द्र पाल। निरंजन पाल, बिपिन चन्द्र पाल के सुपुत्र थे, लेकिन बिपिन चन्द्र पाल ने स्वयं स्वतन्त्रता सेनानी होते हुए भी पुत्र को इस क्षेत्र से दूर रखना उचित समझा। वे नहीं चाहते थे कि निरंजन पाल अंग्रेज़ों की जेलों की चक्की पीसे, काले पानी जाये या फाँसी के तख़्ते पर झूले। कई क्षेत्रों में पहल करने वाला ऐसा अद्भुत और सृजनशील व्यक्ति भारतीय फ़िल्मों के इतिहास में उच्च स्थान का अधिकारी था, लेकिन इतिहास ने उसके साथ कैसा क्रूर मज़ाक किया कि उसे पूरी तरह भुला दिया। हिन्दी के एक कवि जगन्नाथ प्रसाद शर्मा मिलिंद की मज़दूरों से सम्बन्धित एक कविता है- "हम पद्मनाल से छिपे विश्व जीवन में अपने ऊपर वैभव का कमल खिलाते। शोभा, सौरभ, मधु सब बाहर बँटते हैं, हम पंक गर्त के भीतर गलने जाते..." पद्मनाल यानि कमल ककड़ी स्वयं तो कीचड़ में डूबी रहती है, लेकिन उसके ऊपर अति सुन्दर और सुगन्धयुक्त कमल खिलता है। निरंजन पाल को भारतीय फ़िल्मों के इतिहास में इसी तरह का पद्मनाल बना दिया गया था।
निरंजन पाल को गुमनामी के इस अंधेरे से निकालने का श्रेय, लंदन स्थित संस्था, साउथ एशियन सिनेमा फ़ाउंडेशन (एसऐसीएफ), विशेषकर उसकी प्रमुख शोधकर्ता डॉ. कुसुम पन्त जोशी को जाता है। इस पूरे शोध को कार्य रूप देने के लिए ब्रिटिश हैरिटेज के लॉटरी फ़ंड ने 2010 में एसऐसीएफ को 32 हज़ार पाउण्ड का अनुदान दिया। इस दौरान भारत में निरंजन पाल के परिवार को ढूँढकर उनके पौत्र सिने छायाकार दीप पाल व पौत्री मलीटा मालेवार से सम्पर्क स्थापित कर निरंजन पाल की आत्मकथा हासिल की गई। ब्रिटिश फ़िल्म इंस्टीट्यूट और स्वयंसेवकों के एक पूरे ने दल ने निरंजन पाल के जीवन और कृतित्व को पुनरुज्जीवित करने में अहम भूमिका निभाई।
निरंजन पाल सन् 1908 में कोलकाता यानि कलकत्ते से लंदन आये थे। वे यहाँ 21 वर्ष रहे। सन् 1912 में वे डॉक्टरी की पढ़ाई छोड़कर अंग्रेज़ी रंगमंच से जुड़ गये और उसके लिये नाटक लिखने लगे। तब फ़िल्मों का दौर शुरू हो चुका था। निरंजन पाल नाटकों के अलावा फ़िल्मों के लिये कहानियाँ और पटकथाएँ लिखने लगे और फ़िल्में भी बनाने लगे। वे ऐसे पहले भारतीय थे, जिन्होंने सन् 1916 में प्रथम महायुद्ध में लड़ने वाले भारतीय सैनिकों पर "ऐ डे इन एन इंडियन मिलिटरी डिपो" (1916) नाम से डॉक्युमेंटरी बनाई थी। इसके पहले उन्होंने उस समय की दो मूक फ़िल्मों "द फेथ ऑफ़ अ चाइल्ड" (1915) और "द वेनजियेन्स ऑफ़ अल्लाह" (1915) की कहानी लिखी थी, जिन पर मार्टिन थॉर्नटन ने फ़िल्में बनाईं। इनके अतिरिक्त उन्होंने कई अन्य फ़िल्मों की कहानियाँ लिखीं, जिन पर 1920 के दशक में फ़िल्में बनाई गई और उनकी सारी शूटिंग भारत में की गई। निरंजन पाल की प्रसिद्ध फ़िल्मों में तीन प्रमुख हैं-  प्रेम सन्यास (लाइट ऑफ़ एशिया, 1925), शिराज़ (1928) और प्रपंच पाश (अ थ्रो ऑफ़ डाइस, 1929)। इनमें लाइट ऑफ़ एशिया महात्मा बुद्ध की जीवनी है, जो सर एडविन ऑर्नल्ड की इसी नाम की पुस्तक पर आधारित है। इसकी शूटिंग जयपुर और उसके आसपास की गई थी और तत्कालीन जयपुर नरेश ने इसके लिये हाथी-घोड़ों और शिकारी चीते समेत हर प्रकार के साधन उपलब्ध कराये थे। उस ज़माने में फ़िल्मी अभिनेताओं को आदर से नहीं देखा जाता था, इसलिये अच्छे अभिनेताओं का अभाव था। निरंजन पाल ने अपनी फ़िल्म के लिये "द इंडियन प्लेयर्स" नामक नाट्य मंडली के अभिनेता लिये थे और गौतम बुद्ध की भूमिका में विख्यात अभिनेता-फ़िल्म-निर्माता हिमांशु राय को उतारा था। "लाइट ऑफ़ एशिया" बाद में भी कई संकटों का शिकार हुई। इसका प्रदर्शन करने के लिये कोई अंग्रेज़ी फिल्म थियेटर तैयार नहीं था। तब निरंजन पाल ने ब्रिटिश सम्राट् जॉर्ज पंचम से अनुरोध किया था। उनकी स्वीकृति से जब इस फ़िल्म को विंडसर कासल में दिखाया गया, तब जाकर इसके भाग्यद्वार खुले।
निरंजन पाल ने सन् 1908 से लेकर 1929 तक के 21 वर्षों के लंदन प्रवासकाल में कई उल्लेखनीय रचनात्मक काम किये और अनेक क्षेत्रों में नई से नई पहल की। सन् 1929 में वे अपनी अंग्रेज़ पत्नी लिली और पुत्र कोलिन को लेकर हमेशा के लिये भारत चले आये। उनके लन्दन के सहयोगी हिमांशु राय और देविका रानी भारत में बॉम्बे टॉकीज की स्थापना कर चुके थे। निरंजन पाल बॉम्बे टॉकीज से जुड़ गए और उन्होंने "अछूत कन्या" (1936) समेत कई ऐतिहासिक भारतीय फिल्मों की कहानियां लिखीं।
एसऐसीएफ का यह "अ हिडन हेरिटेज निरंजन पाल - अ फॉरगोटन लैजेंड प्रौजेक्ट" (फ़िल्मों के विस्मृत इतिहास पुरुष निरंजन पाल - एक छिपी धरोहर प्रौजेक्ट) 2011 में सम्पूर्ण हुआ और इसकी ठोस उपलब्धियाँ- निरंजन पाल को विश्व सिनेमा के इतिहास के परिप्रेक्ष्य में रखने वाली, डॉ. कुसुम पन्त जोशी और ललित मोहन जोशी द्वारा संपादित एक दुर्लभ पुस्तक, "निरंजन पाल - अ फौरगोटन लैजेंड" के प्रकाशन के अलावा ललित मोहन जोशी द्वारा निर्देशित निरंजन पाल पर एक वृत्तचित्र का निर्माण और निरंजन पाल के कृतित्व पर एक विस्तृत प्रदर्शनी का आयोजन रही। लन्दन में निरंजन पाल के इन ख़ास आयोजनों में भाग लेने के लिए भारत से निरंजन पाल की पोती मैलिटा मालेवार विशेष रूप से आयीं।
लंदन के जाने-माने ब्रिटिश फ़िल्म इन्स्टिट्यूट के अलावा निरंजन पाल की इस पुस्तक का विमोचन 2012 में मुंबई में प्रसिद्ध सिनेकार श्याम बेनेगल और राष्ट्रीय फ़िल्म अभिलेख़ागार, पूना में जाने माने पत्रकार, स्वर्गीय दिलीप पडगांवकर ने किया।
श्याम बेनेगल के अनुसार निरंजन पाल पर कुसुम पन्त जोशी की शोध भारतीय फ़िल्म इतिहास में एक मील का पत्थर है क्योंकि इसने सिने इतिहास के उस ख़ालीपन को भरा है जिस पर इसके पहले भारत या पक्ष्चिम में किसी की नज़र नहीं गई थी।
स्व. दिलीप पडगांवकर ने तो निरंजन पाल की इस पुस्तक पर टाइम्स ऑफ़ इंडिया में एक संपादकीय तक लिख डाला, जिसमें उन्होंने कहा कि "भारतीय सिनेमा की शताब्दी पर ऐसी पुस्तक भारत में लिखी जानी चाहिए थी, पर इस कमी को बखूबी जोशी दम्पति ने लन्दन से पूरा किया है। निरंजन पाल की ये पुस्तक सिनेमा पर भविष्य की कई और पुस्तकों की भूमिका बनेगी."

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