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प्रकृति अनंत
01-Dec-2016 12:00 AM 2601     

प्रकृति

एक आम, मामूली-सी पहाड़ी-सी लड़की
सीढ़ीनुमा खेतों में  बेफ़िक्र घूमती-सी लड़की
देखकर जल जाए कोई ख़ुशगवार-सी लड़की,
पर कुछ ख़ास नहीं, क्यों? आकर्षक-सी लड़की।
 
हिमालय की वादियाँ ही जिसकी दुनिया,
यहीं पाती वह अपनी सारी ख़ुशियाँ
दिन भर माँ का हाथ बँटाती
रात को उसी के आँचल में सो जाती।

अनंत

कैसी यह बेरहम ज़िंदगी
शून्य से शुरू शून्य पर ख़त्म
बिना बताए, बिना पूछे मिल जाती
क्या इसका कोई मतलब नहीं

लाया कोई हमें इस संसार में क्योंकर?
क्या मन बहला रहा ईश्वर,
खिलौने बना-बनाकर?
क्या उद्देश्य इतना ही, मनोरंजन हो उसका?
अरे रुको! या कदाचित् इससे कुछ ज़्यादा?

शून्य बढ़ा देता है मूल्य, दस गुना
फिर और दस गुना
कहीं चाहता यही तो नहीं
सो हमारा यह जीवन बुना
बनें अपने युग के आर्यभट
बनाए नित नए कीर्तिमान
अपने साहस, बुद्धि और त्याग से
करें समाज का नवनिर्माण
कर जाएँ समाज के लिए कुछ ऐसा
जो किसी ने कभी ना किया हो वैसा
देख रहा है वह,
कौन बढ़ा पाता है
शून्य को कितने गुना
क्या पीछे छोड़ जाएगी
उसकी संतान
अपने क़दमों के निशाँ?

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