ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
पुत्र के नाम
01-Oct-2016 12:00 AM 3396     

मेरी मौत एक दिन
कागज का टुकड़ा
बन कर
तुम तक पहुंचेगी...
 
तुम शून्य में ताक कर
एक बारगी
बस रंगहीन होगे
और पल भर में
कागज का टुकड़ा
मरोड़ कर
रद्दी की
टोकरी में फेंक दोगे...
 
फिर अपनी चेतना को
सांकल लगा कर
दिनचर्या में
लग कर भूल जाओगे
सांय तक कि
दफ्तर की टोकरी में
तुम्हारी माँ के
मरने की मुड़ी-तुड़ी
खबर पड़ी है...
 
शाम को घर
जाते जाते
एक सिगरेट
सुलगा कर
कार में बैठोगे
खिड़की का शीशा
उतार कर
धुआँ उगल डालोगे...

 
और कहोगे
अपने आप से
इतना भी क्या है
एक व्यक्ति के
मरने का दुःख
जबकि रोज़
अखबार के पन्नों में
कितनी ही लाशें
लिपट कर आती हैं...
 
और हम बिन देखे
बिन महसूस किये
मौसम की
खबर पढ़ते हैं
लॉटरी के
नम्बर देखते हैं
थिएटर में बदलने वाले
चित्रों पर हमारी
दृष्टि जाती है...
 

ऐसे में एक माँ के
न रहने से
धरती खाली
न हो जायगी...

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