ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अंग्रेजी के गुण और दोष
01-Sep-2016 12:00 AM 5500     

जब से भारत में राष्ट्रीयता का आविर्भाव हुआ, लोग अंग्रेजी शिक्षा के विरुद्ध बहुत-सी बातें कहने लगे हैं। इस शिक्षा का सबसे बड़ा दोष यह बताया जाता है कि इसके कारण भारत के शिक्षितों और अशिक्षितों के बीच एक खाई-सी खुद गई और जो भी आदमी ग्रेजुएट हुआ, वह अपने ही लोगों के बीच अजनबी बन गया। इसी प्रकार का अपरिचय अंग्रेजी शिक्षा वालों का उन लोगों के भी साथ है जो केवल हिन्दी, संस्कृत, फारसी, बँगला, तमिल या और देश-भाषाएँ पढ़कर शिक्षित हुए हैं। एक दूसरा दोष यह है कि अंग्रेजी सीखने के लिये जो श्रम किया जाता है, वह तो फिर भी सार्थक है, क्योंकि हम एक नई भाषा सीख लेते हैं, किन्तु इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र और अन्य सारी विद्याओं का अंग्रेजी में सिखाया जाना अनावश्यक बोझ है। यदि देश-भाषाओं के द्वारा हम विविध विद्याओं की शिक्षा देते तो युवकों के मस्तिष्क पर उतना बड़ा बोझ नहीं पड़ता, जितना अंग्रेजी के माध्यम से सीखने में पड़ता है। यह भी हुआ कि भाषा की साधना में सदैव लीन रहने के कारण, छात्रों का सारा मन साहित्यिक हो उठा, ज्ञान-संचय की विशेषता की ओर उनका ध्यान जोर से कभी नहीं जा सका। आज तक हमारे छात्र केवल इस चिन्ता से त्रस्त रहे हैं कि शुद्ध-शुद्ध अंग्रेजी लिखने की योग्यता वे कैसे प्राप्त कर सकते हैं। भाषा की योग्यता से अलग जो ज्ञान के अनेक क्षेत्र हैं, उनमें विचरण करने का अवकाश छात्रों को मिलता ही नहीं है। एक यह दोष भी बताया जाता है कि विदेशी भाषा के साथ जो विदेशी मनोदशा, विदेशी चिन्तन-पद्धति और विदेशी संस्कृति आई, उसे भारत के भीतर पचाने के क्रम में दो-तीन पीढ़ियों का समय व्यर्थ ही नष्ट हो गया।
किन्तु इस शिक्षा से, हानि की तुलना में, लाभ कुछ अधिक हुआ है, इसे अस्वीकार करने का प्रयास व्यर्थ है। वस्तुत: वर्तमान भारत का जन्म ही अंग्रेजी-शिक्षा-पद्धति की गोद में हुआ। जब अंग्रेज आए, भारत का बहुत ही बुरा हाल था। भारतवासी अपने इतिहास को भूल चुके थे, वे बाहर का तो क्या, अपने देश का भी भूगोल ठीक से नहीं जानते थे। वैयक्तिकता का विष जो भारत में बहुत दिनों से चला आ रहा था, इस काल में आकर और भी बढ़ गया था। समाज और देश के प्रति भी हमारा कोई कर्तव्य है, इस बात को लोग बिलकुल ही भूल बैठे थे। इस अवस्था के बीच पहले-पहले अंग्रेजी शिक्षा के द्वारा ही वह दल आविर्भूत हुआ, जिसका उद्देश्य सामाजिक था, जो केवल अपने को ही नहीं, अपने देश और समाज को भी पहचानने की इच्छा रखता था। समाज और देश के प्रति जो नवीन चेतना जगी, उसी के भीतर से हमारी राजनैतिक, सामाजिक और धार्मिक क्रांतियों का जन्म हुआ है। सामाजिक चेतना ही वह गुण है जो आज के औसत भारतवासी को प्राचीन अथवा मध्ययुगीन भारतवासी से विभक्त करता है और यह चेतना भारत को यूरोपीय सम्पर्क से मिली है। यह ठीक है कि भारतीय जनता को अशिक्षा एवं अंधविश्वास की जकड़बंदी से छुड़ाने अथवा उसके भीतर प्रगतिशील विचारों को प्रेरित करने का काम अंग्रेज शासकों ने नहीं किया, किन्तु नई विद्या के प्रचार से ये सारे कार्य आप-से-आप हो गए।
नई शिक्षा का एक अन्य श्रेष्ठतम परिणाम यह हुआ कि अंग्रेजी के भीतर से यूरोप के तेजपूर्ण विचारों का सेवन करते-करते शिक्षित भारतवर्ष की मानसिक एकता में वृद्धि हुई। संस्कृत के सार्वदेशिक भाषा होने के कारण, पहले भी सारा भारत एक था, किन्तु संस्कृत का भारत में जितना अंत:प्रांतीय प्रचार था, उससे कुछ अधिक प्रचार अब अंग्रेजी का हो गया। अतएव, भारत की भौगोलिक एकता अब कुछ और प्रबल हो गई एवं देश-भाषाओं की विभिन्न दीवारें जो एक भाषा-क्षेत्र को दूसरे भाषा-क्षेत्र से अलग किये हुये थीं, स्वयमेव छोटी हो गईं। फारसी के जरिए जो भाषागत एकता उत्पन्न हुई थी, वह दक्षिण तो पहुँची ही नहीं थी, उत्तर में भी रहकर बहुत कमजोर थी। किन्तु अंग्रेजी के सार्वदेशिक प्रचलन के कारण देश की एकता बहुत ही पुष्ट हो गई। आज भी हमारी एकता का सबसे बड़ा आधार अंग्रेजी भाषा ही है, जिसमें हमारी सरकार और संसद के अधिकतर काम चल रहे हैं। देश ने यह निर्णय किया कि जिस राष्ट्रीय एकता को आज अंग्रेजी संभाले हुए हैं, वह बोझ हिन्दी उठा ले और जनता अपनी देश-भाषाओं में ही अपना काम करे, किन्तु ऐसा लगता है कि यह कार्य, शनै:--शनै: ही पूरा होगा।
सबसे बड़ी बात यह हुई कि जब अंग्रेजी भाषा भारत में अपना पाँव फैला रही थी, ठीक उसी समय, यूरोप में स्वतंत्रता, राष्ट्रीयता, प्रजातंत्र और उदार भावनाओं के जोरदार आंदोलन चल रहे थे। अठारहवीं सदी में यूरोप के क्रांतिकारी विचारों के जो नेता उत्पन्न हुए, अनेक हलचलों और क्रांतियों के बाद उन्नीसवीं सदी में आकर उनके विचारों ने दर्शन का रूप ले लिया और वे यूरोप को आंदोलित करने लगे। विचारों का यह आंदोलन सहस्र धाराओं में चल रहा था एवं कविता, नाटक, उपन्यास, आलोचना, निबंध, दर्शन, भाषण और शास्त्रार्थ तथा राजनैतिक दलों एवं सरकारों के संगठनों में से, सब-के-सब, इन विचारों से, ओत-प्रोत हो रहे थे। फ्रांसीसी क्रांति का "स्वतंत्रता, समानता, और भ्रातृत्व" वाला महान् उद्घोष अब पिघलकर उदारतावाद में ढल गया था। खुद इंग्लैंड में उस समय कानूनी सुधारों को लेकर घमासान आंदोलन चल रहा था।
राज्य वही अच्छा है जिसमें अधिक-से-अधिक लोगों का अधिक-से-अधिक कल्याण हो, ये और ऐसे अनेक अन्य विचार इंग्लैंड में भी गृहीत होते जा रहे थे। इस सारे विचारों और आंदोलनों का उत्तराधिकार भारत को, आप-से-आप, प्राप्त हो गया, क्योंकि अंग्रेजी भाषा के द्वारा इस देश के चिंतक यूरोपीय विचारों के गहन संपर्क में थे। भारत वर्ष में अंग्रेजी की पुस्तकें और समाचार-पत्र धड़ल्ले से आ रहे थे, अतएव, यूरोप में चलने वाले वैचारिक आंदोलनों के साथ-साथ भारत अनायास सम्बद्ध हो गया एवं जिन भावनाओं की चोट से यूरोप के मस्तिष्क की शिराएँ थरथरा रही थीं, उन भावनाओं की चोट भारत को भी महसूस होने लगी। यूरोप की वैचारिक क्रांतियों में उस समय भारत ने अपना योगदान, विचारक की हैसियत से भले ही न दिया हो, किन्तु उनका प्रभाव ग्रहण करने में यह देश यूरोप से पीछे नहीं रहा।
कम्पनी सरकार की शिक्षा-नीति : कम्पनी सरकार भारतवासियों की शिक्षा की जिम्मेवारी लेने को तैयार नहीं थी। सरकार कई प्रकार की कठिनाइयों से डरती थी। सबसे बड़ी कठिनाई यह थी कि अगर सारी जनता को शिक्षित करने का कार्यक्रम बनाया जाए तो इस विशाल कार्य के लिए धन कहाँ से आएगा? दूसरी कठिनाई यह थी कि जनता को शिक्षित करना है तो यह शिक्षा किन-किन भाषाओं में दी जा सकती है। तीसरी कठिनाई यह थी कि यूरोपीय विद्याओं का ज्ञान अगर भारत में बिखेरना है तो वे विद्याएँ भारतीय भाषाओं में उतारी कैसे जाएँ? एक चौथी कठिनाई इस बात को लेकर थी कि अगर यूरोपीय ज्ञान भारतीयों को दिया गया तो वे स्वराज्य की मांग करेंगे और कम्पनी शासन के सामने मुसीबत खड़ी हो जायेगी।
कम्पनी का चार्टर हर बीस साल के बाद बदला जाता था। सन् 1793 ई. में जब कम्पनी को नया चार्टर दिया जाने लगा तब चाल्र्स ग्रांट (1746-1823) ने बहुत कोशिश की कि कम्पनी की जिम्मेदारियों में शिक्षा भी सम्मिलित कर दी जाए। लेकिन, उस समय, उसे कामयाबी नहीं मिली। परन्तु, उसी के उद्योग से सन् 1813 ई. वाले चार्टर में कम्पनी को शिक्षा की जिम्मेवारी दे गई और उस मद में उस समय केवल एक लाख रुपये रखे गए। बीस वर्ष बाद, जब 1833 ई. में कम्पनी को नया चार्टर दिया जाने लगा, तब यह रकम बढ़ाकर दस लाख कर दी गई।
चाल्र्स ग्रांट के विचार भारतवासियों के बारे में बहुत बुरे थे। भारतवासियों को वह मूर्ख, धर्म-आचार-विहीन तथा पतनशील समझता था। सबसे पहले उसी ने इस विचार को प्रोत्साहन दिया कि भारतवासियों के सुधार का एकमात्र उपाय यह है कि उन्हें अंग्रेजी पढ़ाई जाए। उसका कहना था कि जब विदेशियों को शिक्षित करना होता है, तब शिक्षा उन्हीं की भाषा में दी जाती है, यह ठीक है। लेकिन, भारत का हाल दूसरा है। वहाँ बहुत-से लोग खुद ही अंग्रेजी सीख रहे हैं। यह भी कि विजेता अगर विजित समाज को अपने रंग में रँगना चाहे तो इसका सबसे सुगम उपाय यह है कि वह उसे अपनी भाषा सिखा दे। मुसलमानों ने अपने शासनकाल में हिन्दुओं को फारसी पढ़ाई थी। नतीजा यह हुआ कि हिन्दू उन्हें अपने से श्रेष्ठ मानने लगे। यही नीति अंग्रेजों को भी अपनानी चाहिए। ग्रांट ने ब्रिटिश सरकार को सबसे बड़ा लोभ यह दिखाया कि अंग्रेजी के जरिए हिन्दुओं को ईसाइयत का पूरा ज्ञान हो जायेगा और ईसाइयत पर लट्टू होकर वे आसानी से क्रिस्तान हो जाएँगे।

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