ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
आदमी होना नन्ही-सी चिड़िया
CATEGORY : कविता 01-Apr-2017 12:58 AM 495
आदमी होना नन्ही-सी चिड़िया

आदमी होना

मैं पेड़ों की तरफ
पीठ करके चिल्लाऊंगा
ठीक तुम्हारे सामने
और पीछे खड़े पेड़ हिनहिनाएंगे
घोड़े की तरह जान जाएंगे
कि कभी पेड़ ही था मैं भी
मगर मुझे नहीं आया
पेड़ होना
और नहीं सीख पाया मैं
लकड़ियों के बीच रहकर जलना
और एक दिन
बाड़े में बंधी सारी भैंसें
खोल दूंगा मैं
कि समझोगे तुम पूंछ थी मेरी भी
मगर, नहीं आई रास मुझे पूंछ
और नहीं आया पूंछ से मच्छर भगाना
और एक दिन जब मैं तोड़ दूंगा
सारी दीवारें
नोच लूँगा परदे, कैलेंडर, पेंटिंग्स
जान लोगे तुम
कि मुझे कुछ भी होना नहीं आया
मगर नहीं जान पाओगे तुम
कि मुझे जब-जब नहीं आया
कुछ होना तब-तब
कुछ और होता चला गया मैं
और इस तरह बदलता रहा रूप
सृष्टि के प्रारम्भ से अब तक
कि हमें कुछ और होना है अभी
कि हमें अभी नहीं आया
आदमी होना।

नन्ही-सी चिड़िया

जब कोई नहीं होता तब भी होता है
कोई उन झाड़ियों के पीछे
हर चीज़ में मौजूद और उसे ढूंढते हुए
प्यालियों में भरी चाय का स्वाद
देखते हुए पीता है आदमी सिगरेट का धुंआ
हो जाती है हर चीज़
निःशब्द, महत्वहीन, निरर्थक
और लगने लगता है
एक उबाऊ जीवन का
बार-बार दोहराया जाना
नीरस, शून्य में शून्य तलाशता
दूर तक पहुंचते-पहुंचते लौट-लौट आता है
अकेला आदमी हर बार
बरसात में टपकती छत के नीचे
करता है हिसाब, जोड़-घटाव
माथे पर उभर आईं झुर्रियों को पोंछते हुए
गिनता है बाकी बचे पैसे
और आरामकुर्सी पर बैठा
धीरे से कर लेता है आँखें बंद
ऐसे में, हौले से उतर आती है आँगन में
एक नन्ही-सी चिड़िया।

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