ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
साहित्य पढ़ने की उम्र
CATEGORY : न्यूयॉर्क की डायरी 01-Nov-2016 12:00 AM 2368
साहित्य पढ़ने की उम्र

यह विचार कई दिनों से मेरे मन में आ रहा था कि साहित्य पढ़ने की क्या उम्र होनी चाहिए एवं किस उम्र में किस तरह का साहित्य आप पढ़ सकते हैं। मुझे अपने बचपन की एक घटना याद आती है जब मैं 11वीं की गर्मियों की छुट्टियों में एक उपन्यास पढ़ रहा था। तभी मेरी बड़ी बहन मुझसे शिकायत भरे स्वर में कहती है "कोर्स पूरा हो गया क्या जो उपन्यास पढ़ रहे हो। पिताजी ने अगले साल के कोर्स की किताबें लाकर रख दी हैं। मैं पिताजी को बताऊंगी कि भाई साहब उपन्यास पढ़ रहे थे।"
मेरा एक मित्र जो मेरे साथ थोड़े बड़े शहर से पढ़ने आया था। वह मेरे साथ कक्षा आठवीं से पढ़ रहा था, मैंने उसको तरह-तरह की किताबें (कोर्स के अलावा) पढ़ते देखा था, उसके बाद वह उन किताबों पर विमर्श भी किया करता था, (जिसने वह पढ़ी हो उनसे) महत्वपूर्ण यह है कि वह पढ़ने में भी प्रथम ही आता था एवं उसे अन्य विषयों की भी अच्छी जानकारी थी।
अगर फिर से मूल प्रश्न पर आएं कि यह कौन निर्धारित करेगा कि आप क्या पढ़ें या क्या ना पढ़ें। लेकिन बच्चों के सन्दर्भ में यह या तो मां-बाप निर्धारित कर सकते हैं या फिर शिक्षक। मां-बाप की साहित्य में कितनी समझ होगी इसकी उनसे ज्यादा अपेक्षा नहीं की जा सकती, परंतु शिक्षकों से तो की ही जा सकती है। लेकिन दूसरी ओर आज के शिक्षकों की योग्यता संबंधी सच्चाई को भी स्मरण रखना होता है कि उन्हें कोर्स की किताब पढ़ाना भर आ जाए यही बड़ी बात है, उनसे साहित्य की जानकारी की उम्मीद करना बेमानी है। मैं जब अपने शिक्षा के दौर को याद करता हूं एवं सोचता हूं कि मेरे कितने शिक्षकों का संबंध साहित्य से था तो ऐसे बहुत कम नाम याद आते हैं।
अब मैं बात करता हूं अमेरिकी शिक्षा तंत्र की। जब मैं न्यूयॉर्क आया तो मेरे बड़े बेटे ने आठवीं कक्षा एवं छोटे बेटे ने चौथी कक्षा में दाखिला लिया।
यहां पर मैं देखता हूं कि बच्चों को प्रति सप्ताह पढ़ने का होमवर्क दिया जाता है। कौन सी किताब पढ़ेंगे यह निर्धारण शिक्षक करते हैं एवं निर्धारित समय में किताब पूरी पढ़ी अथवा नहीं यह तस्दीक करने के लिये अभिभावक को हस्ताक्षर करने होते हैं।
आज मैं चाहते हुए भी कोई पुस्तक इसलिए शुरू नहीं कर पाता हूं कि समय कम है, कैसे पढूंगा, मनोरंजन के लिए टेलीविजन देखूं या फिर घूमने जाऊं।  फिर किताब पढ़ना ही है तो वह कितनी बड़ी है,  कितने पेज की है, आदि आदि अनेक सवालों का सामना करना पड़ता है। जबकि मेरा छोटा बेटा पांच सौ से छह सौ पेज की किताब दो से तीन दिन में पढ़ लेता है। यहां तक कि मेरे बड़े बेटे को एक बार नौवीं कक्षा में स्कूल द्वारा कुछ प्रतिबंधित पुस्तकें पढ़ने के लिए कहा गया। जब मुझे पता चला तो मैं अचंभित था, कि उन्होंने ऐसा क्यों। मैंने स्वाभाविक रूप से पिता होने के नाते "कैसी किताब है" की पहले पड़ताल की और जाना कि उसे प्रतिबंधित क्यों किया गया था। बाद में मैंने देखा कि बेटे ने बाकायदा किताब को पढ़ा एवं उसके ऊपर कुछ नोट्स भी लिए। उन नोट्स के ऊपर स्कूल में छात्रों के ग्रुप बनाकर चर्चा भी करवाई गई। मुझे लगता है कि इस देश में साहित्य का स्वाद बच्चों को उनके बचपने में ही लगा दिया जाता है।
अब बात करते हैं उपलब्धता की। अमूमन पूरे अमेरिका भर में लायब्रेरी की सदस्यता नि:शुल्क है। यहां की लायब्रेरियां अपने यहां के किसी बड़े स्कूल की तरह होती हैं। सभी सुविधाओं से सम्पन्न वे तीन से चार मंजिलों में फैली हो सकती हैं। यहाँ पर स्कूल एवं लायब्रेरी दोनों अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाते हैं। पब्लिक लायब्रेरी के अलावा यह जिम्मेवारी स्कूल की भी है कि वे भी बच्चों को पुस्तकें पढ़ने के लिए उपलब्ध करवाएं।
निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि जब तक भारत में हम अपनी नई पीढ़ी में पुस्तक को पढ़ने की रुचि विकसित नहीं करेंगे तथा साहित्य का निवेश नहीं करेंगे तो भविष्य में उसे आगे कौन पढ़ेगा तथा अपने साहित्य को कौन जानेगा। इसके अलावा कुछ नीतियां सरकार को भी बनानी होगी, कुछ निर्धारण मानक शिक्षाविदों को तय करने होंगे बिना किसी पूर्वाग्रह। और यह सब केवल नई पीढ़ी के समग्र विकास के लिए करना होगा।

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