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सुनो तुम्हारी भी कहानी है
01-Apr-2017 12:43 AM 4265     

तुम्हें तो पत्नी, पत्नी की सहेली या कामवाली बाई में कोई फर्क ही नजर नहीं आता था, तुम्हें तो बस एक नयापन चाहिये। कौन-कौन से फार्मूलों की बात किया करते थे तुम, जैसे बहुत बड़े साइंटिस्ट हो और इस बारे में गहरी रिसर्च कर रखी है।

बरसों बाद भारत लौटी हूँ। काफी कुछ बदला हुआ-सा है यहाँ! खासकर यहाँ के नौजवानों का लुक, अन्दाज़, चाल-ढाल, दाढ़ी-बालों का कट, बॉडी-बिल्डर जैसी बॉडी, जीन्स-टाइट टीशर्ट-शर्ट, कान में बाली, टेटू क्या कहते थे तुम "कूल डूड", बहुतेरे तुम्हारी तरह "कूल डूड" बन घूम रहे हैं और समझते हैं खुद को ग़ालिब। अजीब बात है इन्हें देखकर मुझे तुम्हारी कहानी याद आ रही है। चलो, आज मैं तुम्हें तुम्हारी ही कहानी सुनाती हूँ।
आज के सन्दर्भ में तुम्हारी कहानी दस साल पिछड़ी हुई है और दस साल पहले के सन्दर्भ में तुम्हारी कहानी दस साल आगे की कहानी है। तुम सोचोगे यह तो मेरी ही जिन्दगी का दर्पण है फिर मेरे लिए यह कहानी कैसे बन गयी क्योंकि तुम तो सब जानते हो। अंत भी जानते हो?
आज के संदर्भ में तुमसे दस साल पहले वाले तुम का जब मैं अपने शब्दों में परिचय करवाऊँगी तो तुम्हारे लिए यह कहानी ही होगी ना? अच्छा चलो सुनो! तुम्हें याद है किस तरह तुम जिंदगी को हल्के अंदाज़ में लेते थे, सिगरेट के धुएँ की तरह जिंदगी को छल्लों में उड़ाकर भरपूर जिया करते और रागिनी तुम्हारे जीवन जीने के इस तरीके को बहुत खामोश अंदाज़ में ले लेती थी, दुःखी रहती थी और तुम्हारे गुस्से और मजाक का विषय बना करती थी। ख्वाब तो तुम्हारे आसमान से ऊँचें थे महत्वाकांक्षायें समुन्दर से गहरी। गलत-सही का फर्क तुम्हें समझ में ही नहीं आता था। रिश्तों की सीमाएँ, तहज़ीब, लक्ष्मण-रेखा, दूसरों की भावनाएँ तुम्हें कुछ उनकी समझ भी थी क्या भला? कौन तुम्हारी मित्र है, कौन रागिनी की मित्र है तुम कब भला परवाह करते थे किसी के सामने कुछ भी कह देते थे।
हवस के पुजारी! तुम्हें तो पत्नी, पत्नी की सहेली या कामवाली बाई में कोई फर्क ही नजर नहीं आता था, तुम्हें तो बस एक नयापन चाहिये। कौन-कौन से फार्मूलों की बात किया करते थे तुम, जैसे बहुत बड़े साइंटिस्ट हो और इस बारे में गहरी रिसर्च कर रखी है। तुम श्रेष्ठ वक्ता थे। वैसे तुम थे भी एक जादूगर, तुम्हारा जादू तो सब पर चल ही जाता था। तुम कहते हम सब सुनते। तुम्हें सुनने के बाद सही-गलत का फर्क करना हम भी भूल ही जाते थे। रागिनी के लिए मुझे हमेशा डर लगा रहता था। वह थी भी तो सीधी-सादी, पढ़ने में होशियार, जमीं से जुड़ी रहने वाली। सारे घर की जिम्मेदारी भी तो उसी पर थी। वो कमाती तुम उड़ाते। वह तनाव पालती, तुम्हारे पिंजरे में कैद और तुम मौज उड़ाते। उसके पंख तो तुमने क़तर ही डाले थे। क्या उल्लू बनाते थे तुम उसे भी हम सभी को भी। वो क्या फिलासॉफी थी तुम्हारी, "फिल द अदर बॉडी", वाह क्या बात है? उसे महिला मित्रों संग संलग्न होने के लिए बाध्य करते और खुद पुरुष मित्रों नहीं खुद भी दूसरी महिला मित्रों को ही चुनते। यह अच्छी मोनोपॉली थी तुम्हारी। खुद नाले में रहकर भी उसे गंगा की तरह पाक रखना चाहते थे, स्वार्थी कहीं के। हमें किन-किन महापुरुषों का उदाहरण दिया करते थे, मैं तो नाम भी नहीं ले सकती क्योंकि मैं आज भी अहिंसा की पुजारी हूँ। तुमने सारे ज़माने की किताबें पढ़ रखी थीं, सारा ज्ञान अर्जित कर रखा था और हम तो अज्ञानी तुम्हारी कक्षा में बैठ कर ही फ़ैल हो जाया करते।
दो साल में तुमने रागिनी को बदल डाला। उस नयी रागिनी को जिसे हम पिछले पंद्रह सालों से जानते थे, पहचान ही नहीं पाते थे। हाँ, कभी-कभी जब तुम नहीं होते थे तो तुम्हारी अनुपस्थिति में वह आत्मग्लानी से भी भर उठती थी। खीजती भी थी तुम्हारी इन हरकतों पर। परंतु तुम्हारे प्यार का जादू, जवानी का जोश, माता-पिता से बगावत का हीरोइक कारनामा सभी को तो तुम्हारी मर्दानगी के आगे नपुंसक बना देता था और सब झुक जाते थे। तुम्हारी पेंटिंग्स, तुम्हारी फोटोग्राफी, तुम्हारी लेखनी, तुम्हारा फ़ैशन ज्ञान और और हाट से जाकर सस्ती ताज़ी सब्जियाँ लानेवाला उत्तेजित अंदाज़, खाना पकाने की कला उस पर सोने पर सुहागा तुम तो भविष्यवाणियाँ करने में हाथ देखने में माहिर थे। हम सभी अभी-अभी जवान हुए थे, किसी की शादी होनी थी किसी की हो चुकी थी पर मनपसंद दूल्हा-दुल्हन नहीं मिले थे तुम्हारी तरह जादूगर। एक-दो के बच्चे भी हो गए थे जो बेचारे अभी बहुत छोटे थे और हमें अपने भविष्य का भी पूरी तरह से पता नहीं था, उनके भविष्य के बारे में सुनकर तो और भी काँप जाते थे। वहीं बस वहीं अँधेरे में तीर तुम निशाने पर लगा लेते थे। एक और कला में माहिर थे तुम, यह सारा काम तुम हमारे पतियों या बॉय फ्रेंड्स जो अब तक हमने घरवालों से छिपा-छिपा कर रखे थे, बड़ी सफाई से उनकी गैरहाजिरी में करते थे। तुम यह सब रागिनी के सामने करते और हम तुम्हें शराफत का देवता मान लेते। सोचते थे हमारे राज़ तुम उम्रभर कब्र तक अपने सीने में छिपाकर रखोगे विश्वास भी तुम पर इतना अँधा की तुम्हें अपना, अपने जीवन साथी या होनेवाले जीवन साथी सभी को बेवकूफ कहने का पक्का लाइसेन्स दे दिया था। रागिनी कभी-कभी गुस्सा भी करती थी, तुम्हें रोकती भी थी की कहीं हमें बुरा ना लग जाये! वह कहती भी थी, "अरे, प्रशांत तो अच्छा है। कबीर इतना बुरा भी नहीं है।" पर याद है जब तुम सबकी खिल्ली उड़ाते थे, हम भी तुम्हारे साथ शामिल हो जाते थे, बिना सोचे-समझे निशाना तो तुम हमें ही बना रहे हो। क्यों करते थे तुम ऐसा? अपनी कमजोरियां छिपाने के लिए ही ना? तुम्हें पता है हम सभी ने तुम्हें इतनी ढील दे रखी थी, बेवजह का महत्त्व दे दिया था। तुम हमेशा इसी भ्रम में रह गए कि तुम हमेशा सही हो। इसी भ्रम के चलते जब-जब रागिनी ने तुम्हारी बात मानने से इनकार किया तुम्हारा गुस्सा बढ़ता ही गया।
रागिनी के कौन मित्र होंगे कौन नहीं? किससे उसका रिश्ता कैसा और कितना होगा, सब कुछ तुम निर्धारित कर अपना अंतिम निर्णय सुना दिया करते। वह अपने माँ-बाप से रिश्ता नहीं के बराबर रखेगी, बड़ी बहन होकर भी बड़ी बहन के सारे फर्ज अदा नहीं करेगी, क्योंकि तुम ऐसा चाहते थे। पर छुट्टियों में तुम अपने माता-पिता की सेवा के लिए उसे जरूर रायपुर भेज दिया करते थे। तर्क भी तुम्हारा ही सही था सास-ससुर, दादी के साथ इसे फिर कब वक्त मिलेगा, रिश्ता निभाने का और रिश्ता बढ़ाने का। पीछे तुम कौन-से रिश्ते बनाकर निभाया करते थे? कहाँ से तुम्हें ऐसी महिलाएँ भी मिल जाया करती थीं। रागिनी की तो चमड़ी भी मोटी हो गयी थी। उसे तो तुम्हारी हदों की चरम को महसूस करना था, परन्तु तुम्हारी हदें भी कहाँ तक थी। कोई तो सीमा होती है? तुम्हारी उसी उन्मुक्तता का फायदा उठा कर तुम्हारे उस टुच्चे दोस्त ने किस तरह ललचायी नज़रों से रागिनी को घूरते हुए बॉर में अपनी गोद में बैठने को कहा था? तुन्हें कोई विस्मय नहीं हुआ था, तुम मुस्करा रहे थे और ठगी-सी रागिनी ने हिम्मत कर राकेश को मना कर दिया था। तुमने तमतमाते हुए सबके सामने जलील करते हुए रागिनी को राकेश से माफ़ी माँगने को कहा था। तुम्हें शायद तुम्हारी जादुई चकाचौंध में उसके आँसू और घुटन नहीं दिखे थे। वह काम करे, तुम्हें बच्चे भी चाहिए थे और जिस्म का एक खिलौना भी। उसका तो तुमने एक अबॉर्शन भी करवा दिया था यह दलील देकर कि दुनिया में बहुत अनाथ बच्चे हैं, गोद ले लेंगे और धरती का भला करेंगे! शायद रागिनी के भीतर की माँ ने उस दिन उसे बहुत धिक्कारा था इसीलिए बाहर आकर वह अपनी ममता लुटाने के लिए आतुर थी पर अकेले जिम्मेदारी का बोझ उठाने के लिए तैयार नहीं थी। वह भी तुम्हारे निर्णय से सहमत हो गयी। उसे उम्मीद थी एक दिन तुम कुछ बनकर अपने सपने को भी पूरा करोगे, कमाओगे भी। तुम्हारे दृढ़ निश्चय और वादे कितने झूठे थे इसका अंदाज तुम्हें स्वयं भी नहीं था।
वर्ष-दो वर्ष सब कुछ ठीक चला। फिर जब तुम मुम्बई गए अपने सपने पूरे करने और जिस लड़की के साथ तुम रूम शेयर करने लगे, उसी रिश्ते में तुमने रागिनी को भी धकेल दिया। बाद में रागिनी ने मुझे सिर्फ मुझे बताया कि उसे घिन आ रही थी और वह संगम के समय आधे में ही तुम दोनों को छोड़ रूम से बाहर निकल गयी थी। छी:, पहली बार मुझे लगा असहाय रागिनी बड़ी ही हिम्मतवाली है। जो बातें किस्से, कहानियों में अब तब पढ़ी थीं, वह वही जिंदगी जी रही थी! अंकल की अनुभवी आँखें शायद तुम्हें ताड़ गयी थीं, उनसे तुम्हारा रिश्ता कुछ खास न बना सका और जिंदगी ने उन्हें अधिक वक्त भी नहीं दिया। अपनी सबसे प्रिय पुत्री की मदद से पहले ही चले गए। यहाँ से अब तक सोई रागिनी थोड़ा-थोड़ा नींद से जागने लगी थी। शायद माँ का दर्द, अकेलापन, सूना माथा, हलके पड़े कपड़ों का रंग और छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी ने उसे झंझोड़ा था। वह वक्त बिताने के लिए माँ के पास जाने लगी, उसका नज़रिया, उसकी प्राथमिकताएँ अब बदलने लगी थीं। तुम्हें भी लगा मुम्बई वाली लड़की तुम्हें लेकर गंभीर है। छोटी उम्र की है,  जवाँ है, जोशीली है, तुम्हारी उमंगों को नया अनुभव करने के लिए नए पँख मिल जायेंगे। तुम्हारी और रागिनी की जिंदगी से बोरियत मिटेगी और पहले से अधिक रंगीन हो जाएगी और तुम्हारी जो थोड़ी बहुत पहचान बनी है उससे कावेरी (यही नाम था उसका शायद?) को भी कुछ फायदा मिल जायेगा?
मुझे याद है कावेरी जब तुम्हारे साथ कानपुर आयी थी, मोटरसायकल पर तुम तीनों मेरे घर आये थे! लम्बा छरहरा शरीर, हवा में लहराते स्टेप कट बाल, तीखे नयन, बेफिक्री खिलखिलाती हँसी, जैकेट, स्पोट्र्स शूज, ताजे खिले खुशबूदार गुलाब की तरह खूबसूरत और आत्मविश्वासी। बिंदास वह तुम्हारे और रागिनी के बीच में बैठकर सवार होकर आयी थी। तब मुझे कोई अनुमान नहीं था। हाँ, इतना जरूर लगा था हम बहुत पीछे हैं और तुम वक्त से आगे। तुमने कान में बाली डाल रखी थी। हम तुम पर हँस थे और कावेरी ने तुम्हारे गाल पर हौले से धोल जमाया था, "आजकल तो यही फैशन है।" बड़ा हक़ जता रही थी। रागिनी इसकी आदी थी और मेरे लिए भी कोई नया अनुभव नहीं था जब परायी लड़कियाँ तुम पर अपना हक़ जतायें।  तुम तो खुद ही उन्हें तुम पर थोड़ा हक़ जताने के लिए उकसाते थे ताकि तुम्हें भी उन पर थोड़ा हक़ मिल जाये। कावेरी ने जब उम्र में ही नहीं, पहचान और पैसों में भी तुमसे कोई बड़ा ढूँढ तुम्हें छोड़ दिया था तब तुम्हारे अंह को गहरी चोट लगी थी।
दूसरों को हमेशा खिलौना बनाकर खेलनेवाला खुद खिलौना बन किसी के हाथों टूटा था। तुम मुम्बई छोड़ फिर घर आ बैठे थे, दर्द की मलहम रागिनी के पास ढूढने। तुम्हारा गुस्सा अब काबू से बाहर होने लगा था। टूटकर एक दिन रागिनी ने मुझे फोन किया था, वो घर से चल पड़ी थी। मैंने किसी तरह समझा बुझाकर उसे शांत किया था और हिम्मत देने की कोशिश कर घर वापस भेजने में सफल रही, क्योंकि मेरेलिए शायद रिश्तों की अहमियत थी जो रिश्ता तोड़ने से किसी को भी रोकती जो तुम्हारे लिए कभी नहीं थी। मेरा मन ही जानता है मैं अंदर से उस दिन कितना डर गयी थी। पता नहीं घर वापस आयी रागिनी के साथ तुम क्या करोगे? सारा दिन मैं गायत्री मंत्र का जाप कर प्रार्थना करती रही। कुछ दिन तुम ठीक रहे। मन की शांति के लिए बद्रीनाथ और ऋषिकेश की यात्रा पर चले गए। वहाँ से भी फ़ोन पर यात्रा के अनुभव सुनाते थे, तुम्हें कुछ साधुओं का साथ मिला। तुमने उनके साथ गाँजा के चुसके लिए, भाँग डकारी। जीवन में तुम्हारा यह अनुभव भी बहुत रोमांचकारी था, जिस रोमांच की तुम्हें हमेशा तलब रहती है। तुम खुश, रागिनी खुश, हम भी अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त। वापस आकर तुम्हें काम भी मिल गया, कैसे कर लेते थे सबकुछ इतनी आसानी से? गवाँकर भी पहले से अधिक मिल जाता था तुम्हें, कुछ तो बात थी तुममें और तुम्हारी किस्मत में भी।
तुम्हारा ऑफिस, ऑफिस के किस्से, ऑफिस के लोगों पर चढ़ता तुम्हारा जादू। तुम्हारा आत्मविश्वास तो पहले से दुगना हो गया था। कमाई भी रागिनी से थोड़ी ज्यादा। तुम्हारा बच्चे गोद लेने का भूत फिर जाग गया था। तुम रागिनी के जॉब के पीछे पड़ गए थे। बच्चा-बच्चा मुझे इस साल के आखिर तक बच्चा चाहिए बस। साल ख़त्म होने में सिर्फ छः महीने ही बाकी थे। इतने समय में तो खुद प्रकृति भी एक जीता-जागता स्वस्थ बच्चा पैदा नहीं कर सकती? लड़की हो, साँवला रंग हो, बाल कटे हुए हों तुमने सब तय कर रखा था। तब रागिनी ने मुझसे कहा था तुम्हारी कमाई पर भरोसा कर वह एक और जिम्मेदारी के लिए तैयार नहीं है।
इधर हमारा वीसा आ चुका था। हमने जाने की तैयारी शुरू कर दी थी। रिग्वेद की कंपनी की तरफ से ऑनलाइन ट्रैनिंग शुरू हो चुकी थी और मेरी शॉपिंग। मेरे जाने से मैं खुश थी। नयी जगह, नये लोग, विदेश यात्रा पर रागिनी थोड़ा बैचैन थी। जैसे-जैसे हमारे जाने का समय करीब आ रहा था, रागिनी का घर पर आना-जाना बढ़ रहा था। पिछले कुछ महीनों में मैं और रागिनी भी काफी नज़दीक आ चुके थे। शायद वो अपने जीवन की कमियों को, तकलीफों को बाँटने और सहानुभूति की चाहना में मेरी तरफ झुक रही थी। मेरे लिए रागिनी मेरी सबसे प्यारी सहेली थी इसमें मुझे कोई संदेह नहीं था परंतु अब मैं भी उसके लिए विशेष बनती जा रही थी यह मेरे लिए बड़े सुकून की बात थी।
एक दिन तपती दोपहर में रागिनी और तुम दोनों मेरे पास घर आये। चिलचिलाती गर्मी, कड़ी धूप - सभी के खिड़की-दरवाजे बन्द पड़े थे। तपती गर्मी में सिर्फ पंखों और कूलरों की गड़गड़ाहट ही सुनाई देती थी। पक्षी, गाय, कुत्ते सब के सब कहीं दुबक गए थे। आज रागिनी और तुम्हारा अंदाज़ बहुत ही भावुक और आत्मिक था। मुझे लगा शायद मैं रागिनी के लिए और तुम्हारे लिए भी कुछ-कुछ महत्त्व रखने लगी हूँ। तुम्हारे कई राज जो मेरे हृदय में ही राज़ बने हुए थे रिग्वेद को भी पता नहीं थे। तुम अपने आगे मुझे भी किसी लायक विश्वास लायक ही सही कुछ समझते हो। मैंने सोचा किचन में जाकर मिल्कशेक बनाती हूँ। रागिनी भी मेरे पीछे तुम्हारे कहने पर रसोई घर में आ गयी। मुझे लगा आत्मीयता का यह उभार मेरे चले जाने से आने वाले खालीपन के डर से आया है। रागिनी को तुमने कुछ कहने का इशारा किया। वह मुस्करायी, मैं भी दोनों को देखकर स्वतः ही मुस्करा दी। संकोची मुस्कराहट के साथ सकुचाती रागिनी ने मेरे कुछ और नदजीक आकर नजरें झुकाकर हिचकिचाते धीमे स्वर में मुझसे बोली, "सुनो, नमित कह रहा है तुम मुझमें इंटरेस्टेड हो!" "क्या इंटरेस्टेड हो? क्या मतलब इंटरेस्टेड हो?" मैंने आश्चर्य से पूछा, मैं अब भी मुस्करा रही थी, आने वाले तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी से बेखबर। हड़बड़ी में रागिनी बोलती गयी, "नमित कह रहा है तुम मुझमें आई मीन, हममें इंटरेस्टेड हो? मुझे भी लगता है। नए-नए अनुभव तो लाइफ में होने ही चाहिये? तुम जब अमेरिका जाओगी तो विदेशी सभ्यता में तो यह बहुत आम बात है। हमने तो यहाँ रहकर ही इतना कुछ अनुभव लिया है और शेयर किया है। हम सब एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते हैं तो कोई कंफ्यूज़न ही नहीं? कावेरी को तो भला जानते भी नहीं थे। क्या बोलती हो?" मैं ठन्न की ठन्न! क्या हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ? मैं सन्न थी, तभी रागिनी इतना बोल गयी।
"हे भगवान्! किसी के साथ हमदर्दी का क्या मतलब होता है? तुमने ऐसे कैसे सोच लिया, मैं भी ऐसी निकलूंगी। रागिनी और तुम, तुम्हें क्या हो गया है, अब भी तुम सब यही चाहती हो?" तुम्हें बताऊँ उस वक्त मेरी क्या हालत हो रही थी? तुम भेड़िये और रागिनी महामूर्ख जो अच्छे-बुरे में भेद करना भूल गयी थी। तुम्हारे साथ रहकर। इतना सबकुछ होने के बाद भी एक बार फिर तुम पर भरोसा कर रही है? मैंने उस दिन खींचकर तुम्हें थप्पड़ मारने थे! डायन भी एक घर छोड़ देती है, कलमंुहे, कम से कम रागिनी के जीवन में एक दोस्त तो रहने देता। रागिनी भी तुरंत बोल पड़ी, "हमारे दोस्त बनते हैं फिर छूट जाते हैं। तुम ही ऐसी हो जो अब तक दोस्ती बनाये हुए हो, मुझे लगा तुम भी इंटरेस्टेड हो? नमित ने तो ऐसा ही कहा, मुझे भी लगा।"
घबराहट के मारे मेरी धड़कनों की गति असामान्य हो गयी। रक्त रगों में तेजी से दौड़ने लगा था, साँस अंदर ही छूट गयी, हाथ-पैर फूलने लगे। सारा हार्मोनल बैलेंस ही गड़बड़ा गया। किसी तरह इतने शब्द कहने को मुँह खुला, "मेरा ख्याल है तुम दोनों यहाँ से चले जाओ। रिग्वेद को कुछ भी पता नहीं है, बताना भी मत। तुम्हारी नहीं मेरी इज्जत की खातिर। यदि मिलने भी आओ तो प्लीज़ मुझसे बात मत करना। आना नहीं, आना भी तो जल्दी वापस चले जाना, प्लीज फिर कभी मत आना मेरे पास। प्लीज जाओ, जाओ!" तुम और रागिनी मनुहार करने लगे। मैंने दोनों को लगभग धकेलते हुए दरवाजा बंद कर दिया। खूब-खूब रोई मैं उस दिन। आँसुओं के साथ सारा मैल धोने की कोशिश करती रही। अगले कई दिनों तक मैं बहुत चुप और उदास थी। रिग्वेद और घरवालों को लगा शायद अपना घर, अपना शहर छूटने के अहसास से मैं दुःखी हूँ।
वक्त गुजरा, नया शहर, नये लोग, नयी चुनौतियाँ, नयी समस्याएँ, नये रिश्ते, नये दोस्त और हमारी जिंदगी में नए मेहमान का आगमन। सब कुछ नया-नया। पुरानी यादें कुछ धुंधली पड़ गयी थीं। पर क्या इन्टरनेट का जमाना आ गया है इतने सालों के बाद भी तुम कंप्यूटर की स्क्रीन पर सामने आकर खड़े हो। आँखों में नशा कुछ गहरा उतर आया है, तस्वीर में दिख रहा है। और यह तुम कर क्या रहे हो? मैंने तुम्हारे नाम का सर्च इंजन दबाया, "हे भगवान् तुम और सेवा साहित्य जगत की, फिल्म जगत की? अब भी पहचान ऊँची और गहरी बनाने का जुगाड़ कर रहे हो। प्रतिष्ठित व्यक्तियों के नाम बेचकर वही अपना पुराना जादू चला! झूठा नाम, झूठी शान बटोर रहे हो। बातचीत का वही सूफियाना अंदाज़, कुछ खोजती आँखें, बनावटी रंगत के पीछे श्वेत-श्याम केश,आँखें पहले से ज्यादा बाहर उतर आयी हैं, जैसे नशा कर बैठी हों। कोई एक-दो टेटू बनवा लिए होगें वो तो दिखाई नहीं दे रहे हैं। डील-डौल भी बढ़ गया है। उम्र तो दिखने लगी है पर बातों का अंदाज़ वही है, छूटा नहीं है।
थोड़ा और सर्च करती हूँ। अच्छा! तो रागिनी भी तुम्हारे साथ है। उसकी आँखों में अब भी वही तुम्हारे जादू का सम्मोहन दिखाई देता है। हाँ, आँखों के आसपास कई झुर्रियां दिखाई दे रही हैं। क्यों अब वो पहले से ज्यादा रोने लगी है क्या? कुछ बात है तुममें, तुम अब भी वैसे हो या पहले से भी अधिक पक्के खिलाड़ी बन गए हो?
कैसी लगी कहानी? उम्मीद करती हूँ तुम यह कहानी भी जरूर इन्टरनेट पर डालोगे और हाँ नाम, पैसे कमाने की तो गारंटी है। अरे नहीं कहाँ! कहानी तो तुम्हारी बनती है। हम जैसों की कहानी कहाँ? हमारा तो बस साधारण-सा जीवन ही होता है, अनुभव लेता है, बड़ा होता है, बूढ़ा होता है फिर चल बसता है। और तुम्हारी कहानी तो चलती ही रहती है ख़त्म होने के बाद भी याद रखने के लिए।

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