ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
जीवन की जरूरत : आध्यात्मिक पर्यटन
01-Oct-2017 01:24 PM 3074     

भारत ने सदा ही "अतिथि देवो भव" के संस्कारों का परिपोषण किया है। आध्यात्मिक पर्यटन स्थल से तात्पर्य किसी धर्म या धार्मिक व्यक्ति से संबंधित स्थल नहीं होता अपितु ऐसा स्थल, जहाँ व्यक्ति अपनी आंतरिक चेतना के विकास की प्राप्ति करता है। आध्यात्मिकता-प्राकृतिक और सार्वभौतिक तत्व है और इसका अनुसरण करने वालों का किसी खास धर्म से संबंधित होना जरूरी नहीं। इस दृष्टि से भारत भूमि पर अनेक ऐसे पर्यटन स्थल हैं जहाँ कुछ समय गुजारने पर व्यक्ति की चेतना का परिष्कार होने लगता है, उसमें लोक-कल्याण के भाव तरंगित होने लगते हैं। ऐसी भाव-तरंगों का मानस-पटल में प्रविष्ट होने का रहस्य यह है कि उस क्षेत्र विशेष में, वर्तमान अथवा पहले कभी सिद्ध व्यक्तियों, फकीरों, ऋषियों अथवा मुनियों की लोकमंगल हेतु छोड़ी गई भाव-तरंगें घनीभूत रही होंगी। इस विषय का सबसे बड़ा पर्यटन स्थल हिमालय क्षेत्र माना जा सकता है जहाँ बैठकर अनेक ऋषियों ने सैकड़ों वर्ष तक साधना की थी। उन्होंने स्वयं के दुर्गुणों को हटा कर अपनी चेतना को गंगा जल जैसा निर्मल बना दिया था।
पौराणिक कथाएँ उपनिषद बताते हैं कि शेर, भालू, गाय और बकरी भी उनकी बराबरी में आकर बैठ जाते थे, जो यात्री श्रद्धापूर्वक कैलास मानसरोवर, सिंधु, गंगा, जमुना, मंदाकिनी, अलकनंदा आदि पवित्र नदियों के किनारों पर बने तीर्थ स्थलों के सान्निध्य में रहते हुए वहाँ के सात्विक भोजन को प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं, उनके हृदय एवं स्वभाव में हुए परिवर्तन को स्वयं परखा जा सकता है।
कश्मीर, अमरनाथ, शंकराचार्य मठ जहाँ आदि शंकराचार्य ने बैठकर लोककल्याण हितार्थ साधनाएँ कीं और उत्तराखंड में चारधाम, उत्तरकाशी आदि क्षेत्र भी आध्यात्मिक पर्यटन के अनेक स्थान हैं। हरिद्वार सप्तर्षि क्षेत्र में बने शांतिकुंज आश्रम में रहकर अपने स्वभाव को परिष्कृत कर रही प्रक्रिया का प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं, इसी स्थान पर ऋषि विश्वामित्र और बाद में आचार्य श्रीराम शर्मा ने गायत्री मंत्र की साधना करके क्षेत्र को लोक मंगल की भावनाओं से घनीभूत कर दिया। इन्हीं भावनाओं का साकार रूप नैसर्गिक वातावरण में सृजित, विश्व को मानवीय मूल्यों व आदर्शों का संदेश देने वाला महान् शिक्षण केन्द्र "देव संस्कृति विश्वविद्यालय" के रूप में स्थापित किया गया है। जहाँ पर विदेशों से आए हजारों शोधार्थी भारतीय संस्कृति को समझने और सीखने हेतु प्रयत्नशील रहते हैं।
अजमेर में रहने वाले चिश्ती सम्प्रदाय के संस्थापक लोक उकारी ख्वाजा मुइनुद्दीन भी हिन्दू मुसलमान दोनों में समान रूप से लोकप्रिय थे। उनके सरल उपदेश दरियादिली याने उदारवादी, दानशील जो सूर्य जैसी हो दया और जमीन जैसी खातिरदारी सबकी करो। सच बोलो। हमें जीवन केवल सेवा के लिए मिला है। उन्होंने अपने सभी शिष्यों में इसी ज्ञान को बाँटा, तभी तो वह आफताब-ए-हिंद कहलाए। आज भी जो व्यक्ति उस दरगाह पर माथा टेकने जाते हैं वह तनाव मुक्त हो जाते हैं। ऐसा स्थल पानीपत के श्रद्धेय पीर कलन्दर की दरगाह भी है। इसी प्रकार पांडिचेरी का अरविन्द आश्रम, रामकृष्ण का साधना केन्द्र "वैलूर मठ"। तिरुपति बालाजी देवस्थानम् तथा शिर्डी में साईधाम आदि आध्यात्मिक पर्यटन केन्द्र हैं, जहाँ जाने पर व्यक्ति में लोकमंगल की भावनाएँ स्वमेव प्रस्फुटित होने लगती हैं। भारतीय संस्कृति इसे ही श्रेष्ठ पर्यटन मानती रही है।
अरस्तू, ऐनी बेसैन्ट और मेक्स्मूलर दार्शनिक आध्यात्मिक पर्यटन में भी विज्ञान का समन्वय देखते थे। उन्होंने इसमें विविध प्रकार का वैशिष्ट्य देखा। उत्तर भारत में पहाड़ों का सौंदर्य, तो दक्षिण में कन्याकुमारी में अरब सागर व हिंद महासागर की लहरें मनमोहक लगती हैं। मध्य की नदियाँ व्यास, जेहलम, कृष्णा, कावेरी, वेत्रवति और नर्मदा बरबस आकर्षित करती हैं। पूर्व दिशा से पश्चिम को बहने वाली नर्मदा मातृशक्ति से कम नहीं। अमरकंटक बड़ा पावन तीर्थ है जहाँ से नर्मदा का उद्गम हुआ है। नर्मदा मैया मंडला की लाल चट्टानों पर अपना स्नेह लुटाते हुए, जबलपुर के भेड़ाघाट व धुआँधार पहुँचती है तब इसका सौंदर्य और कई गुना बढ़ जाता है।
नर्मदा की 1740 मील परिक्रमा का महत्व असाधारण है। श्रद्धालु भक्तजन नदी के तटों पर बने नैसर्गिक आश्रमों की पैदल यात्रा भी करते हैं। इस आर्यावृत में पर्यटक यात्री अलग-अलग दृष्टि से यात्राएँ एवं पदयात्रा करते हैं। कोई भौगोलिक अवलोकन तो कोई ऐतिहासिक, किन्हीं का ध्येय विभिन्न प्रदेशों के खान-पान, रीति-रिवाज, पहनावे का वैज्ञानिक विश्लेषण, कोई औषधयुक्त जड़ी-बूटी, वनस्पति ढूँढ़ने तो कोई सागरों के किनारों पर रत्न मूंगा व मोतियों की खोज करते हैं। कुछ पर्यटक अलग-अलग स्थानों के लोक संगीत व लोक-नृत्य कलाओं में वैज्ञानिक महत्व खोज लेते हैं। हर कोस के अंतर पर पानी मिट्टी के साथ लोगों के स्वभाव में भी अंतर दिखाई पड़ता है। कोई अन्यान्न क्षेत्रों में व्यापार की शैली का अध्ययन करने में रुचि लेता है। अनेक यात्री भ्रमण करते-करते यात्राओं में मिले अनुभवों को आत्मसात कर लेते हैं। कुछ पर्यटनकारी आध्यात्मिक वातावरण से परिष्कृत हो बुराइयों से भी मुक्त हो चुके होते हैं।
द्वादश ज्योतिर्लिंग में महाकालेश्वर याने, न्यायकारी राजा विक्रमादित्य की अवंतिका का विशेष महत्व है। यह स्थल भूमध्य रेखा में नाभि केन्द्र पर स्थित है। इसके मंगलनाथ मंदिर पर मंगल गृह की रश्मियाँ सीधी स्पर्श करती हैं। यह वह स्थान है जहाँ भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप बनाकर अमृत कुंभ असुरों से लेकर, देवताओं को पिलाया था। द्वापर युग में श्रीकृष्ण व सुदामा की शिक्षा एवं दीक्षा भी यहीं ऋषि संदीपन के गुरुकुल में हुई थी। यहीं के राजा भतृहरि ने श्रृंगार रस पर काव्य लिखे किंतु मायावी संसार का बोध होने पर उसने सिंहासन त्याग दिया और पूर्ण अध्यात्मिक हो गए थे। ऐसे प्रसंगों से जुड़ी कहानियों से भारतीय दर्शन को जानने का सुयोग भी प्राप्त होता है।
बिहार प्रांत के गया जी में प्राचीन बोधिवृक्ष है, जहाँ राजकुमार सिद्धार्थ ने आत्म साक्षात्कार पाया था। जहाँ कुछ क्षण बैठने पर चेतना की सूक्ष्म परतें खुलती हैं उनके शील विचार व सिद्धांतों को समाज ने नैतिक कत्र्तव्यों का उत्पादक माना है। उनकी शिक्षाओं के निरंतर अध्ययन के लिए विश्व की कई सरकारों ने अपने देशों में विश्वविद्यालय स्थापित किए। खालसा पंथ का मुख्य गुरुद्वारा गोल्डन टेम्पल अमृतसर में भी, भावातीत क्षेत्र में सकारात्मक तरगें हिलोरें लेने लगती हैं। गोहाटी में कामाक्ष्या तीर्थ है। उड़ीसा का जगन्नाथपुरी धाम। प्रयाग, नासिक व हरिद्वार के कुंभ मेले। संत निरंकारी मिशन का वार्षिक समागम, पूना में तेजज्ञान संस्था का मनन आश्रम एक जाग्रत तीर्थ है। लेह-लद्दाख का हिमजी गोम्मा दलाईलामा आश्रम तथा चैन्नई में "अडियार आश्रम" जो थियॉसाफिकल सोसाइटी का अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय है। असीम शांति की वैज्ञानिक शोधशालाएँ है। ऐसे क्षेत्रों में शांति पाने के साथ-साथ जीवन के होने के अर्थ को भी समझा जा सकता है।
प्रसन्नता है कि अमेरिका एवं योरुप के विद्वानों ने अब क्रांकीट-सीमेंट से बने जंगलों व पांच सितारा पर्यटन को अनुचित-अनुपयोगी मानते हुए प्रकृति से बिना छेड़-छाड़ किए पर्यावरण मित्र होते हुए हरित पर्यटन की वकालत की है। उल्लेखनीय है कि हमारे ऋषि हजारों वर्ष पहले भी नदी-तट पर अमराई-आंवला,  वट व पीपल के मध्य आश्रम बनाकर बड़े आनंद से लोक शिक्षण करते हुए सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करते थे। चाणक्य और गांधी ने भी यही किया था। वृक्षों का आदर गृह आँगन में तुलसी रोप कर उनके सान्निध्य में संध्या वंदन करना और परमपिता से सबके लिए सद्बुद्धि एवं सुख शांति के वातायन की कामना हमारी मूल संस्कृति है। पूरे भारत को प्रेम सूत्र में बाँधे रखने के लिए चार धाम बनाए ताकि लोग गंगोत्री से जल लेकर जो व्यक्ति रामेश्वरम् में चढ़ाने जाएँगे। वे सारे भारतीय संस्कृति को भी देखते हुए जाएँगे। यही है हमारा, प्रेम और श्रद्धासिक्त अध्यात्मिक पर्यटन।

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