ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
पत्रकारिता : स्वतंत्र या स्वच्छंद
CATEGORY : सम्पादकीय 01-Apr-2017 11:42 PM 70
पत्रकारिता : स्वतंत्र या स्वच्छंद

समाचार-पत्र आधुनिक मनुष्य के ऊपर एक बहुत बड़ा अत्याचार है। साथ ही, वह हमारी संवैधानिक आज़ादी का माध्यम भी है। ...मनुष्य की आजादी एक टेढ़ी खीर है। किसी भी व्यवस्थित समाज में अभिव्यक्ति की पगडंडियां बनती जाती हैं। आज़ादी के औजार बने-बनाये रहते हैं। औसत मनुष्य उन औजारों के सहारे अपनी स्वतंत्रता का बोध कर लेता है। अभिव्यक्ति की जो पगडंडियां बनी हुई हैं, उनमें से समाचार-पत्र भी एक पगडंडी है। रोज सबेरे एक समाचार-पत्र खरीदकर आप इस पगडंडी पर चल सकते हैं...
- किसन पटनायक, प्रखर समाजवादी चिंतक

यदि हम किसी खबर पर विचार करें तो खबर वही नहीं है जो लोगों को चौंकाती है, खबर वह भी है जो लोगों को भरोसा देती है, हिम्मत बँधाती है और समाज में अपनी शक्ल का प्रतिबिम्ब देखने को देती है। मगर खबर के पूरी तौर पर खबर बनने के लिये आवश्यक है कि वह उन तक भी पहुँचे जिन्होंने उसे पैदा किया है - सिर्फ उन्हीं तक न रह जाये, जिन्होंने सिर्फ उसे लिखा है - चाहे कितनी ही सुन्दर भाषा में क्यों न हो...
- रघुवीर सहाय, कवि-पत्रकार

बीसवीं सदी के पूर्वाद्र्ध में भारत ही नहीं दूर-दुनिया के देशों में भी पत्रकारिता और साहित्य में कोई ज्यादा दूरी नहीं थी। दोनों ही अपने आसपास के समाज और संसार की चिंता करते थे। पर अब ऐसा नहीं है। क्योंकि तकनीक बदल गई है। नयी तकनीक के कारण पत्रकारिता एक बड़ा उद्योग बन चुकी है और पत्रकार अब एक स्वतंत्र चेता खबरिया नहीं रह गया है - वह इस उद्योग का एक सेवक भर है। अब तो यह भी देखने में आता है कि अखबार के मालिक अपने धंधों की रक्षा के लिये अखबार को स्थापित तो कर ही लेते हैं, जिससे कि उन्हें तत्कालीन सत्ता को अपने पक्ष में झुकाये रखने में मदद मिल सके, आश्चर्य यह है कि वे स्वयं पत्रकार न होते हुए भी पत्रकार कहलाने लगते हैं।
इक्कीसवीं सदी आते-आते तो अब यह लगने लगा है कि नये पत्रकारों के सामने तो लेखक या साहित्यिक होने का कोई जोखिम ही नहीं रह गया है। वे लेखक और विचारवान व्यक्ति के रूप में अब नहीं जाने जाते। वे सिर्फ पत्रकार के रूप में ही प्रशिक्षित किये जाते हैं। जैसे कि उन्हें सिर्फ खबर का ही उत्पादन करना हो और वह उत्पादन करने के बाद वे अपनी मजदूरी लेकर घर चले जायेंगे। हम चाहें तो इन्हें मीडिया मजदूर भी कह सकते हैं। उन्हें खबर को आकर्षक बनाना है, भले ही व्यापक जीवन के प्रति लोगों का आकर्षण कम होता चला जाये। समाचार-पत्रों के उद्योग बन जाने से उसकी सांठ-गांठ एक विश्वव्यापी बाज़ार से हो गई है, क्योंकि बाज़ार में अनेक तरह के उद्योग हैं और उसे अपने उत्पादों की रंग-बिरंगी सूचना लोगों को तक पहुँचाने के लिये समाचार-पत्रों का रंगीन सहारा चाहिये। हमारे समय का राजकाज भी लोगों के जीवन में भले न दिखे अखबार के रंग-बिरंगे पन्नों पर दिखता ही रहता है। समाचार-पत्रों की ज़रूरत सिर्फ़ शासकों को ही नहीं नये बाज़ारू लेखकों, धर्म प्रचारकों, व्यापारी कलाकारों और खिलाड़ियों को भी रहती है। जो बाज़ार का हिस्सा है, अब वही समाचार का हिस्सा है और जो बाज़ार से दूर कहीं अभाव, असुरक्षा में जी रहा है वह ख़बर का हिस्सा अब नहीं बन सकता। अगर दयावश उसे जगह दे दी जाती है तो समाचार-पत्र के ऐसे किसी कोने में जहां किसी की नज़र ही न पड़े। आशय यह है कि जिस ख़बर में ग्लैमर नहीं वो पहले और आखि़री पेज पर कैसे हो सकती है। एक तरह से कह सकते हैं कि अब ख़बर उद्योग धर्म, बाजार और राजनीति से गठबंधन करके ही चलाया जा रहा है। अपने समाज से उसका रिश्ता टूट चुका है। समाज अब समाचार-पत्र का पाठक नहीं, ग्राहक है। अख़बार एक उत्पाद है जो कभी कभी इत्र छिड़ककर भी लोगों के घरों में सरकाया जाता है। इसे "वैलेंनटाइन डे" के दिन महसूस किया जा सकता है।
बाज़ारवाद के समय में यह एक नयी समस्या पत्रकारिता के क्षेत्र से पैदा हुई है कि वह दुनिया में बाज़ार की स्थापना के लिये एक सर्वेयर का काम भी करने लगी है। वो व्यापारियों को यह बताती है कि किस देश में कितने प्रतिशत आबादी को अगर एक उपभोक्ता के रूप में पहचान लिया जाये तो वहां किस चीज़ का कितना बाज़ार फैल सकता है। एशिया के अनेक देशों की पत्रकारिता इन दिनों इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है और उन देशों के शासकों को खुले इशारे कर रही है कि वे अपने देश की किन मूल्यवान सम्पत्तियों को विश्व बाज़ार में रहन और गिरवी रख दें। पत्रकारिता ही अब बाजार के पक्ष में लोभ के विस्तार का विज्ञापन भी कर रही है।
अखबारों में अब शब्द की जगह शरीर ने ले ली है। हम किसी भी विज्ञापन या भड़कीली खबर को देखें तो उसमें शरीर बड़ा होता है और शब्द अक्सर कम होते हैं। और शरीर भी औरत का हो, अद्र्ध-नग्न हो, कुछ अश्लील-सा भी दिखता हो तो अखबार के सौंदर्य में कहावत के अनुसार "चार चाँद" तो लग ही जाते हैं। यह काम स्थानीय बोलियों में प्रकाशित होने वाले छोटे समाचार-पत्र तो कर ही नहीं सकते, क्योंकि वे अब घरेलू उद्योगों की तरह अख़बार के बड़े उद्योग के सामने निरंतर मर रहे हैं। बड़ा अख़बार छोटे अख़बारों को मार रहा है।
हमने अपने शीर्षक में ही पत्रकारिता की स्वतंत्र और स्वच्छंदता की बात की है। तो इसे आसानी से समझा जा सकता है कि अभी तक हमने जो चर्चा की है वह पत्रकारिता की स्वतंत्रता नहीं उसकी स्वच्छंदता की है। स्वतंत्र पत्रकारिता तो वही कहलायेगी जो समाज को ख़बरदार बनाती हो और स्वच्छंद पत्रकारिता वही कहलायेगी जो समाज को बेख़बर बनाती हो। आज पत्रकारिता की दुनिया में एक तरह की बेख़बरी देखी जाती है। दरअसल उसके पास कोई ख़बर नहीं है। वह ख़बरों की एक उत्पाद के रूप में रचना करती है। वह बाज़ार की ख़बरें बनाकर समाज को बेचने में लग गई है। अब बहुत कम अख़बार ऐसे देखे जाते हैं जो व्यापक मानवीय जीवन की ख़बर लेते हैं और उस जीवन को हर तरह के अन्याय के प्रति ख़बरदार बनाते हैं और उसको अपने अधिकारों के प्रति सदा जागरूक बनाये रखते हैं।
आज पत्रकारिता पर बात करते हुए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को नहीं भुलाया जा सकता। वह पत्रकारिता के ही एक माध्यम के रूप में इतने शक्तिशाली ढंग से उभरा है कि वहां दृश्य ही सीधे लोगों की आँखों में ख़बर बनकर प्रवेश कर जाते हैं। वे सोचने का मौका तक नहीं देते। जो माध्यम सोचने का मौका दिये बिना लोगों से अपनी बात मनवाने पर आमादा हो उसे लोकहित का माध्यम कैसे कहा जा सकता है। वह माध्यम भी अब पूरी दुनिया में शक्तिशाली विदेशी पूंजी से संचालित है और पूंजी को ही बढ़ाने में लगा हुआ है। चाहे पृथ्वी पर जीवन की पूंजी भले ही नष्ट हो जाये। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अब किसी देश के नागरिकों को सम्बोधित नहीं है वह ग्राहकों को सम्बोधित है। उसके लिये मनुष्य अब सिर्फ बाज़ार में खरीददार की तरह खड़ा है।

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