ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
बर्लिन में भारतीय राजदूत श्री गुरजीत सिंह से शिक्षाविद् डॉ. राम प्रसाद भट्ट की बातचीत
CATEGORY : बातचीत 01-Mar-2017 09:03 PM 1018
बर्लिन में भारतीय राजदूत श्री गुरजीत सिंह से शिक्षाविद् डॉ. राम प्रसाद भट्ट की बातचीत

बर्लिन में भारत के राजदूत श्री गुरजीत सिंह 1980 से भारतीय विदेश विभाग में कार्यरत हैं। आपने मेयो कॉलेज अजमेर, ज़ेवियर कॉलेज, कोलकत्ता और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से शिक्षा प्राप्त की। जेएनयू से इंटरनेशनल स्टडीज़ में एम.ए. करने के साथ ही आप इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ फ़ॉरेन ट्रेड, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मास कम्युनिकेशन और इंडियन स्कूल ऑफ़ बिज़नेस की कक्षाओं में शामिल हुए हैं। श्री सिंह ने टोक्यो, कोलम्बो, नैरोबी, रोम में भारतीय मिशन्स में अपनी सेवाएँ दी हैं। भारतीय राजदूत के रूप में श्री सिंह इथोपिया, जिबोटी में भी रह चुके हैं और जनवरी 2016 से बर्लिन, जर्मनी में भारत के राजदूत हैं। आप न सिर्फ़ एक कुशल नौकरशाह हैं बल्कि एक अच्छे लेखक एवं स्कॉलर भी हैं। वे हिंदी, पंजाबी और अँग्रेज़ी के अलावा जापानी भाषा में भी प्रवीण हैं और अर्थशास्त्र, विकास और व्यापार पर भी समय-समय आलेख लिखते हैं। आपको बिमल सन्याल पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। गर्भनाल के लिये हुई उनसे विशेष बातचीत के सम्पादित अंश :

भारत सरकार द्वारा आयोजित होने वाले प्रवासी भारतीय दिवस के बारे में आपकी क्या राय है। जर्मनी में प्रवासी भारतीयों की उपस्थिति किन-किन क्षेत्रों में है?
प्रवासी भारतीय दिवस विदेशों में रह रहे प्रवासी भारतीयों के साथ संपर्क स्थापित करने और विभिन्न क्षेत्रों में उनके अनुभवों को साझा करने हेतु एक मंच प्रदान करता है। यह एक विशेष कार्यक्रम है, जिसमें प्रवासी भारतीयों और उनसे संबंधित विषयों पर चर्चा करने का मौक़ा प्राप्त होता है। प्रवासी भारतीय दिवस प्रवासी भारतीयों को विभिन्न क्षेत्रों में सरकार द्वारा उठाये गये क़दमों की जानकारी भी प्रदान करता है।
प्रवासी भारतीयों में भारत का आकर्षण किस रूप में पाते हैं। वे अतीतजीवी बने रहना चाहते हैं अथवा अपनी योग्यताओं और व्यापारिक समझ को भारत के साझा करने की इच्छा रखते हैं?
जर्मनी में प्रवासी भारतीयों ने अपनी उपस्थिति विभिन्न क्षेत्रों में दर्ज़ की है, जिनमें चिकित्सा, कला, व्यापार, तकनीकी क्षेत्र और शिक्षा प्रमुख हैं।
कई पीढ़ियों से विदेशों में रह रहे भारतीय मूल के नागरिक भारत से निरंतर सम्पर्क बनाए रखना चाहते हैं, तो इससे आशय लगाया जाये कि वे अगली पीढ़ी को भारतीय अस्मिता से परिचित करवाना चाहते हैं?
प्रवासी भारतीयों में भारत का आकर्षण भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को लेकर आज भी बना हुआ है और वे अपने आप को आज भी इससे जोड़े रखना चाहते हैं। मार्च 2016 में बर्लिन राजदूतावास में प्रवासी भारतीयों के साथ पहली बार मीटिंग आयोजित की गयी, जिसमें आमंत्रित लोगों ने बड़े ही उत्साह से भाग लिया। इसमें सभी सांस्कृतिक और सामाजिक संस्थाओं के प्रमुखों और विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत भारतीयों को आमंत्रित किया गया था। मीटिंग का मुख्य उद्देश्य प्रवासी भारतीयों में इस विश्वास को दृढ़ करना था कि भारत सरकार उनके हितों और कल्याण के लिए कार्यरत है। प्रवासी भारतीयों ने भी इस इच्छा को व्यक्त किया कि वे भी अपनी योग्यताओं और व्यापारिक समझ को किसी न किसी रूप में भारत के साथ साझा करने के इच्छुक हैं। ऐसा करके वे स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते हैं। हमारा राजदूतावास इसी कड़ी में समय-समय पर मीटिंग आयोजित करता है।
भारतीय मूल के लोगों या प्रवासी भारतीयों की सुदृढ़ स्थिति का लाभ उठाने के लिये क्या प्राथमिकताएँ होनी चाहिये?
निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि कई पीढ़ियों से विदेशों में रह रहे भारतीयों मूल के नागरिक आगे की पीढ़ी को भारत की अस्मिता से परिचित करवाना चाहते हैं। यही कारण है कि बर्लिन राजदूतावास में आयोजित सभी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति उत्साहपूर्ण रहती है। इसके मूल में यही भावना निहित है कि उनकी आगे की पीढ़ी अपने देश की संस्कृति और गौरवपूर्ण इतिहास से परिचित हो। इसके अतिरिक्त राजदूतावास द्वारा भारत-व्यापार-फ़ोरम और भारत प्रोफ़ेशनल-फ़ोरम को फिर से शुरू किया गया है। जर्मनी में भारतीयों छात्रों की संख्या में भी निरंतर वृद्धि हो रही है। यह संख्या 2015 में 12 हजार थी जो कि 2016 में 13 हजार 740 हो गयी है। लगभग बीस प्रतिशत छात्रों ने स्वयं की उपस्थिति को हमारी वेबसाइट पर दर्ज़ किया है ताकि वे निरंतर हमारे संपर्क में रह सकें।
अनेक देशों में प्रवासी भारतीय वहाँ की अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग बन चुके हैं। ऐसे में वे भारतीय अर्थव्यवस्था को किस तरह मददगार साबित हो सकते हैं?
विदेशों में लंबे समय से रहने के बाद भी प्रवासी भारतीय आज भी भारतीय संस्कृति को अपनी पहचान मानते हैं। वे इस बात को समझते हैं कि उनकी पहचान उनका भारतीय होना है भले ही वे विदेशों में बस गये हों।
प्रवासी भारतीयों और उनकी संतानों की नागरिकता को लेकर अक्सर ही दुविधा की स्थिति निर्मित होती रहती है। आप इसे कैसे देखते हैं?
प्रवासी भारतीय स्थानीय प्रणाली से अवगत कराने में मददगार साबित हो सकते हैं क्योंकि एक लंबे समय से विदेश में रहने के कारण वहाँ की स्थानीय प्रणाली से भली-भांति अवगत होते हैं। साथ ही उनकी व्यापारिक समझ का उपयोग व्यापार के नये क्षेत्रों को पता लगाने में किया जा सकता है। प्रवासी भारतीय भारत और जर्मनी के बीच न सिर्फ़ आर्थिक बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पुल का भी कार्य करते हैं।
प्रवासी भारतीयों के भारत में हितों को सामने लाने एवं उन्हें यहाँ निवेश करने के लिए लुभाने के लिए विभिन्न प्रदेश सरकारों द्वारा इन्वेस्टर्स समिट आयोजित किये जा रहे हैं। इनके बारे में आपकी क्या राय है?
प्रवासी भारतीयों को देश में निवेश करने के लिए लुभाने के लिए प्रदेश सरकारों द्वारा इन्वेस्टर्स समिट का आयोजन करना एक सराहनीय क़दम है। यह प्रवासी भारतीयों के साथ नेटवर्किंग स्थापित करने और अनेक क्षेत्रों में उनके अनुभवों से लाभान्वित होने के लिए भी बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
प्रवासी भारतीयों द्वारा अक्सर ही भारत की राजनीतिक व्यवस्था तथा नौकरशाही के घटिया स्तर और भ्रष्टाचार कभी न सुधरने वाले संदर्भ के तौर पर देखा है। क्या आपको लगता है कि इस स्थिति में बदलाव आयेगा?
इस स्थिति में बदलाव निश्चित रूप से आ रहा है। प्रवासी भारतीय समाज इस बात से परिचित है कि भारत आज प्रत्येक क्षेत्र में आशातीत उन्नति कर रहा है और इसका श्रेय भारतीय कुशल नेतृत्व और सक्रिय नौकरशाही को जाता है। सरकार भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए सतत प्रयत्नशील है।
प्रवासी भारतीयों को बच्चों की शिक्षा की आवश्यकताओं की पूर्ति, सुरक्षा, स्वास्थ्य आदि के मामले के साथ उन्हें दोहरी नागरिकता प्रदान करने के मुद्दे पर आप क्या सोचते हैं?
हमारी सरकार निरंतर प्रयास कर रही है। हमारी विदेश मंत्री के कुशल नेतृत्व में आज प्रत्येक भारतीय स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है। राजदूतावास के अधिकारी प्रवासी भारतीयों के हितों के प्रति सजग हैं, वे न केवल उनकी समस्याओं को सुनते हैं अपितु उनको सुलझाने का भरसक प्रयत्न भी करते हैं।

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