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जे. कृष्णमूर्ति की अन्तर्दृष्टि
01-Aug-2017 11:10 PM 4780     

सार्थक और विशिष्ट जीवन में दृष्टि सम्पन्न जीवन-    दर्शन की गुणवत्ता स्वतः समाहित हो जाती है। सत्य की सिद्धियाँ भी जीवन में साधना से ही हासिल होती है। विगत दिनों नीदरलैंड के महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध डच और जर्मन भाषी कवि हैरमन फनफीन से उनके आवास पर मुलाकात हुई। तीन घंटे तक की गहरी सघन बातचीत के दौरान वे अपने व्यक्तिगत और आत्मीय प्रसंगों की चर्चा में गहरे उतर गये और मुझसे कहने लगे कि चालीस की उम्र में मुझे विचारक, चिन्तक और दार्शनिक जे. कृष्णमूर्ति के व्याख्यानों की डच भाषा में किताब हाथ लग गयी थी, जिसने मेरा जीवन ही बदल दिया। मेरी सोच बदल दी। उसने मुझे फिर से रच दिया। मुझे सृजनात्मक बना दिया। मैं कवि, कलाकार, वादक, पेन्टर और संगीतकार सब एक साथ हो गया। वरना अपनी पत्नी से विलग होने और तलाक लेने के बाद भीतर से बहुत अकेला और असहाय हो चुका था।
मैं उनका कहना सुन रही थी। दार्शनिक जे. कृष्णमूर्ति के दर्शन की आभा उनके चेहरे पर थिरक रही थी। दर्शन के प्रकाश से उनका व्यक्तित्व दमक रहा था। मुझे लग रहा था जैसे बहत्तर वर्ष का कवि कलाकार मुझ भारतीय कवि स्त्री के समक्ष भारतीय दार्शनिक के प्रभाव की स्मृति को महसूस कर रहा है। उल्लेखनीय है कि हैरमन यूरोप के ऐसे प्रसिद्ध कवि हैं जिनके काव्य-पाठ के थियेटर के टिकट छह माह पूर्व ही बुक हो चुके होते हैं। पचास यूरो से कम का टिकट नहीं होता है। अखबारों में विज्ञापन (पूरा पृष्ठ) और शहरों में बस तथा रेलवे स्टेशनों तथा सिटी सेन्टर में पोस्टर लगते हैं। इस वय में भी वे दो घंटे तक लगातार संगीतमय अभिनयपूर्ण काव्यपाठ करते हैं। कवि-कौशल से उनकी पूरी देह आद्र्र हो उठती है। चेहरा पसीने से तरबतर हो जाता है पर प्रभावपूर्ण चमत्कारी प्रस्तुत की दमक और मुस्कराहट चेहरे पर खेलती है। वे अपनी आवाज़ से शब्दों को संगीत में और मुद्राओं से शब्दों को अभिनय में बदल देते हैं।
वे कृष्णमूर्ति संबंधों के आइने में स्वयं को साक्षात देखने की बात करते हैं। अपने परस्पर के संबंधों में हम स्वयं को जस का तस पा सकते हैं। हम वस्तुतः क्या हैं? यह पता चलता है संबंध रूपी दर्पण में। सार रूप में स्वयं को यथार्थ में जानना ही स्वयं के परिवर्तन की बुनियाद है। कृष्णमूर्ति आमूलचूल आंतरिक परिवर्तन की बात करते हैं। उनका कहना है कि आप धीरे-धीरे नहीं बदलते हैं, क्योंकि परिवर्तन या तो अभी होता है या कभी नहीं। कालक्रम में मनोवैज्ञानिक विकास को वे नकारते हैं। वे कहते हैं कि हमारे मन-मस्तिष्क में हजारों सालों के संस्कार प्रतिबंधनों से जकड़े हुए हैं और विचार इन्हीं की उपज हैं जो कि बेहद सीमित और संकीर्ण हैं। इसलिए विचार जैसी सीमित शक्ति से एक बुनियादी और आंतरिक परिवर्तन की कामना बेमानी है।
कृष्णमूर्ति हर प्रकार के विभेद और विभाजन को नकारते हैं। जब तक इसकी भ्रान्ति रहेगी तब तक सारे संघर्ष और द्वन्द्व रहेंगे और इसके साथ ही साथ मनुष्य के सारे दुख-संताप उसके साथ साँस लेते रहेंगे। जब तक विभाजन है तब तक संघर्ष है। वे कहते हैं - आपकी पीड़ा किसी भी दूसरे मनुष्य की पीड़ा से मूल रूप से भिन्न नहीं है। इसलिए आपमें से हर इंसान पूरी मानव जाति का प्रतिबिम्ब है। इसलिए आप ही संसार हैं, आप ही समाज हैं और आपके भीतर परिवर्तन आये बिना समाज में मौलिक परिवर्तन नहीं आ सकता। इसलिए विश्व के वर्तमान स्वरूप के लिए भी हम सभी जम्मिेदार हैं।
जे. कृष्णमूर्ति धर्म, जाति, परम्परा और रूढ़िवादिता से ऊपर उठकर एक सच्चे धार्मिक मन की बात करते हैं। "मैं" की मृगतृष्णा से मुक्त मन धार्मिक मन है। सत्यान्वेषण के लिए वस्तुतः प्रस्तुत मन धार्मिक मन है। धार्मिक मन ही क्रांतिकारी और सृजनशील मन होता है। वह हमेशा विनम्रता से सीखने के लिए प्रस्तुत है। आन्तरिक और बाह्य सत्ता के प्रलोभनों से मुक्त है।
मेरा जन्म, वैसे तो कानपुर देहात में हुआ। लेकिन मेरे जीवन का जन्म काशी में राजघाट स्थित जे. कृष्णमूर्ति फाउंडेशन के शिक्षण-संस्थान में हुआ। जहाँ एक ओर श्रीमती ऐनी बेसेन्ट द्वारा शिक्षित अध्यापक और अध्यापिकाओं से जीविकायापन के निमित्त सार्थक शिक्षा मिली तो दूसरी ओर प्रति वर्ष कृष्णमूर्ति शिक्षण संस्थान राजघाट, वाराणसी में लगने वाले विचार-विमर्श के शिविर में आने वाले विश्व दार्शनिक और यायावर जे. कृष्णमूर्ति से जीवन साधने की शिक्षा के गुणसूत्र मिले। वे विभिन्न उम्र के छात्रों के समूहों से अलग-अलग संवाद करते थे। प्रार्थना-सभा के दौरान पीछे से आकर हम बच्चों के बीच में बैठ जाते थे और आँखें मूँदकर, मगन होकर भजन गाने लगते थे। दूरदृष्टि की लगन में लीन कृष्णमूर्ति की भंगिमायें देखते ही बनती थीं। कृष्णमूर्ति स्कूलों के व्यवस्थापकों और शिक्षकों के नाम समय-समय पर ओहाई और लंदन के अपने अध्ययन केन्द्रों से पत्र लिखते थे। जो अब पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित हैं।
कृष्णमूर्ति के सम्बोधनों की संपादित पुस्तकों को पढ़ने, उनके वार्तालापों के सीडी और डीवीडी को सुनने-देखने से यह स्पष्ट होता है कि वे दृष्टा हैं, दर्शनशास्त्री नहीं। उनके संभाषण, संवाद और लेखन को हम शिक्षा कह सकते हैं उपदेश नहीं। उनकी मौलिक अंतर्दृष्टियाँ हैं जो हमारे सामने चुनौती प्रस्तुत करती हैं। वे हमें जीवन के अनुसंधान में साथ-साथ सीधे उतरने का आह्वान करते हैं। वे सत्य के अन्वेषण में हम लोगों के साथ-साथ हैं - मित्रवत्। सत्य एक पथहीन भूमि है वहाँ तक आप किसी भी मार्ग, किसी भी धर्म या किसी भी सम्प्रदाय के द्वारा नहीं पहुँच सकते, यह ऐतिहासिक घोषणा उन्होंने ओमेन, नीदरलैंड (हालैंड) में सन् 1929 में ही कर दी थी। आध्यात्मिक क्षेत्र में या स्वयं को समझने की दिशा में उन्होंने किसी भी पद्धति, साधना, नेतृत्व एवं संगठन को स्वीकार नहीं किया। समझ या बोध आपको कोई दूसरा नहीं दे सकता। इसके लिए आपको स्वयं खोजबीन करनी होगी, ईमानदारी से खुद का अवलोकन करना होगा।
कृष्णमूर्ति बच्चों की सही और समग्र शिक्षा पर गहरा सवाल उठाते हैं, वे पूछते हैं क्या हमारी शिक्षा बच्चे को एक अखंडित-अविभाजित व्यक्ति के रूप में खिलने और वास्तविक मानव बनने में मदद कर सकती है? जिससे बच्चा एक स्वतंत्र मनुष्य बन सके तथा अपने भीतरी और बाहरी प्रभावों को देख समझ सके तथा जीवन के साथ एक लय हो सके, न कि वह जीवन और स्वयं को अलग मानकर मरते दम तक संघर्ष करता रहे ताकि वह हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, अमेरिकी, इज़राइली आदि लेबलों से मुक्त होकर सिर्फ एक सरल, द्वंद्वंरहित इन्सान बन सके। साथ ही वह एक ऐसी जीविका, ऐसा कार्य खोज सके जिससे उसे प्रेम हो, जो दूसरों की महत्वाकांक्षाओं, कल्पनाओं पर आधारित न हो, जो बाजार के बजाए जीवन की सीधी मांग पर आधारित हो। क्या वर्तमान शिक्षा एक ऐसे प्रश्नाकुल मन "क्वेशचनिंग माइंड" का पोषण कर सकती है जो कुछ भी बिना जाँच-पड़ताल के सहज ही न स्वीकार कर लेता हो।
कृष्णमूर्ति यंत्रवत्, मशीनी ढंग से जीने को एक त्रासदी मानते हैं। वे जीवन जीने की महान कला की बात करते हैं। जीने की यह कला आती है हर चीज़ के प्रति सजग और संवेदनशील होने से, हमारे मन-हृदय के खुले एवं शान्त होने से, प्रत्येक चीज़ को ठीक-ठीक देखने और सुनने से। समग्र रूप से जीने के लिए सही-सही देखना और सुनना बेहद ज़रूरी है। कृष्णमूर्ति के लिए सटीक ढंग से देखने या किसी भी बाहरी या भीतरी घटना का बोध होना ही क्रियाशीलता है। वे कहते हैं- अगर हम किसी चीज़ की यथार्थता को देख लें तो क्रिया स्वतः घटित होती है।
विचार भौतिक प्रगति कर सकता है, सामाजिक साँचा बदल सकता है, नवीन विचारधाराएँ एकत्रित कर सकता है, लेकिन मौलिक परिवर्तन में अपनी भूमिका नहीं निभा सकता है। यदि हम इतिहास पर दृष्टिपात करें तो पायेंगे कि विचारधारा द्वारा लाये गये सारे बाहरी सामाजिक परिवर्तन अन्ततः निरर्थक और विध्वंसक सिद्ध हुए हैं। कृष्णमूर्ति प्रकृति और पृथ्वी की हर शक्ति के प्रति असीम करुणा और प्रेम से पूर्ण हैं। वे सदैव सघन, गम्भीर और असीम प्रेम की शक्ति की बात करते हैं। ऐसा प्रेम जहाँ विचार द्वारा निर्मित संकीर्ण संसार विदा हो जाता है तथा सत्य, सौन्दर्य एवं करुणा का अथाह और असीम बोध शेष रह जाता है और ऐसा प्रेम ही भय और स्वार्थ पर आधारित संसार में आमूलचूल बदलाव ला सकता है।

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