ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
भारतीय भाषाओं के अखबार
CATEGORY : शिकागो की डायरी 01-Apr-2017 12:31 AM 158
भारतीय भाषाओं के अखबार

अनेकों बार इस प्रश्न से सामना करती हूँ कि शिकागो में गुजराती, तमिल,
तेलुगु, भाषाओं के अखबार तो छपते हैं, लेकिन हिंदी में कोई अखबार क्यों
नहीं प्रकाशित होता? क्या यहां हिंदीभाषियों की संख्या कम है अथवा
किसी को हिंदी अखबार की जरूरत ही महसूस नहीं होती।

हिंदी अख़बारों की बात ही कुछ ऐसी है। सुबह-सुबह हिंदी न्यूज़ पेपर देखकर जो ख़ुशी मिलती है उसके लिए शायद कोई अच्छा शब्द ही नहीं। चाय की चुस्कियों के साथ हिंदी का कोई अखबार मिल जाए इससे बड़े आनंद की कोई चीज़ शायद ही किसी हिन्दीभाषी के लिए हो सकती है।
शिकागो में हिंदी न्यूज़ पेपर की बहुत कमी महसूस होती है। हालाँकि बहुत से अखबार निकलते हैं यहाँ से पर अधिकाशतः या तो अंग्रेजी भाषा में या गुजरती या तेलुगु और तमिल में होते हैं। इनमें से अंग्रेजी में निकलने वाले न्यूज़ पेपर जैसे "ही इंडिया" (क्तत् क्ष्दड्डत्ठ्ठ), "देसी टॉक" (क़्ड्ढद्मत् च्र्ठ्ठथ्त्त्), "इंडिया बुलेटिन" (क्ष्दड्डत्ठ्ठ एद्वथ्थ्ड्ढद्यत्द) आदि खरीदती हूँ और उन्हें पढ़ती हूँ। ये अखबार साप्ताहिक होते हैं और इनमें भारत और अमेरिका की खबरों के अलावा शहर की भारतीय गतिविधियों की भी जानकारी होती है। इनमें खबरें और जानकारी तो भरपूर मिल जाती है पर यह हिंदी में नहीं होती। हो सकता है किसी और शहर में हिंदी भाषा में अख़बार निकलता हो पर शिकागो में मुझे अभी तक ऐसा कोई हिंदी का अखबार नहीं मिला। सोचती हूँ कि यहाँ रहने वाले हिन्दीभाषियों के लिये क्या यह खेद की बात नहीं कही जायेगी। गुजराती, तेलुगु, तमिल के साथ ही हिंदी में भी क्यों नहीं कोई अखबार यहाँ से प्रकाशित होता है? यही बड़ा सवाल है। क्या हिंदी भाषी इतने कम हैं यहाँ या फिर किसी को हिंदी अखबार की कोई जरूरत ही महसूस नहीं होती।
मुझे नहीं लगता इनमें से कोई भी बात सही है। हिंदी भाषी भी यहाँ बहुतेरी संख्या में हैं और यकीनन कहा जा सकता है कि हिंदीभाषी को हिंदी में पढ़ने में जो सुकून मिलता है वह बयान नहीं किया जा सकता। शिकागो शहर में हिंदी भाषा जानने वालों का तबका बहुत है और ये नौकरीपेशा लोग हैं जिसमें से तकरीवन अस्सी प्रतिशत लोग इलेक्ट्रॉनिक्स और कंप्यूटर टेक्नॉलॉजी की दुनिया में कार्यरत हैं। इन सभी की मातृभाषा हिंदी है, लिहाजा इन्हें हिंदी बहुत अच्छे से आती है। इस तरह के लोगों का अधिकतर काम अंग्रेजी में ही होता है। ऑफिस हो या बच्चों का स्कूल, हर तरह की जानकारी और देश-दुनिया की खबरें आसानी से अंग्रेजी में मिल जाने के कारण ये कभी हिंदी की इतनी अधिक जरूरत नहीं समझते शायद और न ही कभी इसके प्रोत्साहन के लिए आगे आने की हिम्मत जुटा पाते हैं, यद्यपि इनको कहीं से मुफ्त की हिंदी की पत्र-पत्रिकाएं उपलब्ध करवा दी जायें तो ये बहुत चाव से इन्हें पढ़ते हैं। प्रश्न है कि जब बिना किसी शुल्क या फिर कहें कि बहुत ही कम दामों में जब दुनिया की, अपने देश की ख़बरें और जानकारियाँ इन्हें आसानी से मिल जाती हैं तो फिर ये क्योंकर हिंदी की पत्रिकाओं को खरीदने पर पैसा क्यों कर खर्च करें। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि अपनी मातृभाषा की लगातार अनदेखी करते जाने से आने वाली पीढ़ियाँ पर भाषायी संस्कारों से वंचित होने का खतरा पैदा हो गया है।
तमाम नकारात्मक खबरों के बीच अच्छी खबर ये भी है कि अमेरिका में जगह-जगह हिंदी भाषी ग्रुप बने हुए हैं जो अव्यावसायिक संस्थाओं की तरह काम करते हैं और अपनी भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देते हैं। इनका काम सराहनीय तो है, लेकिन इस तथ्य को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि इनमें से अधिकांश संगठनों पर व्यक्तिगत प्रचार-प्रसार और आत्मप्रदर्शन की धुन सवार हो गई है।
अनेकों बार हिंदीभाषियों को तब असहज स्थितियों का सामना करना पड़ता है, जब हिंदी में होने वाले कार्यक्रमों की सूचनाएँ अंग्रेजी में प्रसारित होती हैं। कार्यक्रम की जानकारी के विज्ञापन अंग्रेजी में प्रकाशित होते हैं। अमूमन कार्यक्रमों का संचालन भी अंग्रेजी में किया जाता है।
वहीं दूसरी तरफ गुजराती, तमिल, तेलुगु भाषाओं के अख़बार भी निकलते हैं, जिसमें इनकी ही भाषा में विज्ञापन से लेकर देश-दुनिया की खबरें और जानकारियाँ होती हैं। अगर इनके भाषा का कोई कार्यक्रम है तो इसके संचालन से लेकर समापन तक में आप इनकी भाषा की एकता को देख सकते हैं। सिर्फ स्टेज तक ही सीमित नहीं इनकी भाषा। स्टेज से उतररने के बाद भी उतने ही आत्मविश्वास के साथ अपनी भाषा और अपनी संस्कृति को प्रोत्साहित करते हुए लोग नजर आते हैं। पर हिंदीभाषियों के साथ उल्टा होता है।  अपनी भाषा के प्रति लगाव दिखने में उनका संकोच जगजाहिर है।
भाषा की एकता से कैसे कम्युनिटी की एकता पुष्ट होती है और फिर यही भावना उन्हें आपस में एक-दूसरे की मदद को प्रोत्साहित करती है, इसके अनेक उदाहरण यहाँ विभिन्न दक्षिण भारतीय भाषाओं के संगठनों में देखे जा सकते हैं। एक सच यह भी यहाँ देखने को मिलता है कि व्यवसाय के क्षेत्र में गुजराती, तमिल, तेलुगु भाषी लोग ही अधिक हैं। इन भाषाओं के अख़बार, पत्र-पत्रिकाएं और विज्ञापन या फिर अन्य तरह की जानकारी इनकी भाषा में ही ज्यादातर होती हैं। यही इन अखबारों की सफलता का आधार है और इनके छोटे-बड़े व्यवसाय की सफलता और प्रोत्साहन में इसका बड़ा हाथ होता है। यही प्रोत्साहन और एकता ही इनको लगातार आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है।
हिंदीभाषियों के साथ भी शायद भारतीय भाषायी एकता का मुद्दा अड़चन बनकर खड़ा हो जाता है। हालांकि हिंदी फिल्मों की लोकप्रियता ने इस मुद्दे को यहां काफी हद तक खत्म ही कर दिया है, लेकिन सार्वजनिक मंचों पर भाषायी संगठन अपने अस्तित्व की सार्थकता को प्रमाणित करते रहते हैं। कोई भी एक ऐसा मंच जो भारतीय अस्मिता का सर्वांग तरीके से प्रतिनिधित्व करे, इसका अभाव स्पष्ट तौर पर दिखाई देता है। संतोष के लिये यही कहा जा सकता है कि शिकागो के हिंदीभाषी इन्टरनेट पर उपलब्ध हिंदी के अखबारों और पत्रिकाओं पढ़कर खुश हो लेते हैं। वरना सुबह-सबेरे अपनी भाषा में छपे हुए अखबार को पढ़ने का अपना अलग ही सुख होता है।

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