ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
इंडोनेशिया में भारतवंशी छवियाँ
01-Jan-2017 12:42 AM 3644     

इंडोनेशिया के प्रवासी भारतीयों पर बात करने बैठे तो दिल-दिमाग की डायरी के बहुत से पन्ने खुलते जा रहे हैं। पहली बार वहां एक अध्यापक के तौर पर जाने का मौका मिला। उस समय बहुत सी ऊहापोह थी, लेकिन जाने के उत्साह में वे सब बातें दफ़न हो गयीं। जब जकार्ता हवाई अड्डे पर उतरे, बाहर आये तो प्रतीक्षा करती कार और उसके बाहर खड़ी महिला अध्यापिका नैनू सिद्धू ने "सलामत पागी" कहकर अभिवादन किया। नाम, शक्ल-सूरत में विशुद्ध भारतीय, परन्तु भाषा उच्चारण में इण्डोनेशियाई। कुछ भी पूछने के लिए अभी जल्दबाजी होगी, ऐसा सोचकर हम चुपचाप उनकी जुबानी और अपनी आँखों से उस रास्ते के अद्भुत सौन्दर्य, लोगों के चेहरे, उनकी शालीनता, विनम्रता को आत्मसात करते जा रहे थे।
हमारी कार, जकार्ता से पश्चिम जावा के शहर पूर्वाकार्ता जतिलुहुर की ओर जा रही थी। ये इंडोरामा सिंथेटिक यार्न फैक्टरी का कैम्पस था, जहां के इंटरनेशनल स्कूल में हम हिन्दी अध्यापिका के तौर पर नियुक्त हुए थे। फैक्टरी गेट में प्रवेश के साथ ही खूबसूरती से मानो तराशा गया कैम्पस का विस्तार था। गाड़ी सीधे हमारे दो वर्षों के लिए बनने जा रहे आवास की ओर जा रही थी।
फिर एक बार चौंकने की बारी थी। कार जहां रुकी, बायीं ओर हनुमान जी का बेहतरीन मंदिर। दायीं ओर बोर्ड लगा हुआ था- "गुरु हॉस्टल"। सोचा, जहां हिन्दी का इतना सम्मान है, पढ़ाने में कितना मज़ा आयेगा। मिस सिद्धू ने बताया यहाँ की भाषा में टीचर को गुरु बोलते हैं। मिस सिद्धु इंडोनेशिया निवासी ऐसी भारतीय थीं जिनके पूर्वज चार पीढ़ियों पहले यहाँ काम करने आये थे और आज उनकी पीढ़ियां विभिन्न व्यवसायों से जुड़ी हैं और उन्हीं की तरह भारत मूल के अनेक भारतीय हैं जिनके वट वृक्ष की शाखाएं तमाम व्यावसायों को संभालती हुई देशभर में बाली, सुमात्रा-जावा, सुराभाया, सुलावेसी, इरियन जयाट, मूलतः जकार्ता में फैली हुई हैं, जिन्हें आज विश्व भर में "डायोस्परा" बोला जाता है। सैद्धांतिक तौर पर भारतवंशी केवल कैनीबियाई राष्ट्रों की भारत मूल की उस आबादी को कहा जाता है, जो भारत से उपनिवेशी सियासती तंत्र द्वारा खेती के लिए बंधुआ मजदूर की हैसियत से ले जाए गए थे और पीड़ाओं के सब दंश झेलते हुए ये अपने को भारत से जोड़े रहे। फर्क इतना है कि ये वे भारतीय हैं जो काम और व्यवसाय के लिए यहाँ स्वेच्छा से आये और यहाँ की मूल धारा से जुड़ गए।
इंडोनेशिया में प्रवासी भारतीयों का एक बड़ा वर्ग है। प्रवासी भारतीय वे परिवार थे जो कई दशकों से यहाँ काम कर रहे हैं, उन्हें इंडोनेशिया की नागरिकता प्राप्त है। आज मोटे तौर पर यहाँ भारत मूल के डेढ़ लाख से ऊपर प्रवासी भारतीय तथा लगभग बीस हजार विभिन्न सैक्टर वर्क वीसा में विशेषज्ञ के तौर पर कार्यरत हैं। अकेले जकार्ता में इनकी संख्या बीस हजार के लगभग है।
इतिहास के झरोखों में झांकें तो माना ये जाता रहा कि एक समय यहाँ हिन्दुओं की आबादी अठारह मिलियन थी, लेकिन आँकड़ों की मानें तो यहाँ साढ़े तीन मिलियन आबादी हिन्दुओं की है। सुमात्रा में ही लगभग पचहत्तर हजार की आबादी उन तमिल भारतीयों की है जो एक सदी पहले से डच मालिकों द्वारा खेती के लिए मजदूर के रूप में यहाँ लाये गए औ वे अब यहीं के निवासी हो गये हैं। यहाँ भारत मूल के हिन्दू, मुस्लिम, सिख-सिन्धी समुदाय कि भारी संख्या है जिनके पास यहां का पासपोर्ट है, राजनीति का हिस्सा हैं और वहां की आर्थिक प्रगति में बराबर का योगदान कर रहे हैं। जकार्ता में स्पोट्र्स, टेक्सटाइल, इलैक्ट्रॉनिक्स, स्टील से लेकर हर व्यावसाय पर उनका प्रभुत्व है। वे यहां उद्योगपति, व्यावसायी, बुद्धिजीवी के तौर पर सम्मानित हैं। इसके अलावा 1970 के बाद इंडोनेशिया के पुनर्गठन के साथ बहुत बड़ी संख्या में भारतीय उद्योगपति उद्योग लेकर यहाँ आये। उनके साथ इंजीनियर, बैंकर, एक्सपर्ट, व्यावसायी, चार्टर्ड अकाउंटेंट यहाँ की मूल धारा के साथ काम कर रहे हैं।
सबसे गर्व की बात है कि इंडोनेशिया की मूल आबादी भारतीयों का सम्मान करती है और उनके साथ भी और उनके आधीन भी काम करने में अपने को अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित और सम्मानित मानती है। आपसी समझ और विश्वास है, बिल्कुल यही स्थिति प्रवासी भारतीयों की है। घर से लेकर उद्योगों तक ये वहां के लोगों पर पूरा भरोसा रखते हैं। एक बार इंडोनेशिया जाने के बाद शायद कोई ही वापस आना चाहता है या दूसरे देश में जाना चाहता है। यहाँ के लिए कहावत है- "जावा सो ना आवा।"
ये एक बहुत सुखद सच है कि विश्व के सभी राष्ट्रों की भांति यहाँ भी भारतीय समुदाय अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत के प्रति अतिरिक्त संवेदनशील हैं। इंडोरामा के अलावा भारतीय कम्पनी ऐल्लिगैनट, ऑस्ट्रेलिया की साऊथ पैसिफिक सिंथैटिक यार्न की फैक्टरी, देशभर में फैले स्टील टेक्सटाइल व अन्य उद्योगों-व्यवसायों में भी भारी तादाद में प्रवासी भारतीय काम कर रहे हैं। प्रवासी भारतीयों की भी दूसरी-तीसरी पीढ़ी नजर आ जाती है, जो बच्चे वहां पैदा हुए, वहीं शादी हो गयी, वही बस गए। सबसे बड़ी बात जो वहां रहकर समझ आयी कि बाहर रहते हुए अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखने मेें प्रवासी भारतीयों में उत्साह दिखाई देता है।
इंडोनेशिया में भारत की तरह मिठाई के बाजार नहीं हैं, शाकाहारी भोजन यहाँ के खाने में नगण्य ही हैं, लेकिन हनुमान जयंती पर सारा प्रसाद घरों में तैयार होता है। प्रसाद का मतलब है कि पचासों किलो मिठाई, थाल के थाल, काजू की बर्फी, पिस्ता रोल, मलाई चमचम, रसगुल्ले, गुलाब जामुन लड्डुओं से लेकर, तीन-चार सौ लोगों का पूरा खाना घरों में बनाता है, ग्रुप बन जाते हैं, घर की शादी जैसा माहौल होता है। एक जगह हनुमान जयन्ती तो दूसरी फैक्टरी में गणेश चतुर्थी का उत्सव इसी स्तर पर होता है। जकार्ता में शिव मंदिर भी प्रवासी भारतीयों की गतिविधियों का केंद्र है। वहां सभी भगवान् की मूर्ति है और वहां हर सप्ताह का प्रायोजित प्रसाद-भोजन होता है, जो सभी आने वालों के लिए मेजबानी कर रहे परिवार सिर्फ दान देते हैं, बाकी सब मंदिर के नियमित भंडारे, रसोई हैं जो पूरी देखभाल करते हैं। अयप्पा मंदिर मूलतः दक्षिण भारतीयों का मंदिर है।
योग्याकार्ता एवं बाली की रामायण, वहां के प्रमुख पर्यटन का हिस्सा हैं। योग्याकार्ता तो सांस्कृतिक-शैक्षणिक केंद्र हैं और प्राचीन अवशेषों में बोरोबुदूर और पैराम्बनन विशाल ऐतिहासिक महत्त्व के मंदिर हैं। उन्हें लोग देखने जाते हैं लेकिन मंदिरों में भी किसी प्रकार की पूजा नही होती। रामायण महाभारत वहां रचा बसा है। स्वरूप बेशक अलग हो, घटोत्कच घताकचा, युधिष्ठिर धमीजा, सीता सिन्ता है। क्योंकि बाली हिन्दू द्वीप है, अतः हिदू कलैंडर के अनुसार नए वर्ष पर देश में राष्ट्रीय अवकाश रहता है। यहाँ के बीस हजार के नोट पर गणेश भगवान् की फोटो है।
वहां के चर्च में भी हम भारतीय होने के नाते जाते हैं। हमारी पहचान प्रवासी भारतीय की है। हम ईसाई हैं या नहीं कोई फर्क नही पड़ता। क्रिसमस का मौक़ा था। अपने क्रिश्चियन साथियों के साथ हम लोग जकार्ता के चर्च में थे। सभी देश के ईसाई वहां होंगे, प्रार्थना चल रही थी। अचानक कार्यक्रम को रोकते हुए, बहुत धीरे और शान्त मन से प्रार्थना को वहीं रोक कर के लोगों को चुपचाप बाहर निकालने और वापस घर जाने के लिए कहा गया और सबका निकलना शुरू हो गया। कोई प्रश्न नहीं, कोई भगदड़ नहीं, सबसे महत्वपूर्ण है वहां के लोगों की यही शालीनता, वापस पूर्वाकार्ता के लिए गाड़ी में बैठ गए, मालूम पड़ा कि बाली में चर्च में आतंकवादियों द्वारा बहुत बड़ा ब्लास्ट हो गया था। भारी संख्या में लोग मारे गए और एहतियात के तौर पर सारे चर्च खाली करा दिए गए थे।
मुस्लिम घोषित राष्ट्र का सम्पूर्ण ढ़ांचा वहां है, हर सार्वजनिक स्थल पर नमाज पढ़ने के स्थल की व्यवस्था है। लेकिन वहां काला बुर्का नहीं है, मौलवी-मुल्ला जैसा स्वरूप नहीं है। सिर पर मात्र हिजाब पहनती हैं महिलाएं। पाश्चात्य वेशभूषा पहनती हैं, हिन्दू भारत में सहिष्णु माने जाते हैं, लेकिन मुस्लिम समुदाय में ऐसी धार्मिक सहिष्णुता शायद ही कहीं इतनी देखने को मिले। रमादान माह के रोजे हैं, नमाज है, लेकिन बाह्य सामाजिक आचार व्यवहार में साम्प्रदायिकता जैसा तो शब्द भी नहीं सुनाई देगा। मंदिर के पुजारी और पड़ोसी मुस्लिम मित्र परिवार साथ बैठ कर खाना खाते हैं। इस्लाम का परिष्कृत स्वरूप का नाम है इंडोनेशिया।
प्रवासी भारतीय हैं या डायोस्परा वहां केवल रोजी-रोटी नहीं कमा रहे हैं, राजनैतिक एवं आर्थिक क्षेत्र में सक्रिय होने के साथ-साथ, अपने सामाजिक-सांस्कृतिक, धार्मिक एवं शैक्षणिक गुणवत्ता को बनाए रखने तथा राष्ट्रीयता से जोड़े रखने के लिए कई सामाजिक संगठन सक्रिय हैं।

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