ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
तुम साथ हो तो घर की कमी फिर नहीं खलती
CATEGORY : शायरी की बात 01-Mar-2017 12:11 AM 936
तुम साथ हो तो घर की कमी फिर नहीं खलती

कविता एक कोशिश करती है जीवन का चित्र बनाने की। अवनीश कुमार की किताब पत्तों पर पाजेब ऐसी ही एक कोशिश है। आजकल ग़ज़लें थोक के भाव लिखी जा रही हैं और छप भी रही हैं। अमूमन हरेक पत्रिका में एक आध ग़ज़ल का प्रकाशित होना अनिवार्य हो गया है। बहती गंगा में हाथ धोते हुए नौसीखिये कच्चे शायर बहुतायत में नज़र आ जाते हैं। विचारणीय है कि जिस विधा में सदियों से कहा जा रहा हो उसमें कोई नयी बात कहना या फिर किसी पुरानी बात को नए अंदाज़ से कहना आसान काम नहीं है, लेकिन जब कभी ऐसा नज़र आता है तबियत खुश हो जाती है :
बाढ़ का पानी घरों की छत तलक तो आ गया
रेडियो पर बज रहा मौसम सुहाना आएगा
सड़क पर ठंडी बियर के बोर्ड को पढ़ते हुए
सोचता हूँ कब एक छोटा चायखाना आएगा
ढूध से चलती हों जिसमें रोटी के चक्के लगे
देखना ऐसा भी कारों का ज़माना आएगा
अवनीश कुमार के लिए कविता न तो उच्छ्वास है और न अदाकारी। वे इस चलताऊ माहौल के रचनाकार नहीं हैं यद्यपि उनकी हर ग़ज़ल पहले मिसरे से ही हमें बाँध लेती है और आखिरी शेर तक पहुँचते-पहुँचते हमारे एहसास की दुनिया एकदम बदल जाती है :
बहुत था बीमार सूरज हड़बड़ाकर धूप ने
गिरवी रख दीं तीरगी के हाथ अपनी चूड़ियाँ
ज़िन्दगी भर रामलीला में लड़े सच की तरफ
मज़हबी दंगे में वो मारे गए रहमत मियां
जब वो बोले लगे कानों में शहद सा घुल गया
पहन रक्खीं नीम की सीकों की जिसने बालियाँ
उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के भूड़नगरिया गाँव में 1969 में जन्में अवनीश कुमार वनस्पति विज्ञान में एमएससी हैं और बीएड करने बाद शिक्षा विभाग में सहायक बेसिक शिक्षा अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। उनका पहला कविता संग्रह आइना धूप में 1993 को प्रकाशित हुआ था उसके बाद पत्तों पर पाजेब ग़ज़ल संग्रह।
हमारे चारों और घटने वाली छोटी-छोटी घटनाओं पर उनकी पैनी नज़र जाती है और वो उसे शेर में ढाल देते हैं।
इस संग्रह में रोमांटिक ग़ज़लें भी हैं, पर उनका मिजाज़ यथार्थवादी है। उड़ान है, पर मिट्टी की खुशबू के साथ।
ग़ज़लों में अपनी बात कहने का उनका निराला अंदाज़ उन्हें अपने समकालीन शायरों से अलग करता है और भीड़ में अपनी पहचान बनाता है।
गुलों में ढूढती फिरती है बेकल
तितलियाँ खुशबुओं के ख़त पुराने
आज फिर अब्र के घूंघट से साधे
शिकारी चाँद ने सौ सौ निशाने
तेरी चाहत की चिंगारी रखी है
हमारे फूस के हैं, आशियाने
वाणी प्रकाशन द्वारा इस किताब को प्रकाशित किया गया है। इस किताब की हर ग़ज़ल और वो सभी नज्में जो आखिर में दी गयी हैं, अवनीश जी की विलक्षण सोच का लोहा मनवा देती हैं। उनकी कलम के जादू से पाठक बाहर नहीं निकल पाता। शायरी की ऐसी बेजोड़ किताब हर उस शख्स के पास होनी चाहिए जिसे शायरी से मोहब्बत है।

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