ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
शाम होती है तो घर ज़ाने को जी चाहता है
CATEGORY : शायरी की बात 01-Apr-2017 01:17 AM 848
शाम होती है तो घर ज़ाने को जी चाहता है

शायरी की किताबों को खोजते हुए जब
    नए मौसम की खुशबू किताब पर
     मेरी नज़र पड़ी तो लगा जैसे गढ़ा खज़ाना हाथ लग गया है। इस किताब के शायर हैं जनाब इफ्तिख़ार आरिफ़। किताब के पहले पन्ने पर दर्ज शेर - मेरे खुदा मुझे इतना तो मोतबर कर दे / मैं जिस मकान में रहता हूँ उसको घर कर दे, पढ़कर शायरी की नयी खुशबू महसूस हुई। लगता है उर्दू शायरी में मकान और घर के महीन से फर्क को इतनी ख़ूबसूरती से शायद ही कभी बयां किया गया हो। इस एक शेर ने शायर को वो मुक़ाम दिया जिसकी ख्वाइश हर शायर अपने दिल में रखता है।
मेरे खुदा मुझे इतना तो मोतबर कर दे
मैं जिस मकान में रहता हूँ उसको घर कर दे
मैं ज़िन्दगी की दुआ मांगने लगा हूँ बहुत
जो हो सके तो दुआओं को बेअसर कर दे
मैं अपने ख़्वाब से कट कर जियूं तो मेरा ख़ुदा
उजाड़ दे मेरी मिटटी को दर-बदर कर दे
शायरी में सूफ़ियाना रंग के साथ मज़हबी रंग का प्रयोग सबसे पहले आरिफ़ साहब ने किया जो सत्तर के दशक में नया प्रयोग था। बाद के शायरों ने उनके इस लहजे की बहुत पैरवी की और ये लहजा उर्दू शायरी का नया मिजाज़ बन गया। आज भी हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के अनेक नौजवान शायर आरिफ़ साहब की तरह शेर कहने की कोशिश करते हैं।
हिज्र की धूप में छाओं जैसी बातें करते हैं
आंसू भी तो माओं जैसी बातें करते हैं
खुद को बिखरते देखते हैं कुछ कर नहीं पाते
फिर भी लोग खुदाओं जैसी बातें करते हैं
एक ज़रा सी जोत के बल पर अंधियारों से बैर
पागल दिए हवाओं जैसी बातें करते हैं
आरिफ़ साहब का जन्म लखनऊ में हुआ। उन्होंने जिस समय लखनऊ विश्व विद्यालय से एमए किया, वहां मसूद हुसैन रिज़वी, एहतिशाम हुसैन, रिजवान अल्वी और मौलाना अली नक़ी जैसी बड़ी हस्तियाँ मौजूद थीं। इनके बीच रहकर उन्होंने साहित्य, तहजीब, रिवायत और मज़हब का पाठ पढ़ा।
नद्दी चढ़ी हुई थी तो हम भी थे मौज में
पानी उतर गया तो बहुत डर लगा हमें
दिल पर नहीं यकीं था सो अबके महाज़ पर
दुश्मन का एक सवार भी लश्कर लगा हमें
गुड़ियों से खेलती हुई बच्ची की गोद में
आंसू भी आ गया तो समंदर लगा हमें
लखनऊ विश्व विद्यालय से एमए करने के बाद आरिफ़ साहब पकिस्तान चले गए। वहां उन्होंने रेडिओ पाकिस्तान और टेलिविज़न में काम किया। बाद में वे लन्दन में बीसीसीआई के जनसंपर्क प्रशासक और उर्दू मरकज़ पदों पर आसीन रहे।
समझ रहे हैं मगर बोलने का यारा नहीं
जो हम से मिल के बिछड़ जाय वो हमारा नहीं
समन्दरों को भी हैरत हुई कि डूबते वक्त
किसी को हमने मदद के लिए पुकारा नहीं
वो हम नहीं थे तो फिर कौन था सरे बाज़ार
जो कह रहा था कि बिकना हमें गवारा नहीं
इस किताब में उनकी चुनिन्दा ग़ज़लें और बेमिसाल नज्में शामिल हैं। उनकी उर्दू में लिखी चार किताबें मंज़रे आम पर आ चुकी हैं। देवनागरी में पहली बार उनके कलाम को वाणी प्रकाशन वालों ने प्रकाशित किया है।

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