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शांगहाई में पहली बार हिन्दी नाटक
01-May-2017 08:33 PM 3321     

शांगहाई में 22 अप्रैल को प्रसिद्ध नाटककार मोहन राकेश की कृति "आषाढ़ का एक दिन" का मंचन किया गया। आधुनिक शांगहाई के इतिहास में यह पहला मौक़ा था जब किसी हिन्दी नाटक का मंचन यहाँ किया गया। अपनी मिट्टी और संस्कारों से प्रेम करने वालों के साथ हिन्दी साहित्य और रंगमंच में दिलचस्पी रखने वालों के लिए शांगहाई रंगमंच की ओर से यह पहली प्रस्तुति थी। नाटक के निर्देशक और कालिदास की भूमिका निभाने वाले श्री मुकेश शर्मा ने बताया कि "गैर हिन्दी प्रदेश के लोग जिन्होंने कभी रंगमंच के लिए काम ही नहीं किया वैसे कलाकारों के साथ संगीत नाटक अकादमी द्वारा पुरस्कृत नाटक के मंचन का फ़ैसला उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती थी। टीम के ज्यादातर सदस्य विभिन्न निजी कंपनियों में बड़ी जिम्मेदारी निभा रहे हैं ऐसे में सप्ताह के दिनों में उनके साथ सिर्फ स्काइप पर ही अभ्यास संभव हो पाता था और वो एक साथ सिर्फ सप्ताह के अंत में ही मिल पाते थे, लेकिन सभी कलाकारों की लगन और पाँच महीने के कठिन परिश्रम की वजह से नाटक का मंचन संभव हो पाया।"
महान कवि कालिदास के जीवन पर आधारित इस नाटक में कालिदास की प्रेमिका मल्लिका की भूमिका में प्रियंका जोशी ने अपनी अदाकारी से दर्शकों को भावुक कर दिया। मातुल की भूमिका में अमित वायकर, कालिदास के स्व-घोषित मित्र आर्य विलोम की भूमिका में अमित मेघणे, मल्लिका की माता अंबिका की भूमिका में धनश्री और राज वधु की भूमिका में अपर्णा वायकर ने अपने-अपने अभिनय से दर्शकों को ना सिर्फ़ दो घंटे तक बाँधे रखा बल्कि सबों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस मौक़े पर मुख्य अतिथि के तौर पर उपस्थित शांगहाई कांसुलावास प्रमुख श्री प्रकाश गुप्ता ने कलाकारों की तारीफ़ करते हुए कहा कि काफी साल पहले उन्होंने इस काव्य को पढ़ा ज़रूर था लेकिन वर्षों बाद शांगहाई में इसका मंचन देखकर मन हर्षित हो उठा।
शांगहाई रंगमंच अकादमी (विदेश रंगमंच विभाग) के वाइस प्रेसिडेन्ट प्रोफ़ेसर यूउ ने कलाकारों और निर्देशक की भूरि-भूरि प्रशंसा की। हिन्दी भाषा का ज्ञान नहीं होने की वजह से प्रोफ़ेसर यूउ नाटक की विवेचना नहीं कर पाए लेकिन उन्होंने इसे अच्छी शुरूआत बतायी साथ ही भविष्य में हिन्दी नाटककारों की कृति को चीनी भाषा में प्रस्तुत करने की इच्छा भी जतायी। भारतीय संघ, शांगहाई के प्रमुख श्री राज खोसा ने प्रस्तुति और कलाकारों की प्रशंसा करते हुए इसे हिन्दी प्रोत्साहन के लिए सराहनीय क़दम बताया।
दर्शकदीर्घा में बैठे ज़्यादातर लोग ग़ैरहिन्दी भाषी क्षेत्र से थे। नाटक के संवाद क्लिष्ट हिन्दी में होने के बावजूद दर्शकों ने इसे ख़ूब सराहा। नाटक के अंतिम दृश्य में कालिदास और मल्लिका के संवाद ने दर्शकों की आंखें नम कर दी। शांगहाई में इस नाटक के सफल मंचन और दर्शकों की उपस्थिति यही दर्शाती है कि वर्षों से अपनी मिट्टी, अपनी भाषा-बोली से दूर रहने के बावजूद उससे प्रेम करने वालों और हिन्दी रंगमंच से लगाव रखने वालों की संख्या अभी खत्म नहीं हुई है। शांगहाई में इसकी सफलता के बाद अब चीन की राजधानी बीजिंग और व्यवसायिक शहर ग्वॉगजौ से भी इसके मंचन का आग्रह आया है। अपने ही देश में अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हिन्दी-रंगमंच के लिए यह खुशी की खबर है।

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