ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
स्तरहीनता के दौर में उच्च शिक्षा
01-Sep-2017 03:11 PM 1508     

महाराष्ट्र का एक प्रसिद्ध विश्व विद्यालय इन दिनों परीक्षा परिणामों को घोषित न कर पाने के कारण बुरी तरह से विवादों के घेरे में है। "न भूतो" स्थितियों का सामना करने के बावजूद अभी तक न परीक्षा फल घोषित हुआ है न ही छात्र आगामी कक्षाओं में प्रवेश ले पाए हैं। जहाँ प्रवेश-प्रक्रिया ही अभी तक ठीक से शुरू नहीं हुई, वहाँ अध्ययन आदि बातों का तो नामोनिशान तक संभव नहीं। इसके जवाब में कई नए सवाल उभर आते हैं। अध्ययन-अध्यापन से संबंधित आरंभिक प्रक्रिया में इतनी देर हुई है कि अब आगामी सत्र, परीक्षाएँ आदि का पूरा नियोजन गड़बड़ा गया है। जाँच की कई समितियाँ, मंत्री-संत्री, कोर्ट-कानून सभी के हस्तक्षेप के बावजूद महीनों बाद भी गड़बड़ाई व्यवस्था ढर्रे पर नहीं आ पा रही है। यह और ऐसी कई घटनाएँ इन दिनों सतत सभी ओर दिखाई दे रही हैं जो इस तथ्य की ओर संकेत करती हैं कि भारत में शिक्षा-क्षेत्र विशेषत: उच्च शिक्षा व्यवस्था की धुरी गड़बड़ा गई है। हम जैसे अध्यापक, जिनकी रोजी-रोटी इस क्षेत्र से जुड़ी हुई है, यह सोचने पर विवश हो गए हैं कि अब शिक्षा क्षेत्र को गंदला करती समस्याओं को जानें-पहचानें, उसकी जड़ तक जाएँ और यथासंभव समाधानों की तलाश करें।
भारत की वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था मूलत: भारत की प्रकृति, प्रवृत्ति, संस्कार और संस्कृति के अनुरूप नहीं है, इस तथ्य को सर्वप्रथम स्वीकार करना पड़ेगा। प्राचीन भारत में विद्यमान गुरुकुल शिक्षा पद्धति में शस्त्र से लेकर शास्त्र तक, चौंसठ कलाओं से लेकर धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष को साधती कुशलताओं तक के प्रशिक्षण पर बल दिया जाता था। छात्र स्वयं को जिस विषय के अनुकूल पाता, उनकी गहन शिक्षा प्राप्त करने का उसे अधिकार था। तब संभवत: किसी विशिष्ट कौशल-प्रशिक्षण या शाखा अध्ययन को ऊँचा या नीचा समझने की प्रवृत्ति विद्यमान न थी। परिणामस्वरूप अपनी रुचि व क्षमताओं के अनुरूप प्रशिक्षण प्रत्येक छात्र को अपने आप में एकमेवाद्वितीय सिद्ध करता था। किंतु समय के साथ स्थितियाँ बदलीं।
भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में कई विदेशी संस्कृतियों के आक्रमण हुए पर उन सबने भारत को अधिकाधिक समृद्ध बनाया क्योंकि भारत की मूल वृत्ति नकार की नहीं, बल्कि स्वीकार की रही है। अत: आर्य, शक, हूण, पुर्तुगाली, डच, फ्रेंच और मुस्लिम संस्कृतियों से भारत ने काफी कुछ पाया। भाषा से लेकर खानपान तक और वस्त्र परिधान से लेकर रीति-रिवाजों तक, कई बातों का आदान प्रदान आपातत: भारत की गरिमा को वृद्धिगत ही करता गया। यह बाहरी संस्कृतियाँ भी भारत से बहुत कुछ पाकर यहीं बस गई या फिर यहाँ के संस्कार अपने साथ ले गईं। इनमें अंग्रेज एकमात्र ऐसे आक्रमणकारी थे जिन्होंने भारत को केवल लूट के योग्य, असभ्य और बर्बर समझा। अपने दीर्घ शासन काल में राजकाज चलाने के लिए आवश्यक मनुष्य बल इंग्लैंड से यहाँ आयात करना अंग्रेजों को श्रेयस्कर नहीं लगा, सो यहीं गुलाम पैदा करने की गरज से उन्होंने लॉर्ड मेकाले की शिक्षा-पद्धति यहाँ लागू कर दी। भारत की प्राचीन शिक्षा-व्यवस्था में जहाँ "मनुष्य" का गठन किया जाता था, लॉर्ड मेकाले की शिक्षा व्यवस्था अंग्रेजों के मनोनुकूल गुलामों का गठन करने लगी। अंग्रेजी शिक्षा, आधुनिक सुख-सुविधा, पश्चिमी तौर तरीकों का सुव्यवस्थित संप्रेषण करती यह व्यवस्था अंग्रेजों के जाने के इकहत्तर वर्षों बाद भी भारतीयों द्वारा बदस्तूर स्वीकृत की जा रही है। पराया पौधा यहाँ की माटी में उग तो आया लेकिन उसने यहाँ के वासियों को विशेष लाभ नहीं पहुँचाया। इसमें या तो फल आए ही नहीं और आए भी तो समय के साथ वे अधिकाधिक विषाक्त सिद्ध हो रहे हैं।
लॉर्ड मेकाले की लागू की गई यह शिक्षा-पद्धति सक्षम मनुष्य का निर्माण नहीं कर पा रही है। इस व्यवस्था में रट्टा मारकर, सबक याद करनेवाले तोते पैदा किए जा रहे हैं। यह सबक भी मात्र परीक्षा को केंद्र में रखकर रटा जाता है और परीक्षा के तत्काल बाद अप्रासंगिक जानकर भुला दिया जाता है। ऐसे छात्र, ऐसे उधार पाये हुए सबक देश के लिए क्या उपकार कर पायेंगे?
शिक्षा का मूल उद्देश्य प्रत्येक छात्र की आंतरिक क्षमताओं का सर्वांगीण विकास कर उसे सही मायने में आत्मनिर्भर बनाना होता है। प्रत्येक छात्र अपने आप में "युनिक" होता है लेकिन उसकी छुपी हुई क्षमताओं का उसे एहसास दिलाकर उसमें उड़ान भरने का बल शिक्षा-व्यवस्था द्वारा मिलना चाहिए। प्रत्येक छात्र में उच्च कोटि की गुणवत्ता उसी प्रकार निहित होती है जैसे हिरन की नाभि में कस्तुरी और अफसोस जो अपरिचित भाव हिरन का अपने भीतर छुपी कस्तूरी के संदर्भ में होता है, उसी प्रकार छात्र भी अपनी योग्यताओं से अपरिचित होता है। शिक्षा ही उसे "नजर" देकर खुद से मिलाती है। आज की शिक्षा अपने इस मुख्य उद्देश्य से कोसों दूर है। इस शिक्षा-व्यवस्था में गुरू घाघ और मतलबी, छात्र आलसी और कर्मच्युत बन चुके हैं। सारी व्यवस्था दिशाहारा हो चुकी है। इस स्थिति में शिक्षा व्यवस्था की एक-एक इकाई की पड़ताल, उसकी सार्थकता-निरर्थकता पर चर्चा अत्यंत आवश्यक है ताकि, बीती बातों की टीस भुलाकर कम से कम भविष्य तो सँवारा जा सके।
वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था के प्रमुख स्तंभ हैं - पाठ्यक्रम, शिक्षक, शिक्षार्थी एवं परीक्षा। इन चार प्रमुख स्तंभों के अलावा शोध का आयाम भी शिक्षा-क्षेत्र की गरिमा बढ़ाने का अत्यंत महत्वपूर्ण काम करता है। इन सभी तत्वों की एक-एक इकाई की शल्यक्रिया कर उनमें यथावश्यक सुधार किए जाएं तो आज भी शिक्षा व्यवस्था की डूबती नैया पार लग सकती है। पाठ्यक्रम इस व्यवस्था में प्राण-वायु का-सा महत्व रखता है। आखिर, क्या पढ़ाया जा रहा है, यही बात छात्रों का (आपातत: देश का) भविष्य निर्धारित करती है। भारत की प्रकृति-प्रवृत्ति के अनुरूप पाठ्यक्रमों में मूल्याधिष्ठित तत्वों का समावेश अत्यंत आवश्यक है। छुटपन में छूटने वाली "मॉरल साइंस" की असल दरकार तो उच्चशिक्षा में है। महाविद्यालयीन-विश्वविद्यालयीन छात्रों को वर्तमान परिवेश ऐसे-ऐसे पाठ पढ़ा रहा है जिनका निर्वाह भारतीय वातावरण में संभव नहीं। भारतीय मानस के लिए सुपाच्य शिक्षा इस समय आवश्यक है। इसका तात्पर्य यह कतई नहीं कि पाठ्यक्रमों में वेद-शास्त्रों का समावेश हो, बल्कि पश्चिमी वायवी बातों को छोड़कर यहाँ कदम-कदम पर महसूस होनेवाली समस्याएँ, उनकी सविस्तार जानकारी, निवारण के उपाय और सुलझाववादी मुद्दों को पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाए। महाराष्ट्र राज्य माध्यमिक व उच्च माध्यमिक पाठ्यक्रम की समन्वयक होने के नाते मैं, संपादक मंडल द्वारा बनाए गए पाठ्यक्रम का अवलोकन कर रही थी जिसमें "वँँटिली छाँह" कहानी का समावेश, कहानी की उत्कृष्टता के बावजूद, मुझे खटका। मानवी संबंधों में आनेवाली समस्याएँ, स्त्री-पुरूष संबंधों की उलझनें, आज के "लिव इन" का कुछ-कुछ ग्रामीण रूप साकार करते मास्टर जी और राधा के संबंधों का समर्थन शिक्षार्थी को क्या उपयुक्त सबक देगा, यह मेरा सवाल था। लंबी बहस के उपरांत "जिंदगी और गुलाब के फूल" पर सहमति जताते हुए पाठ्यक्रम निर्धारित किया गया। सोचा, इससे भारतीय माटी की भली-बुरी बातों की जानकारी तो शिक्षार्थी पा ही लेगा।  
पाठ्यक्रम के ही संदर्भ में एक अत्यंत आवश्यक और यथार्थवादी मुद्दा यह कि पाठ्यक्रम रोजगार केंद्रित हो। वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था डिग्री तो दे रही है पर यह डिग्री रोजगार देने की अपेक्षा बेरोजगारों की फौज तैयार कर रही है। आज बी.ए., एम.ए. की डिग्री पाया हुआ छात्र भी "स्किल्ड्" नहीं। कागज की डिग्रियाँ, उन पर छपे अंक निदर्शक आँकडे अलग बात हैं और प्रत्यक्ष किसी कौशल या कला में पारंगत होना अलग बात है।
वर्तमान शिक्षा किसी स्किल-कौशल को डेव्हलप नहीं कर पा रही है। अत: बहुत जरूरी है कि छात्रों के कौशल का विकास करते पाठ्यक्रम बनाये जाएँ, बहुत जरूरी है कि छात्रों को उनकी रुचि के अनुकूल व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान किया जाए, बहुत जरूरी है कि भाषा को समूची संस्कृति का प्रातिनिधिक रूप मानकर अधिक से अधिक भारतीय भाषाओं को पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाए। बहुत जरूरी है कि पाठ्यक्रम ऐसे हों जो छात्रों की सकारात्मक ऊर्जा को योग्य पद्धति से "चैनलाइज्ड" करें। इन सारे "बहुत जरूरी" बदलावों को शामिल करने के बाद जो शिक्षा पायी जायेगी वह देश और समाज के लिए उपयुक्त ही होगी।
शिक्षक और शिक्षार्थी सदैव ही शिक्षा-व्यवस्था के अत्यंत महत्वपूर्ण घटक रहे हैं। आज यह दोनों घटक इतने लचर बन चुके हैं कि शिक्षा-व्यवस्था का चरमराना लाजमी है। बड़ी मुश्किल से नकल कर-कराकर "पास" हो चुका बंदा राजनीतिक प्रभाव या अर्थ के बल पर प्राध्यापक बन जाता है। जितना गँवाया है, उसकी "वसूली" का लक्ष्य पाना उसका एकमात्र साध्य होता है। कक्षा में जाना, पढ़ाना, छात्रों को समय देना, उनकी योग्यता व आवश्यकता जानकर उन्हें मार्गदर्शन करना किसी जमाने के गुरू करते होंगे। आज के "गुरूघंटाल" इन सब में समय नहीं गँवाते। चूँकि न हमारे पाठ्यक्रमों का पुनरावलोकन हुआ है न ही दशकों से उनमें कोई परिवर्तन ही हुआ है, सालों पहले बनाए या कहीं से पाये नोट्स के पीले पड़ चुके पन्नों के आधार पर रिटायरमेंट तक का समय काटा जाता है। इन लगभग सभी शिक्षकों के पूरक व्यवसाय भी हैं। कोई पुश्तैनी खेती-बाड़ी संभालता है, कोई पशुपालन करता है, कोई प्लॉटिंग आदि में दलाली करता है, कोई ट्युशन पढ़ाता है, कोई बीमा एजंट है... माने शिक्षक "अध्यापन" के अलावा सब कुछ बड़े मनोयोग से करता है। नतीजा यह कि आजकल के गुरू ज्ञान के मामले में चाहे जितने कंंगाल हों, अपार बैंक बैलंस के धनी होते हैं। आजकल तो शिक्षा-व्यवस्था में सुधार करने की दरकार भाँपकर "काम के अनुरूप वेतन" का नियम लागू किया गया। इसके सकारात्मक परिणाम तो क्या होंगे, नकारात्मक परिणामों ने नाक में दम कर दिया। वैैरीयर एडवांसमेंट स्कीम अर्थात पदोन्नति योजना के लिए "एपीआई" लागू किया गया जिसकी वजह से शिक्षा-क्षेत्र की बची-खुची नैतिकता भी "राम" बोल गई। भूले भटके कक्षा में जाने वाले प्राध्यापक अब गाँव-गाँव सेमीनारों में डोलने लगे। सेमीनारों से ज्ञान पाना तो दूर, जान पहचान बढ़ाकर अपने लिए संभावनाएँ तलाशी जाने लगीं। बाकायदा पैसा देकर लिखवाया भी जा रहा है और आईएसएसएन नामांकन प्राप्त पत्रिकाओं में छपवाया भी जा रहा है। जो शिक्षक जितना ज्यादा घूमेगा, वह उतना ज्यादा "एक्टिव" माना जाने लगा। इस चक्कर में जिन छात्रों को पढ़ाने-प्रशिक्षित करने के लिए उसकी नियुक्ति की गई है, उन छात्रों को ही समयलेवा तत्व जानकर दरकिनार कर दिया जाने लगा।
ऐसे "अंधे" गुरूओं के छात्र भी "खरे आँधले" साबित हो रहे हैं। शिक्षक कक्षाओं में पढ़ाते नहीं; यह बात जितनी सच है, उतना ही सच यह भी है कि छात्र कक्षाओं में पढ़ने जाते ही नहीं। प्रश्न उठता है कि जब पढ़ना ही नहीं तो प्रवेश क्यों लेते हैं? उत्तर सरल है - सरकार की ओर से मिलने वाले अलग-अलग वजीफे, छात्रवृत्तियाँ पाने मात्र के लिए कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या अपार है। यह छात्रवृत्तियाँ विशिष्ट जाति, धर्म के छात्रों को ही दी जाती हैं। अत: इन्हें इनकी परिणामशून्यता देखकर बंद करने की गुस्ताखी कोई नहीं कर सकता। यदि ऐसी हिम्मत कोई करे तो "हमारे पढ़ने के अधिकार में बाधा डाली जा रही है" का आक्षेप उठाकर ईंट-से-ईंट बजाई जायेगी। सो ऐसे छात्र निर्बाध गति से "पढ़ते" रहते हैं। मैंने स्वयं ऐसे अनगिनत छात्र देखे हैं जो फैलोशिप आदि के कारण एकाधिक विषयों में एमए, एमफिल तथा शिक्षा-क्षेत्र की सर्वोच्च डिग्री पी-एच.डी. तक "अध्ययन" करते हैं और "आजीवन छात्र" होने पर शब्दश: अमल करते हैं।
महाविद्यालय विशेषत: विश्वविद्यालय भावी नेता बनने का अभ्यास करने का स्थान बन चुका है। यहीं नारेबाजी, मोर्चेबाजी, अधिकारों के प्रति तथाकथित सजगता, अनशन, मारामारी जैसे आगामी राजनीतिक जीवन में उपयुक्त सिद्ध होने वाले पाठ पढ़े जाते हैं। ऐसी रंगारंग दिनचर्या में क्लास में जाकर किताबी कीड़ा भला कौन बनाना चाहेगा? दूसरी बात, जो पढ़ते हैं, उनकी पढ़ाई का भी व्यक्तिगत, पारिवारिक दृष्टि से कोई उपयोग सिद्ध नहीं हुआ है सो पढ़ने से बची-खुची श्रद्धा भी उठ चुकी है।
उच्च शिक्षा में अनुसंधान का अपना महत्व है। अनुसंधान ही उच्च शिक्षा को प्राणवत्ता प्रदान करता है। किसी जमाने में जीवन भर अध्ययन-अध्यापन कर चुके विद्वान किसी विषय के उपेक्षित पहलुओं को अनुसंधान के माध्यम से प्रकाश में लाते थे। वह वास्तविक शोध हुआ करता था जिसमें सारे जीवन का कमाया हुआ ज्ञान कुछ अप्रकाशित तथ्यों को सर्वज्ञात कराने में लगाया जाता था। आजकल हर ऐरा गैरा नत्थ्ूू खैरा एमए की डिग्री हाथ में आते ही एमफिल, पी-एच.डी. की "डिग्री" के पीछे हाथ धोकर पड़ जाता है। अनुसंधान किस चिड़िया का नाम है, यह तक न जानने वाले छात्र अनुसंधान कर रहे हैं। छात्रवृत्ति-रिसर्च फैलोशिप, इसका बहुत बड़ा कारण है। लगभग हर दूसरा छात्र अपने शोध-निर्देशक से ही पूछता है कि शोध के लिए कौन-से विषय का चयन करूँ? यह शर्त भी दागता है कि अनुसंधेय विषय ऐसा हो जिसके लिए बहुत अधिक खोजबीन न करनी पड़े और बना बनाया "मैटर" उपलब्ध हो सके। हमारे विश्वविद्यालय में एमफिल और पी-एच.डी. की एंट्रेन्स परीक्षा में "निगेटिव मार्किंग" लागू करने के बाद उठा बवाल, आंदोलनों का आया सैलाब याद करने मात्र से सिहरन उठती है।
कुल मिलाकर उच्च शिक्षा ऐसी स्थिति में है जिसका पटरी पर आना जितना जरूरी है, उतना ही कठिन भी। अपने देश, अपने समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व को निरंतर स्मरण करते हुए शिक्षा जैसे ईश्वरतुल्य मूल्य की रक्षा के प्रति अग्रसर हो तो स्थिति संभल भी सकती है। आखिर उम्मीद पर ही तो दुनिया कायम है!

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