ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
बाज़ार से गुज़रा हूँ
CATEGORY : रम्य रचना 01-Mar-2017 08:44 PM 661
बाज़ार से गुज़रा हूँ

जी सरकार, हमारे जैसे बिंदास बशर दुनिया में रहते तो हैं लेकिन उसके तलबगार नहीं होते। अकबर इलाहाबादी की तरह हम भी बाज़ार से गुज़रते हैं, मगर ख़रीदार भी हों ये ज़रूरी नहीं। अब भले ही हम असली ख़रीदार ना हों लेकिन खिड़की - ख़रीदार (ध्र्त्दड्डदृध्र्-द्मण्दृद्रद्रड्ढद्ध बुद्धू) तो हो ही सकते हैं। तो भैया हम संसार के मार्किट से भले ही बेलौस गुज़र जाएँ पर दिखावट और सजावट का पूरा-पूरा जायज़ा लेते चलते हैं। यही नहीं, हम तो घर लौटकर, समझ झरोखे बैठ कर उस पर तकरीर भी करते हैं। कहने का तात्पर्य यह कि साहबान! हमें राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं, फिर भी आँख, कान और दिमाग़ रखते हैं। आजकल देश में जो राजनैतिक नाटक चल रहा है उसे देखने और उस पर टिप्पणी करने का हमें पूरा-पूरा हक़ है। उसमें शुमार होना या ना होना हमारा ज़ाती मसला है। वोट देना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।
वोट से याद आया कि यूँ तो बसन्त बहार है, लेकिन देश में मौसम-ए-चुनाव है। मुफ्तखोरी की भरमार है। कुछ पार्टियां तोहफ़े बाँट कर पब्लिक को अपने जाल में फंसाने की कोशिश कर रही हैं और कुछ चंट चालाक नेता, बिना कुछ लिए दिये ही मतदाताओं से कहते हैं- "भैये पैसे उनसे लो और वोट हमें दे दो।" क्यों भई हमें क्या काले कौवे काटा है जो हम तुम्हें वोट दें? और तुमने किया ही क्या है? पाँच साल के बाद अब शक्ल दिखाई है, वो भी भीख का कटोरा हाथ में लेकर। कटोरा भरते ही आप शहंशाह बन जायेंगे (कर्नाटका के मुख्यमंत्री श्री सिद्धरमैया की तरह)। असलियत तो यह है कि- सलाम कीजिये आली जनाब आये हैं, ये पांच सालों का देने हिसाब आये हैं। हिसाब में बहुत गोलमाल घोटाला है। जहाँ घोटाला है वहां आपकी पार्टी सत्ता में है राहुल बाबा। आपकी पार्टी के मुख्य मंत्री ना किसानों की परवाह करते हैं ना ही जनता की। वो तो फ्लाई ओवर बनाने के लिये दो हज़ार पेड़ भी कटवाने पर तुले हैं। जनता विरोध कर रही है परन्तु ज़िल्लेसुभानी सुनने को तैयार ही नहीं। और तो और साहब-ए-आलम बड़े-बड़े प्राइवेट क्लबों में भी मुफ्त प्रवेश करना चाहते हैं। सोचो राहुल बाबा सोचो, इन हरकतों से तो ये अंतिम राज्य भी कांग्रेस के हाथ से निकल जायेगा। फिर ना कहना कि ये मोदी ने किया है। वैसे भी आप बेवजह मोदी को अंट शन्ट बोलते रहते हैं, भइये -
सबब तलाश करो अपने हार जाने का
किसी की जीत पे रोने से कुछ नहीं होगा
पप्पू भैया, न तो हम किसी सियासती पार्टी से राब्ता रखते हैं, ना ही हम कोई मोदी भक्त हैं; लेकिन राजनीति के कैनवास पर जब नज़र डालते हैं तब हमें कोई भी तो ऐसा रंग दिखाई नहीं देता जो मन को मोह ले। हरा रंग हमें बहुत पसन्द था क्योंकि यह हरियाली का प्रतीक है। परन्तु जब से आतंकवादियों ने इसे मुसलमानी क़रार देकर हरे झंडे को दहशत का प्रतीक बना दिया, हमने हरी पत्तियों की जगह लाल पीले फूलों को देखना प्रारम्भ कर दिया।
भगवा रंग हमें कभी पसन्द नहीं था। ये हमें नकली बाबाओं की याद दिलाता है। हमने तो कई बार ताऊ नरेंदर से कहा कि भैया "अस्ताचलगामी सूरज का रंग है सिंदूरी, इससे दूर रहना।" लेकिन उनकी अपनी मजबूरी है। भारत की राजनीति में आप किसी से बिगाड़ कर टिके नहीं रह सकते। कांग्रेस को ही देख लो - हर समय समाजवादी पार्टी को गलियां देने वाले राहुल बाबा ने उसी पार्टी से गठबंधन कर लिया। इसे थूक कर चाटना नहीं तो और क्या कहेंगे? याद दिलाने पर कि भाई वो गालियाँ मुहोब्बत में कैसे बदल गयीं तो भैया जी निहायत आशिक़ाना अंदाज़ में बोले "यह दिल का बन्धन (ठ्ठथ्थ्त्ठ्ठदड़ड्ढ) है। लो जी अब हम क्या कहें-
ये तो दिल का मुआमला है कोई दिल्लगी नहीं।
दरअसल ये मामला दिल का नहीं कुर्सी का है। अरे भाई जब श्रीमान ईमानदार मनमोहन जी, भारत की रानी, इटली की नौकरानी के गुलाम बन कर रह गये सिर्फ कुर्सी पर टिके रहने के लिये तो बेपढ़ा लिखा पप्पू क्या चीज़ है। उस बेचारे को तो खटोला तक नसीब ना हुआ। एक बात बतायें - गांव में कुछ दब्बू और बुद्धू किस्म के लड़कों को इस शर्त पे क्रिकेट में शामिल किया जाता था कि जब-जब गेंद नाली में जायगी तो दब्बू जी उसे नाली में से निकाल कर लायेंगे। कुछ ऐसी ही शर्त पर अखिलेश ने राहुल को सपा में शामिल किया है।
अखिलेश की बात चली है तो आपको बता दें कि उनका एक चुनावी मुद्दा यह भी है कि बुज़ुर्गों का ख़ास खयाल रखा जायेगा। क्यों नहीं, आखिर संस्कारी बेटे हैं। जैसा ख़्याल अपने पिताश्री का रखा है वैसा ही बाक़ी बुज़ुर्गों का भी रखेंगे। बेचारे मुलायम जी तो अपने ही जुमले के गुनहगार हैं कि "लड़कों से गलती हो जाती है।" देखो ना हो गयी गलती। अरे हो क्या गयी, होती ही जा रही है गलती पर गलती। साइकल छीन ली कोई बात नहीं लेकिन बाप को एक कार ही दे देते या फिर कार खुद रख लेते और साइकल बाप को दे देते। बाप-बेटे भी खुश और जनता भी सन्तुष्ट रहती। पर हम क्यों बोलें, सियासत की बातें सियासतदां जाने। यह तो मानना पड़ेगा कि जिसने अपने बाप को दरकिनार कर दिया उसने राहुल और शीला दीक्षित को भी उनका सही स्थान दिखा दिया। इसी बात पर हाजिर है एक शेर -
ये सियासत की मंडी है, इसमें सब कुछ बिकता है
पहले तो नीलाम यहां ख़ुद्दारी करनी पड़ती है।
"खुद्दारी की बात छोड़िये, राहुल बाबा का इसरो से बचपन का नाता है। यह कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। पप्पू और इसरो - इतना बड़ा वैज्ञानिक  संस्थान और बालक राहुल! आश्चर्य! खुलासा करने पर मालूम हुआ कि  स्कूल में उन्हें हमेशा यह नसीहत मिलती थी कि "उस रो (द्धदृध्र्) में मत बैठो, जा कर इसरो (द्धदृध्र्) में बैठो "हँसना मना है।"
अब पप्पू की बात चली है तो गप्पू कैसे पीछे रह सकते हैं। उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत माँगा था। हमने कहा कि इन्हें सीमा पर भेज दो, लेकिन गप्पू जी पीछे हट गये। अब फिर कहते हैं कि "मुझे अंतरिक्ष में भेजो, सेटेलाइट गिन कर आऊंगा।" अरे भाई इन्हें इकतरफा अभियान पर भेज दो। (अब हँस लीजिये।)
कल हमने मायावती को टीवी पर सुना। बड़ी लंबी तकरीर थी। मुद्दे तो हम भूल गये - जो याद रहा वो है सम्पुट "इस बार"। अर्थात "इस बार हम यह करेंगे, इस बार हम वह करेंगे, इस बार हम सब वादे निभायेंगे" आदि  इत्यादि। मतलब ये कि अब तक तो कुछ नहीं किया, एक मौका और दे दो इस बार ज़रूर करेंगे। भइये माया की माया को कौन जानता है? है कोई गारंटी? बहन जी, सुना होगा आपने "काठ की हांडी दोबारा चूल्हे पर नहीं चढ़ती।"
चलिये चुनाव की बात फिर कभी,  अभी एक घटना की बात करते हैं। जनवरी में बड़े पैमाने पर बंगलुरु में प्रवासी दिवस मनाया गया। आयोजन सांस्कृतिक कम, राजनैतिक ज़्यादा था। और जो भी कुछ हुआ हो - हमें उससे कुछ लेना देना नहीं परन्तु एक बात खटक गयी। इस आयोजन में कुछ  प्रवासियों को पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
ज़ाहिर है कि कुछ गिने-चुने लोगों को ही पुरस्कृत किया गया। अब हमें इतना जानने का हक़ तो है कि जो लोग सम्मानित हुये उनका क्या योगदान था। किस मापदण्ड से उन्हें चुना गया। साथ ही, जो लोग रह गये वे कहाँ चूक गये। ऐसे किसी भी सवाल का आयोजकों के पास कोई जवाब नहीं है। आखिर घपला कहाँ हुआ है।
विदेश में बसे भारतीय प्रवासी कहलाते हैं। जो विदेशी भारत में बस गये हैं उन्हें क्या कहते हैं? हम भारतवासी बहुत बड़ा दिल रखते हैं। सबको अपना लेते हैं। लेकिन हम सम्वेदनशील भी हैं। ऐसी वैसी बात बर्दाश्त नहीं करते। जब प्रियंका मोदी को "बाहरवाला" (दृद्वद्यद्मत्ड्डड्ढद्ध) कहती हैं तो आश्चर्य के साथ दुःख भी होता है। साहबान! भारतीय माता-पिता के बेटे अगर बाहरवाले हैं तो इटालियन माँ की बेटी त्दद्मत्ड्डड्ढद्ध कैसे हो गयीं?
ख़ैर जिस तरह पूरे हिंदुस्तान की विभिन्न पार्टियां एकजुट होकर मोदी के ख़िलाफ़ बोल रही हैं, हमें चाणक्य  की एक सूक्ति याद आती है -- "गद्दारों की टोली में अगर हाहाकार हो समझ लो कि देश का राजा चरित्रवान है और प्रतिभासम्पन्न है तथा राष्ट्र प्रगति के पथ पर अग्रसर है।"
चलते-चलते : पोलैंड में एक यौन-आंदोलन मचा देने वाली फिल्म ॠद्धद्य दृढ ख्र्दृध्ड्ढ ने हंगामा बरपा कर दिया है। वहां का सेंसर बोर्ड कुछ ना कर सका। भारत में कुछ ऐसी ही फिल्म "ख्र्त्द्रद्मद्यत्ड़त्त् द्वदड्डड्ढद्ध थ्र्न्र् डद्वद्धत्त्ण्ठ्ठ" डठ्ठद कर दी गयी है। यह एक पुरस्कृत फिल्म है। संस्कार के नाम पर कब तक हम इन जाहिल कट्टरपन्थियों को झेलते रहेंगे? आखिर ये कौन होते हैं हमें सिखाने वाले कि हम क्या देखें और क्या ना देखें?

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