ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
आधी आबादी का पक्ष
CATEGORY : विमर्श 01-Apr-2017 12:25 AM 473
आधी आबादी का पक्ष

पिछले महीने की आठ तारीख़ यानी आठ मार्च को जब दुनियाभर में अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जा रहा था तो मेरे दिमाग़ की शिराओं में महिलाओं की सदियों से चली आ रही व्यथा कथा की चित्रमाला दौड़ रही थी। अपने दिमाग़ के कोने में चल रहे इन चलचित्रों को देखकर लग रहा था कि वाक़ई में महिलाओं की स्थिति दुनिया के सभी देशों और समाजों में पहले से काफ़ी बेहतर हुई है। पश्चिमी देशों में तो ये परिवर्तन लम्बे समय से निरन्तर चला आ रहा है, मगर भारत में महिलाओं का परिवर्तित दृष्टिकोण और विकासशील व्यक्तित्व पिछले एक दो दशकों में जितना ज़्यादा नज़र आया है उतना पहले कभी नहीं आया। हालाँकि भारतीय महिलाओं की स्थिति को पहले से बेहतर मानने व न मानने के सम्बन्ध में भी जितनी नज़रें हैं, उतने ही नज़रिये।
बहुतेरे बड़े बुज़ुर्गों के हिसाब से तो भारतीय महिलाओं का तरक़्क़ी और उन्नति के नाम पर सिर्फ़ पश्चिमीकरण होकर रह गया है और कुछ भी नहीं। और उनकी इस सोच के पीछे तर्क ये है कि भारतीय महिलाएँ जो अब तक भारतीय परिधानों में लिपटी सिमटी, भारतीयता एवं इसकी उन्नत संस्कृति की परिचायक हुआ करती थीं वो अचानक से पिछले दो दशकों में जींस, स्कर्ट पहने स्कूटर, मोटर गाड़ियों में घूमती और अंग्रेज़ी में बयानबाज़ी करती असभ्य व असंस्कृत सी नज़र आने लगी हैं। किन्हीं खास सन्दर्भों में यह बात कुछ हद तक सही भी हो सकती है। सिर्फ़ कपड़े बदल लेने और अंग्रेज़ी की उल्टी सीधी टाँग तोड़ लेने से महिलाओं की एकाधिकार वाली बात काफ़ी सतही सी लगती है। लेकिन फिर ध्यान से देखो तो लगता है कि कहीं न कहीं से तो ये शुरूआत होनी भी ज़रूरी है तो फिर क्या फ़र्क़ पड़ता है कि वो चुस्त दुरुस्त कपड़ों से हो या अन्तरराष्ट्रीय भाषाओं एवं शिक्षा के विस्तार से अथवा तर्क वितर्क से? बहुत ध्यान से नज़र डालो तो ये सारी शुरुआत एवं क्रिया-कलाप एक-दूसरे से आपस में अन्तर-सम्बन्धित एवं गुँथे-बँधे नज़र आते हैं।
एक ज़माना हुआ भारतीय पुरुषों को भारतीय परिधान छोड़े हुए। हाँ, यूँ ही कभी कभार, तीज त्यौहार वाले दिन कोई-कोई पुरुष पारम्परिक परिधान धारण कर ले वो अलग बात है, मगर दैनिक जीवन में भारतीय पुरुषों का पश्चिमीकरण हुए कई दशक बीत गये, मगर कभी कोई हल्ला नहीं हुआ, क्योंकि मचाता कौन? हल्ला मचाना, धार्मिक और सांस्कृतिक दायरे निश्चित करना और उन्हें अपने से ज़्यादा दूसरों पर लागू करना तो सिर्फ़ पुरुषों का ही नैसर्गिक अधिकार है। पुरुषवादी तर्क में कहें तो "हम करें तो सब सही, आप करो तो वही सब ग़लत"। क्यों भाई, संस्कृति का बोझा ढोने का काम सिर्फ़ स्त्रियों तक ही कैसे सीमित रह गया? अगर आपको पश्चिमी सभ्यता और पहरान-उढान से इतनी ही तकलीफ़ है तो आप पहले अपना पहनावा ठीक करके सभ्यता और संस्कृति के रक्षक क्यों नहीं बन जाते? पहनो धोती-कुर्ता और लगा लो सर पे पगड़ी! क्या परेशानी है?
अभी हाल ही में बैंगलुरु में नववर्ष की शाम को घटित घटना की प्रतिक्रिया स्वरूप काफ़ी लोगों ने फ़ेसबुक, ट्वीटर और अन्य कई सोशल मीडिया के पृष्ठों पर अपने पोस्ट डाले कि "मानो अथवा न मानो, लड़कियों की वेशभूषा अथवा परिधान का उनके साथ होने वाले व्यवहार- दुव्र्यवहार के साथ काफ़ी गहरा सम्बंध है।" उनके कहने का मतलब कुछ ऐसा निकल रहा था कि अगर एक महिला साड़ी, ब्लाउज़ पहने तो इज़्ज़त की अधिकारिणी है लेकिन अगर जींस पैंट पहने तो ताड़ना की। फिर वो साड़ी नेट की और ब्लाउज़ बिना बाज़ू और बिना बैक का ही क्यों न हो।
अब भला ऐसा क्यों? ये समझना तो किसी धुरंधर दिमागधारी के ही बस की बात हो सकती है मगर पैंट शर्ट पहनने वाली स्त्रियों के साथ हुए किसी भी तरह के दुव्र्यवहार को उनके वस्त्रों से जोड़े जाने की बात तो किसी भी तरह गले से नहीं उतरती। चलो एक बार अगर गले उतारने की कोशिश की भी जाए तो फिर सवाल उठता है कि पश्चिम देशों में रह रही महिलाओं को यह समस्या आड़े क्यों नहीं आती? उनके वस्त्र लम्बाई चौड़ाई में जितने भी छोटे-बड़े हों, उनकी आत्मनिर्भरता, मनोबल, आत्मविश्वास एवं आर्थिक स्थिति हमारे देश की साड़ी के पल्लुओं में सिर और चेहरा छुपाने वाली महिलाओं से कहीं उन्नत एवं सुदृढ़ है। उनके वस्त्रों का मापदंड वातावरण एवं स्थिति के अनुसार ख़ुद को बेहतर रूप से हर क्षेत्र में कार्यान्वित रखने का एक वैज्ञानिक एवं सार्थक प्रयास है न कि सभ्य और सुसंस्कारित बने रहने की आड़ में कुछ नवीन न करते हुए घर में घुसे रहने का।
कभी-कभी लगता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हम संस्कृति के नाम पर बदलाव एवं स्वतंत्र व्यक्तित्वों को अपनाने के विरोधी हो गये हैं? अपने आपको पुरातनता से जोड़े रखने के चक्कर में हम नवीनता एवं विभिन्नता के लिए जगह ही नहीं बना पा रहे हैं। वरना क्या वजह हो सकती है कि हमारे बुज़ुर्ग आज की सदी में भी राम-राज्य और अपने पुराने ज़माने की बातें ही शोख़ियों के साथ बघारते हैं। अगर प्रतीकों में ही उत्तर दिये जायें तो इस प्रश्न का सामना करना ही होगा कि सीता के नजरिये से "राम राज्य" कहां तक न्याय की कसौटी पर खरा उतरा, जिसमें उन्हें अपनी पवित्रता साबित करने के लिए अग्नि परीक्षा देनी पड़ी। वो "राम-राज्य" जिसमें मात्र एक धोबी के आपत्ति जताने भर से घर की बहु और देश की महारानी सीता का परित्याग कर दिया गया वो भी अग्नि की ज्वलन्त शक्ति को क्षीण कर पवित्र निकल आने के बावजूद! ऐसे राम राज्य से तो महिलाओं की दुनिया आज कहीं ज़्यादा सुन्दर, सभ्य और सशक्त नज़र आती है।
महिलाएँ हर युग, हर सभ्यता में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चलने के लिए थीं और हमेशा रहेंगी, मगर जब तब येन केन प्रकारेण पुरुष प्रधान समाज ने उन्हें धर्म, संस्कृति, नैतिकता और शालीनता के नाम पर अपने से पीछे एवं निचले स्तर पर बिठाकर सम्मानित करने की कोशिश की है। लेकिन अब और नहीं -- अब चाहे अपने पसंद के परिधानों की बात हो या नौकरी-व्यवसाय की या फिर अपने लिए एक सहचर, सहयोगी ढूँढने की, हर भारतीय महिला अपने जीवन को अपनी प्रकृति, मनोवृति एवं अभिलाषाओं के अनुसार जीने के लिए सक्षम व स्वतंत्र होनी चाहिए क्योंकि एक सफल, संतुष्ट एवं सुदृढ़ नारी न सिर्फ़ अपने परिवार अपितु सम्पूर्ण समाज एवं विश्व के सुंदर एवं सुदृढ़ भविष्य की नींव रख सकती है, उत्तरदायिनी हो सकती है।

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