ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
गुनियाँ प्लैटफ़ॉर्म
01-Jan-2017 01:46 AM 3614     

गुनियाँ

माँ ने चिरैया का नाम
रखा था "गुनियाँ"
कभी सूप पर आ बैठती
और तकती थी माँ की ऐनक को
कभी फुदक कर
आरसी (दर्पण) के सामने जा बैठती थी
लड़ती थी अपने ही साये से
फिर थक कर जा बैठती थी
सूखते कपड़ों की तार पर
माँ की धोती के पास पास
वहाँ से माँ को देखती
फिर माँ को न देखता पाकर वापस
आ बैठती थी माँ के सूप की किनारी पर
इस बीच धूप भी थक कर
छत की मुँडेर पर जा बैठी
नीले आसमान पर चीलें तैरने लगीं
कभी जा उलझती बादलों के क़तरों से
इसी बीच गुनियाँ
वापस आ कर माँ को देखती रही
रसोई में काम करते और फिर
अचानक उड़ चली ये जा वो जा
कल फिर शायद गुनियाँ आयेगी
या फिर पता नहीं कब आयेगी...

प्लैटफ़ॉर्म

ज़िंदगी की रेलगाड़ी
चलती रही
पटरियाँ बदलतीं रहीं
नियति का इंजन चलता रहा छुक-छुक
स्टेशन आये और गये
मुसाफिरों की
आवाजाही बनी रही
मौसम आये भी गए भी
इंजन का धुआँ बांचता रहा
कोई अनकही दास्ताँ
सफर लम्बा ज़रूर था
मुश्किलों से भरपूर था
लेकिन मज़ेदार था
हर वक़्त इक उम्मीद का जलसा था
एक उम्र लगी है
जहाँ तलक आज पहुँचा हूँ
ये बे इंतिहा सच है के हर सफ़र का अंजाम
अपने आप में मुकम्मल होता है
कुछ यादें, कुछ तस्वीरें, कुछ क़िस्से,
कुछ ना उम्मीदें, कुछ रोना धोना
कुछ नसीहतें और उपलब्धियाँ
और इसी का नाम है प्लैटफ़ॉर्म।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 15.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^