ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
भौतिकवादी संस्कृति का वैश्वीकरण
CATEGORY : विमर्श 01-Apr-2017 12:21 AM 928
भौतिकवादी संस्कृति का वैश्वीकरण

भौतिकवादी संस्कृति क्या है? इसकी किताबी परिभाषा क्या है? इसकी जमीनी पहचान क्या है? क्या इसका रूप अपरिवर्तनशील है? निरपेक्ष है? या समाज और समय की परिधि में परिवर्तनशील है? यदि यह सापेक्ष है तो तुलनात्मक मापदंड क्या है? ऐसी कौन-सी सामाजिक मान्यता है जो शाश्वत है, अचल है, समय के कालचक्र से स्वतंत्र है? यदि ऐसी कोई मान्यता है तो निश्चित ही वह मापदंड के काबिल है, जैसे दूर आकाश में ध्रुव तारा। यदि नहीं, तो विचारों का टकराव अनिवार्य है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पर्याय है। ऐसे जटिल प्रश्न मुझे भी कभी-कभी झकझोरते हैं, उत्तर की तलाश करता हूँ परन्तु बीच में ही फँस जाता हूँ। मैंने सोचा है अपनी बात कह डालूँ और निर्णय आप स्वयं करें।
मैं न तो अर्थशास्त्र या राजनीति शास्त्र का विद्वान हूँ और न उनका सक्रिय कर्मी। भौतिकवाद (वस्तुवाद), पूँजीवाद, समाजवाद, अधिनायकवाद इत्यादि की सैद्धांतिक व्याख्या, उनकी उपयोगिता तथा उनके गुण-दोषों की विवेकपूर्ण चर्चा करना तो उन विद्वानों का कार्यक्षेत्र रहा है और आज भी है; किन्तु मैं उस जाल में फँसना नहीं चाहता। हाँ, एक जागृत नागरिक की हैसियत से ज़रूर कुछ कहना चाहूँगा। कुछ लोग भौतिकवाद को पूँजीवाद का एक विस्तार मानते आये हैं, लेकिन इस परिकल्पना में संशोधन की आवश्यकता है। एक बात निर्निवाद रूप से सत्य है - वह है युग परिवर्तन। इसकी शुरुआत कहाँ से हुई और कहाँ इसका अन्त होगा कहना हास्यास्पद होगा, किन्तु यदि हम अपने जीवनकाल को ही एक प्रयोगशाला की तरह देखें तो बहुत कुछ स्पष्ट हो जाएगा।
मेरी नजर में भौतिकवादी संस्कृति का प्रायोगिक रूप है उपभोक्तावाद अर्थात सांसारिक सुख-सुविधा के लिए वस्तुओं का उत्पादन और उनका खुला उपयोग। कुछ लोग वस्तुओं को "आवश्यक" और "विलासिता" की श्रेणी में रखतें हैं, लेकिन यह सोच भ्रामक और अल्पकालिक है। उनके बीच अलगाव की रेखा धुंधली होती जा रही है, सिकुड़ती जा रही है। भारत में दस वर्ष पहले मोबाइल फ़ोन विलासिता का प्रतीक था परन्तु आज यह अति आवश्यक हो गया है - झोपड़ी में रहने वाले भी इसके ग्राहक बन गए हैं, यह उनके रोजगार का एक अभिन्न उपकरण बन गया है। इसी तरह दस वर्ष पहले लैपटॉप कंप्यूटर बड़े शहरों के धनी वर्ग का साधन था किन्तु आज इसकी बाहुल्यता गाँव-गाँव तक फैल चुकी है और यह शिक्षा, व्यवसाय, नौकरी, प्रतिभा सृजन के लिए आवश्यक हो गया है। क्या इसे हम भौतिकवादी मानसिकता का प्रतीक मानेंगे? क्या इसे हम उपभोक्तावादी संस्कृति से जोड़ कर देखेंगे या जन-साधारण के विकास की कड़ी से? इन साधनों के उत्पादन का सिलसिला अमेरिका में शुरू हुआ और कुछ ही वर्षों में दुनिया उस पर निर्भर हो गयी। क्या इसे हम अमेरिकी पूँजीवाद के विस्तार की संज्ञा देंगे? या उपयोगी प्रोद्यौगिकी की ग्राह्यता की संज्ञा देंगे? शिक्षित और महत्वाकांक्षी युवावर्ग से पूछकर देखिये। विगत कुछ वर्षों से सरकारी तंत्र भी मुफ्त में लैपटॉप कंप्यूटर स्कूलों में बाँट रहे हैं, मैं इसकी आलोचना नहीं करता। लेकिन यदि कोई इसे अमेरिकी या पश्चिमी भौतिकवादी संस्कृति के आधिपत्य के रूप में देखता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करता।
जब भी अमेरिकन एप्पल कंपनी एक नया आई-फ़ोन बाजार में उतारती है तो ग्राहकों की कतार लग जाती है, शायद दिल्ली और बंगलुरु में भी ऐसा होता होगा। क्या यह पूँजीवाद का दबाव है? सहज उपभोक्तावाद है? या विकास की दौड़ में आगे रहने की चाह है? इसका उत्तर भी युवावर्ग देगा जो भविष्य के कर्णधार हैं। चीन और दक्षिणी कोरिया जैसे देश कम लागत पर ऐसी वस्तुओं का प्रचुर उत्पादन कर रहे हैं और दुनिया के हर कोने में उनकी उपस्थिति है। साम्यवादी चीन ने भी पिछले तीन-चार दशकों में अमेरिकन पूँजीवादी संस्कृति को अपना लिया है और इसके फलस्वरूप वह एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरकर सामने आया है। वर्षों से दुनिया की मशहूर कम्पनियाँ चीन में उत्पादन कर रही हैं। उनके सैकड़ों सामान अमेरिकन और ऑस्ट्रेलियाई घरों में देखे जा सकते हैं तथा अन्य पश्चिमी देशों में भी उनका फैलाव हुआ है। यदि इसे पाश्चात्य जगत की भौतिकवादी या उपभोक्तावादी संस्कृति कहें तो इसी ने चीन के करोड़ों लोगों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाया है और चीन की सामाजिक स्थिति बदल गयी है।
विडंबना तो यह है कि पूर्वाग्रह से ग्रसित लोग, जिसमें राजनीतिक दल भी शामिल हैं, अमेरिकन पूँजीवाद की आलोचना करते हैं लेकिन चीन के खिलाफ बोलने से परहेज करते हैं! वहीं पर अमेरिका, ब्रिटेन या ऑस्ट्रेलिया में उत्पादित वस्तुएँ काफी महँगी होती हैं और खुले बाज़ार में उनकी माँग घटती जा रही है। इस स्थिति का एक मुख्य कारण है उन विकसित देशों में श्रमिकों का उच्चतर पारिश्रमिक। पश्चिमी देशों की भौतिकवादी आदत को पोषित करने में एशिया के अन्य विकासशील देशों की भी अहम् भूमिका है जहाँ श्रमिकों का वेतन काफी कम है और सामाजिक सुरक्षा का अभाव है। शायद यह गरीबों का शोषण है किन्तु इसके लिए क्या पश्चिमी दुनिया के विकसित देश ही जिम्मेदार हैं? क्या उन देशों की अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं है? शायद वे भौतिकवाद की सार्थकता को चुनौती देने में असमर्थ हैं। सच्चाई तो यह है कि विकसित देशों के ग्राहक और श्रमिक संस्थाओं ने गरीबों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाई है ताकि बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ उन्हें उचित पारिश्रमिक और सुविधा दें। ऑस्ट्रेलिया में कुछ कंपनियों को चिह्नित भी किया गया है जो गरीबी का अनुचित लाभ उठाती हैं। ऐसी सामाजिक चेतना ही असीमित उपभोक्तावादी संस्कृति पर अंकुश लगा पाएगी और तब उपलब्ध सीमित संसाधनों के अन्धाधुन्ध दोहन पर भी प्रतिबन्ध लगेगा।
यह कहना अस्वाभाविक होगा कि यूरोप और अमेरिका ने अन्य देशों को प्रभावित नहीं किया है। पश्चिमी देश आधुनिक विज्ञान और प्रोद्यौगिकी के जनक रहे हैं - फिर कौन उनके प्रभाव से वंचित रह सकता है? यह भी सच है कि उनकी सामाजिक संस्कृति भी विज्ञान की सहभागिनी रही है। यह अमेरिका और भारत के सन्दर्भ में विशेष रूप में लागू होता है, क्योंकि विगत चार-पाँच दशकों में लाखों भारतीय अमेरिका में बस गये हैं और उनकी भूमिका सराहनीय रही है। इसने एक सांस्कृतिक सेतु को मजबूत आधार दिया है। इसी सांस्कृतिक प्रवाह ने यदि भौतिकवाद दिया है, तो महिला सशक्तिकरण का मन्त्र भी। स्वाभाविक है कि अमेरिकन समाज की कुछ विकृतियाँ भी हमारी जीवनशैली में प्रवेश करें, लेकिन उनका निदान करना देशवासियों के ऊपर है। आजादी की लम्बी अवधि के बाद अब हम वयस्क हो चुके हैं! जिन देशों ने अपने ऊपर "लौह पर्दा" (आयरन कर्टेन) डाल रखा था वे भी अमेरिकन प्रभाव से नहीं बच पाए।
यह कहना उचित होगा कि भौतिकवादी संस्कृति का वैश्वीकरण हो गया है। दुनिया के देश इस दौड़ में शामिल हो गए हैं। समाज का प्रत्येक तबका अपनी क्षमता के अनुसार उपभोगी बनता जा रहा है जिसके अनगिनत रास्ते हैं। भौतिकवादी संस्कृति के अनेक आयाम हैं, यह केवल उत्पादित वस्तुओं (त्दड्डद्वद्मद्यद्धत्ठ्ठथ् ढ़दृदृड्डद्म) के उपभोग तक सीमित नहीं है। इसमें शिक्षा, चिकित्सा, संचार, मनोरंजन, सौन्दर्य उद्योग, इत्यादि अनेक सेवाएँ (द्मड्ढद्धध्त्ड़ड्ढद्म) शामिल हैं जिसमें विशाल भारतीय बाज़ार की भूमिका भी चर्चित है। मँहगे प्राइवेट स्कूलों की माँग, कोचिंग संस्थानों का फैलाव, पाँच-सितारा अस्पतालों की श्रृंखला, महिला प्रसाधन सेवा (ब्यूटी क्लिनिक) का प्रसार तो सर्वविदित है। प्रश्न यह नहीं है कि इनका उपभोग उचित है या अनुचित? मुख्य प्रश्न यह कि इनके उपभोक्ता कानून-संगत रास्ते से उपार्जित धन का उपयोग करते हैं या इसमें भ्रष्टाचार का अंश भी शामिल है? यदि दूसरे विकल्प में सच्चाई है तो निश्चित ही यह समाज को पतन के मार्ग पर अग्रसित करेगा। इसका निर्णय समाज-विशेष को स्वयं करना है। हर जगह "विदेशी हाथ" का बहाना बनाकर हम अपने उतरदायित्व से बच नहीं सकते। जनतांत्रिक देशों के लिए यह और भी आवश्यक है क्योंकि उनके शासक जनता के प्रतिनिधि होते हैं।
हाल के वर्षों में उपभोक्तावाद आर्थिक विकास का मुख्य आधार बन गया है अर्थात अधिक उत्पादन और अधिक उपभोग सामाजिक प्रगति के लिए आवश्यक है। जनसंख्या वृद्धि से कई गुणा अधिक उत्पादन करना और जनता की क्रय-शक्ति बढ़ाना सरकार की नीति बन गई है। यह गरीबी पर नियंत्रण और जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने के लिए आवश्यक है। आर्थिक विशेषज्ञों की भाषा में इसे "सकल घरेलू उत्पाद" (क्रद्धदृद्मद्म क़्दृथ्र्ड्ढद्मद्यत्ड़ घ्द्धदृड्डद्वड़द्य) में वृद्धि के नाम से जाना जाता है, जिसमें उपभोक्तावाद अप्रत्यक्ष रूप से सम्मिलित है। यदि उत्पादों की खरीद नहीं होगी तो उत्पादन का चक्का गतिशील कैसे रहेगा? सकल घरेलू उत्पाद में आंशिक गिरावट की आशंका से ही आर्थिक मंदी और बेरोजगारी का भय छाने लगता है। इसलिए अब विश्व की कोई संस्था या कोई राजनीतिक पार्टी, दक्षिणपंथी या वामपंथी, उपभोक्तावाद का विरोध नहीं करती है। आवश्यकता इस बात की है कि सीमित प्राकृतिक सम्पदा और संसाधनों का दोहन उचित मात्रा में किया जाए ताकि भविष्य की पीढ़ी वंचित नहीं हो। यह भी ध्यातव्य है कि विनाशकारी भूमंडलीय तापमान में वृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) का मुख्य कारण औद्योगीकरण है, इसलिए उचित संतुलन बनाए रखना अपरिहार्य है। औद्योगिक प्रदूषण का कुप्रभाव तो बीजिंग और नई दिल्ली जैसे महानगर झेल ही रहे हैं : कई दिनों तक सूरज की रोशनी नहीं दिखती, हानिकारक सूक्ष्म कण साँस के द्वारा शरीर में प्रवेश करते हैं, स्कूली बच्चे मास्क पहनने के लिए वाध्य होते हैं, वाहनों पर प्रतिबन्ध लगते हैं, औद्योगिक संस्थानों में उत्पादन पर रोक लगाए जाते हैं, इत्यादि। इसलिए आवश्यक है कि विकास और उपभोक्तावाद के बीच स्वस्थ संतुलन बना रहे।
इसी सन्दर्भ में यह कहना उपयुक्त होगा कि विगत कुछ वर्षों से ऑस्ट्रेलिया उपभोक्तावाद का केंद्र बनता जा रहा है। सिडनी और मेलबोर्न जैसे शहर वैश्विक पर्यटकों, जिसमे चीन की विशेष भागीदारी है, के लिए आकर्षक बन गया है। वे महँगी और विलासितापूर्ण उत्पादों की खरीद पर प्रचुर धन खर्च करते हैं। लगता है जैसे पेरिस और लन्दन सिकुड़ कर इन शहरों में आ गया है और विश्व के मशहूर उत्पादक यहाँ अपनी भड़कीली दुकानें खोल रहे हैं। चीन में धनाढ्यों, मिलियन और बिलियन डॉलर वालों की संख्या अमेरिकन के समकक्ष पहुँच रही है और सामाजिक दृष्टि से वे ऑस्ट्रेलिया के करीब महसूस करते हैं। अनुकूल जलवायु, समुद्र तट, प्राकृतिक सम्पदा, हरियाली, स्वच्छ वातावरण, सर्वोतम शहर की श्रेणी, अंग्रेजी शिक्षा इत्यादि ने भी इसे आकर्षक केंद्र बनाने में अहम् भूमिका निभाई है। उपभोक्तावाद केवल उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की खरीद तक सीमित नहीं है, यह व्यापक जीवन शैली से जुड़ गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2016 में करीब 11 हजार मिलियनेयर ऑस्ट्रेलिया में आकर बसे, जबकि अमेरिका में ऐसी संख्या 10 हजार और कनाडा में 8 हजार थी। इसका तुलनात्मक प्रभाव तब समझ में आता है जब ध्यान रखें कि ऑस्ट्रेलिया की जनसंख्या करीब 24 मिलियन है और अमेरिका की 325 मिलियन। ऑस्ट्रेलिया में इस श्रेणी के आव्रजकों में अफ्रीका के देशों से आये लोग भी शामिल थे। औद्योगीकरण ने वहाँ भी नए धनाढ्यों को जन्म दिया है। भारत से भी इस श्रेणी के लोग निकलते होंगे किन्तु उनका आंकड़ा स्पष्ट नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि उपभोक्तावाद इक्कीसवीं सदी की संस्कृति बन चुकी है, यह युग परिवर्तन का द्योतक है, इसे उचित रूप में ग्रहण करना ही सार्थक है।
भारत के सन्दर्भ में कुछ विशेषरूप के कहना प्रासंगिक होगा। जब राजनीतिक नेताओं के जन्मदिन पर असीमित धन खर्च किये जाते हैं, जैसे उनका भव्य राजतिलक समारोह हो, तो क्या हमें भौतिकवादी संस्कृति की याद नहीं आती? जब सैकड़ों नेताओं की व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए हजारों सशस्त्र पुलिस बल सरकारी खर्चे पर तैनात रहते हैं तो इस संस्कृति को क्या कहेंगे? यह सुरक्षा से अधिक सम्मान का प्रतीक (स्टेटस सिंबल) हो गया है- शायद इसे राजनीतिक उपभोक्तावाद कहना सार्थक होगा। जीवन पर्यन्त लाभकारी कुर्सी से चिपके रहने की प्रवृति को क्या कहेंगे? यह तो उपभोक्तावाद का चरम नमूना है! पश्चिमी देशों में ऐसा उदहारण शायद ही मिले। क्या इस पर अंकुश लगाना देशहित में नहीं है?
अन्त में एक छोटी कहानी कहकर मैं यह प्रसंग समाप्त करना चाहूँगा। एक महात्मा थे जिनके अनेक जिज्ञासु शिष्य थे। एक दिन उन्होंने कक्षा में एक उजला कपड़ा फैला दिया जिसके बीच एक काला धब्बा था। तब उन्होंने शिष्यों से पूछा, "तुमें क्या दिखाई देता है?" कई शिष्यों ने कहा, "काला धब्बा दिखाई देता है।" एक गम्भीर शिष्य ने कहा, "मुझे उजला कपड़ा दिखाई देता है।" महात्मा ने निर्णय दिया, यह वर्तमान युग की मानसिकता है : हमें किसी की जिन्दगी की सारी अच्छाई नजर नहीं आती, लेकिन उसकी एक बुराई की आलोचना करने से पीछे नहीं हटते। इस प्रवृत्ति से बचना चाहिए। आज मैं एक ही शिष्य को उतीर्ण मानता हूँ। इस कहानी के सन्दर्भ में हमें आत्म-परीक्षण की ज़रूरत है। यह विकासशील देशों पर भी लागू होता है - खासकर इस वैश्वीकरण के युग में।

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