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गांधी जी और पत्रकारिता
01-Apr-2017 12:08 AM 5301     

गांधी जी ने पत्रकारिता को कभी एक व्यवसाय के रूप में
स्वीकार नहीं किया। वे एक मिशनरी पत्रकार थे और
वे इस बात को अच्छी तरह समझते थे कि उनके
मिशन की सफलता के लिए पत्रकारिता
एक अत्यंत सशक्त माध्यम है।

गांधी जी का व्यक्तित्व एक बहुआयामी व्यक्तित्व था। जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जिस पर गांधी जी ने विचार न किया हो और अपनी छाप न छोड़ी हो। अध्यात्म हो या धर्म, राजनीति हो या समाज, परमार्थ हो या व्यवहार, हर क्षेत्र में उन्होंने कुछ न कुछ अपना मौलिक योगदान दिया है। वे सत्य, अहिंसा आदि, सनातन मूल्यों के पक्षपाती थे और व्यवहार में सत्याग्रह जैसी प्रविधि के प्रणेता थे। वे चाहते थे कि ये मूल्य और प्रविधि अधिकाधिक लोग समझें और अपनाएं और अपनी रूढ़िगत निद्रा से जागकर एक संतुलित और नैतिक जीवनयापन करें। गांधी जी ने इस उद्देश्य की सार्विक स्वीकृति को अपने जीवन का मिशन बना लिया था।
गांधी जी ने पत्रकारिता को कभी एक व्यवसाय के रूप में स्वीकार नहीं किया। वे एक मिशनरी पत्रकार थे और वे इस बात को अच्छी तरह समझते थे कि उनके मिशन की सफलता के लिए पत्रकारिता एक अत्यंत सशक्त माध्यम है। हम प्राय: गांधी जी को एक पत्रकार के रूप में नहीं देखते। वे कितने ही सफल पत्रकार क्यों न रहे हों लेकिन उनका बहुआयामी व्यक्तित्व मूलत: एक पत्रकार-व्यक्तित्व नहीं था। मूलत: तो उनका सरोकार आध्यात्मिक मूल्यों की व्यावहारिक जगत में स्थापना ही था। उन्होंने अपना सारा जीवन इसी उदेश्य को समर्पित किया। उन्होंने पाया कि राजनीति में, समाज में, व्यक्ति के सोच में ही अनैतिक वृत्तियों ने कब्ज़ा जमा रखा है और जब तक इनके विरुद्ध दृढ़ता से, आग्रहपूर्वक, खड़ा न हुआ जाए, हम सत्य को प्राप्त नहीं कर सकते। गांधी जी की सत्याग्रह की खोज इसी का परिणाम है। और मोटे तौर पर इसी खोज की प्रोन्नति के लिए उन्होंने अन्य साधनों के अतिरिक्त पत्रिकारिता को भी एक साधन बनाया। लेकिन यह तो बहुत बाद की बात है। शुरू से ही आरम्भ करते हैं।
ऐसा माना जा सकता है कि गांधी जी ने अपना पत्रिकारिता का सफ़र इंग्लेंड से आरम्भ किया और अपने सार्वजनिक जीवन की शुरूआत पत्रकारिता से ही की। इंग्लेंड में उन्होंने टेलीग्राफ और डेली-न्यूज़ जैसे अखबारों के लिए भी लिखना आरम्भ कर दिया। ब्रिटेन में पत्र-पत्रिकाओं में लिखने का यह अभ्यास गांधी जी की पत्रकारिता के आरम्भिक प्रशिक्षण का एक हिस्सा माना जा सकता है।
 दक्षिण अफ्रिका में आकर गांधी जी की पत्रकारिता अपने पूरे वर्चस्व के साथ फली-फूली। उन्होंने वहां राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत करने और ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध जनमत निर्माण करने के माध्यम के रूप में पत्रकारिता का इस्तेमाल किया। वे अपने अनुभवों को और दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह के अपने प्रयोगों को अधिक से अधिक लोगों की जानकारी में लाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने "इंडियन ओपीनियन" नामक पत्र का सम्पादन करना आरम्भ किया। 1903 में इंडियन ओपीनियन का पहला ही अंक चार भाषाओं में प्रकाशित हुआ। ये भाषाएँ थीं- हिन्दी, अंग्रेज़ी, गुजराती और तमिल (गांधी जी भारत के संभवत: अकेले ऐसे पत्रकार हुए जिन्होंने चार भाषाओं में पत्रकारिता की)। पहले ही अंक में उन्होंने पत्रकारिता के उद्देश्यों की स्पष्ट व्याख्या करते हुए बताया कि पत्रकारिता का पहला काम जनभावनाओं को समझना और उन्हें अभिव्यक्ति देना है। इतना ही नहीं इसका उद्देश्य वांछित भावनाओं को जाग्रत कर निर्भीकता के साथ समाज में व्याप्त बुराइयों को उजागर करना भी है। अखबार का काम केवल सूचना भर देना नहीं है, बल्कि जन शिक्षण और जनमत निर्माण के लिए भी अखबार ज़रूरी हैं। उन्होंने इंडियन ओपीनियन के माध्यम से दक्षिण अफ्रीका में प्रवासी भारतीयों की समस्याओं को शिद्दत से उठाया, अपने अधिकारों के प्रति सजग किया। स्वतन्त्र जीवन का महत्त्व समझाया तथा उनमें सामाजिक और राजनैतिक चेतना जाग्रत की तथा नस्ल भेद के खिलाफ आवाज़ बुलंद की।
 भारत में आकर गांधी जी ने "नवजीवन" और "यंग इंडिया", दो समाचार-पत्र 1919 में निकाले। इनका प्रकाशन 1932 में गांधी जी की गिरफ्तारी के बाद बंद हो गया। जेल से छूटने के बाद "हरिजन" निकाला जो उनके जीवन-पर्यंत चलता रहा। उन्होंने अहिंसक उपायों से सत्य की विजय के लिए जन प्रशिक्षण हेतु अखबार को एक महत्वपूर्ण और अनिवार्य साधन माना। सत्याग्रह आन्दोलन को धार देने के लिए तथा आत्मबल विकसित करने और नैतिक भावनाओं को अपने व्यवहार में प्राथमिक तौर पर प्रश्रय देने के लिए भी उन्होंने पत्रकारिता को माध्यम बनाया।
गांधी जी ने एक बार राजनीति के सन्दर्भ में जो कहा था, उसका आशय था कि राजनीति जो नैतिक मूल्यों से रहित है एक ऐसा जाल है जिसमें आदमी की आत्मा फंसकर छटपटाने लगती है। यही बात पत्रकारिता के सन्दर्भ में उनका जो मत है उस पर भी बहुत कुछ सही बैठती है। उन्होंने हमेशा पत्रकारिता को एक मिशन की तरह अपनाया और उसे कभी व्यवसाय के रूप में ग्रहण नहीं किया। ज़ाहिर है, पत्रकारिता में उनका मिशन था- नैतिक मूल्यों की स्थापना, सत्य-अहिंसा और सत्याग्रह पर अडिग रहकर साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष करना और इस प्रकार भारत को राजनैतिक स्वतंत्रता के सही मार्ग की ओर अग्रसर करना। गांधी जी के ये दिशा-निर्देश भारत में पत्रकारिता की लिए बिलकुल नए और क्रांतिकारी थे। गांधी जी जब तक जीवित रहे भारत में इस प्रकार की पत्रकारिता की छाप अन्य पत्र-पत्रिकाओं में भी स्पष्ट देखी जा सकती है। उन दिनों भारत की पूरी पत्रकारिता गांधी जी के प्रभाव में आ चुकी थी। यह शायद भारत में पत्रकारिता का स्वर्णिम-युग था।
बेशक, आज की पत्रकारिता इस बात से भली-भाँति अवगत है कि वह अपने आप में एक बड़ा ही प्रभावी माध्यम है और जनमत निर्माण करने में उसका बहुत बड़ा हाथ है। लेकिन आज पत्रकारिता एक मिशन की बजाय व्यवसाय अधिक हो गई है और उसका नैतिक मूल्यों से पूरी तरह से विलगाव हो गया है। इस माध्यम का दुरुपयोग धड़ल्ले से होने लगा है। यह पूरी तरह से विज्ञापनों पर आश्रित हो गई है और बाज़ार के हाथों बिक गई है। आप पैसा देकर जिस तरफ भी चाहें उसे मोड़ा जा सकता है पत्रकारिता आज शायद अपने सबसे खराब वक्त से गुज़र रही है। यह बड़े-बड़े और भ्रष्ट पूंजीपतियों के हाथ का एक खिलौना बनकर रह गई है। जन-जीवन से उसका सम्बन्ध पूर्णत: कट गया है। अत: आज पत्रकारिता के समक्ष सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या पत्रकारिता कभी पुन: नैतिक मूल्यों के हक़ में खड़ी हो सकेगी?

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