ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
चार पुरुषार्थ - आधुनिक नजरिया
CATEGORY : विमर्श 01-Apr-2017 12:16 AM 491
चार पुरुषार्थ - आधुनिक नजरिया

मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ माने गए हैं। ये हैं- धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष। लेकिन इन चारों का उद्देश्य क्या है? धर्म का उद्देश्य मोक्ष है, अर्थ नहीं। धर्म के अनुकूल आचरण करो तो किसके लिए? मोक्ष के लिए। अर्थ से धर्म कमाना है, धर्म से अर्थ नहीं कमाना। धन केवल इच्छाओं की पूर्ति के लिए मत कमाओ।
अच्छे कपड़े हों, महंगे आभूषण हों, दुनिया भर के संसाधन हों, इन सबकी जीवन के लिए जरूरत है, इसमें दो राय नहीं। लेकिन जीवन का लक्ष्य यह नहीं है कि केवल इन्हीं में उलझे रहें।
सिर्फ कामनाओं की पूर्ति के लिए ही अर्थ नहीं कमाना है। हम दान कर सकें, इसलिए भी धन कमाना है। हम परमार्थ में उसको लगा सकें इसलिए भी कमाना है। वर्ना अर्थ, अनर्थ का कारण बनेगा। धन परमार्थ की ओर भी ले जाएगा और इससे अनर्थ भी हो सकता है इसीलिए धर्म का हेतु मोक्ष है, अर्थ नहीं और अर्थ का हेतु धर्म है, काम नहीं। काम का हेतु इस जीवन को चलायमान रखना है। केवल इंद्रियों को तृप्त करना काम का उद्देश्य नहीं है।
काम इसलिए है कि जीवन चलता रहे। मकान, कपड़ा, रोटी ये सब जीवन की आवश्यकताएं हैं और आवश्यकताओं को जुटाने के लिए पैसा कमाना पड़ता है। इसी तरह जीवन की आवश्यकता है काम ताकि जीवन चलता रहे, वंश परम्परा चलती रहे।
लेकिन पश्चिमी समाज इन चारों पुरुषार्थों के प्रति अलग नजरिया रखता है।
धर्म : पश्चिम के लोग धर्म के बारे में क्या जानें? बड़े ही संकुचित तरीके से वे धर्म को समझते हैं। चर्च में रविवार को जाकर प्रार्थना कर ली। यह भी कोई धर्म हुआ? हमें देखो, हम चौबीसों घंटे कीर्तन, भजन पूजा-पाठ में तल्लीन रहते हैं। कोई अच्छी जगह देखी नहीं कि वहाँ मंदिर खड़ा कर देना अपना सौभाग्य समझते हैं। जबकि अमेरिका के "विश्व के आश्चर्य" हों या ऑस्ट्रेलिया के सुनहरे स्थल यहाँ कोई चर्च या धार्मिक स्थल खड़ा कर देने में लोग कंजूसी करते हैं। हमें देखो हम इतने मंदिर और मस्जिद बना बना कर कभी थके नहीं बल्कि अधिक से अधिक बना देने के लिये आपस में झगड़ते रहते हैं। हर जगह पर अपना अधिकार जताने के लिये दंगे करने से भी नहीं चूकते।
यह मत समझना कि हम धर्म का अर्थ गहराई से नहीं जानते। धर्म का अर्थ कर्तव्य होता है। "धार्यते अनेन इति धर्म"। अपने कर्तव्य में हम इतने तल्लीन हो जाते हैं कि रिश्वत, भ्रष्टाचार भी हमारी जीवन-प्रणाली का हिस्सा बन जायें तो उसे सहज स्वाभाविक मानते हैं। जबकि पश्चिम में तो स्वच्छता और ईमानदारी आदि जो कुछ देखी जाती जाती है उसे वे धर्म का हिस्सा तक नहीं बताते। कैसे बतायें? उनमें वह दार्शनिक दृष्टि कहाँ है? दूसरी ओर हम आँखें मूंदकर तीर्थ-स्थलों में घूम आते हैं। आसपास गंदगी हो तो उससे हमें क्या लेना देना। तीर्थ-स्थल में जो पुण्य मिलता है उसके लिये क्या हम थोड़ा बर्दाश्त नहीं कर सकते?
अर्थ : हम धन को लक्ष्मी मानते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि क्या काला और क्या सफेद सभी धन लक्ष्मी की देन है। फिर परहेज कैसा? पर लक्ष्मीदेवी हैं कि पश्चिम पर मेहरबान हुई जा रही हैं। पूजा हम करें और फल पश्चिम के देश ले जाते हैं। अर्थ को धिक्कार करके हम धनवानों में अपराध-बोध भरते हैं ताकि वे धार्मिक कर्म-कांड में कंजूसी न बरतें। साथ ही हम गरीबों को ऐसा ऐसा दर्शन घुट्टी में पिला देते हैं कि वे अपनी गरीबी में खुश रह सके जैसे पिछले जन्मों का फल, किस्मत का लिखा, संसार तो सपना है, आदि आदि।
इधर पश्चिम में अर्थ की कोई देवी तो थी नहीं। बस, भौतिकवाद बढ़ता गया। उसने चर्च तक की ताकत को पछाड़ दिया। चर्च को मजबूर होकर मानव-कल्याण की शरण लेनी पड़ी। "पगान" के विरुद्ध मुहिम छेड़ने और मध्यकालीन युग के अत्याचारों से मुक्त होकर शरणार्थियों की सेवा और मानव सेवा का सहारा लेना पड़ा कि चलो इस बहाने से लोगों को धर्म में प्रवृत्त किया जा सके और कुछ अनुयायी मिल सके। पर यह भी क्या बात हुई कि भौतिकवाद का शैतान ही धर्म के देवदूत पर नियन्त्रण रखे!
पर हमें देखो, हम अर्थ को कोस कर अर्थ को पाना चाहते हैं। इसका एक लाभ यह भी है कि हम पश्चिमी देशों से बड़े और ऊँचे बने रहते हैं। क्योंकि पैसे में क्या रखा है? हमारी संस्कृति को देखो। हम कितने महान हैं! इसके बाद भी अमेरिका, इंगलेंड जहाँ भी मौका मिले तो घुसते चले जाते हैं याने इतने महान होने पर भी तुच्छ देशों में जाकर अपनी संस्कृति का प्रचार करते हैं। वह तो बुरा हो अर्थशास्त्रियों का। क्या गरीबी रेखा और जीडीपी का बखेड़ा खड़ा कर रखा है। हम तो दो निवालों में खुश रहने वालों में से हैं। हमें सोना चांदी रुपये जेवर कुछ भी नहीं चाहिये।
काम : फ्रायड की "सैक्स थ्योरी" ने पश्चिम को पागल बना रखा है और यह पागलपन भारत में भी फैल रहा है। कहा जाता है कि चर्च ने फ्रॉयड को एक शर्त पर क्षमा करना मंजूर किया था कि वह अपने सिद्धान्त में "काम" के बदले "प्रेम" शब्द का प्रयोग करे। पर फ्रॉयड एक ही जिद्दी था कि वह सत्य के साथ कोई समझौता करना चाहता ही नहीं था। वह कहता था कि मेरे लिख देने से सत्य बदलने वाला तो नहीं है।
नतीजा यह है कि पश्चिमी देशों में काम एक मुक्त धारा है जो स्वतन्त्र रूप से बहती है। आशा केवल इतनी रखी जाती है कि एक ही समय में व्यक्ति एक ही पार्टनर रखे। पार्टनर बदलना उसके हक में है। मजे की बात यह है कि तलाक, टूटते घर, सिंगल पेरेन्ट आदि समस्याओं से जूझ कर भी यहाँ हर व्यक्ति स्वयं की इच्छा क्या है यह जान कर फिर उसे पूरा करने में मगन है। बच्चों ने भी टूटते घरों में अपने को कैसे संभलना है यह भली-भाँति सीख लिया है। एलकेके फेक्टर याने "लोग क्या कहेंगे?" इसकी न व्यक्ति को  कुछ चिन्ता है और न ही लोगों को किसी एक व्यक्ति के बारे में परेशान होने की जरूरत दिखाई देती है। यहाँ एक बात बड़ी बोर करने वाली है, राह चलती लड़की को छेड़ने की वारदात देखने को नहीं मिलती(?!!) किन्तु हमने मध्ययुगीन संस्कृति के प्रभाव में काम को दबाने के इतने प्रयास किये हैं। मौका मिलते ही सीटी बजाने और अश्लील हरकत करने से नहीं चूकते। काम पर पहली पुस्तक याने वात्स्यायन का "कामसूत्र" और खजुराहो के मंदिर रखने वाला देश "सैक्स" का दमन कर एक चक्रव्यूह में फँस गया है।
मोक्ष : मोक्ष पूरी तरह से भारतीय अवधारणा है। यहाँ आस्ट्रेलिया, यूरोप, अमेरिका में मोक्ष का भाव लगभग नदारद है। रजनीश ने मोक्ष को किसी तरह अपने आसन पर बिठाने के लिये स्पीन-डॉक्टर की तरह घुमा-फिरा कर इस तरह समझाया है कि जब अर्थ और काम से व्यक्ति भोग करते-करते, इसके सभी स्वादों से ऊब जाय तो सबकुछ छोड़ देने को जी चाहता है और यथार्थ में यही मोक्ष है। धनवान अपनी अपार संपत्ति में व्यर्थता देख कर उसका दान कर दे पर उसे दान जैसा भी न लगे  और कहे कि मिट्टी के ढेले को छोड़ देने में क्या बड़ी बात है तो समझ लो मोक्ष फलीभूत हुआ। फिर तो सच कहा कि असली मोक्ष किसी दिन पृथ्वी पर अवतरित होगा तो किसी पश्चिमी देश में अवतरित होगा।
भारतीय मनीषा ने तीन मूल प्रवृत्तियां गिनाई हैं- पुत्रैषण, वित्तेषण और दारेषण। इसमें से वित्तेषण और दारेषण सीधे तौर पर अर्थ और काम के पर्याय हैं। यदि पुत्र का अर्थ अगली पीढ़ी में समाविष्ट किया जाय तो धर्म सीधे तौर पर पुत्रैषण से कुछ संबन्ध रखता है। किन्तु मोक्ष इसमें कहीं भी समाविष्ट नहीं होता। पता नहीं मोक्ष का ख्याल भारत में कैसे आया? इसके बारे में वही सोच सकता है जो जीवन को झंझट समझता हो। वैदिक काल में जीवन और जीवन-दर्शन बड़ा जीवन्त था। लगता है उपनिषद् काल में ऋषियों ने आनन्द की चरम सीमा को परिभाषित करना चाहा। स्वर्ग के सुख तो भौतिक सुखों की श्रेणी में आते हैं अत: आत्मिक सुख की चरम-सीमा के रूप में मोक्ष की कल्पना की गई। ध्यान से जो मानसिक शांति और आनन्द मिलता है उसकी चरम सीमा को मोक्ष माना जा सकता है।

NEWSFLASH

हिंदी के प्रचार-प्रसार का स्वयंसेवी मिशन। "गर्भनाल" का वितरण निःशुल्क किया जाता है। अनेक मददगारों की तरह आप भी इसे सहयोग करे।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal | Yellow Loop | SysNano Infotech | Structured Data Test ^