ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
निज भाषा-लिपि स्वाधीनता का मूलाधार
01-Sep-2016 12:00 AM 3598     

पराधीनता का चित्त और चेतना से गहरा रिश्ता है। पराधीनता व्यक्ति को जितना पीड़ित और प्रताड़ित करती है। इसके विपरीत, स्वाधीनता उतना ही आह्लादित करती है वह फिर, राजनीतिक हो या व्यक्तिगत। स्वाधीनता वस्तुत: अन्तश्चेतना के आनंद का सृजनात्मक निनाद है।
भारत के अपने स्वाधीनता-संघर्ष के साथ-साथ हिन्दी भाषा अफ्रीका के मुक्ति आंदोलन में भी सहायक हुई। हिन्दुस्तानी हिन्दी भाषियों ने पूर्वी अफ्रीका, फीजी में दासता, वर्णभेद और उपनिवेशवाद के विरुद्ध सिर उठाया। उसके मानस में श्रीरामचरित मानस की पंक्तियों का शंखनाद हो रहा था- पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं। उन्होंने ही अपने-अपने तरीके से अपने-अपने रूप में हिन्दी को विश्व-भाषा बनाया और सत्ता के चरित्र को चुनौती दी। उपनिवेशवाद से मुक्ति और सामान्यजन की प्रतिष्ठा की। उस चेतना की प्रमुख वाहिका हिन्दी भाषा परिवार की बोलियां बनीं। जिन्होंने मशाल होने की मिसाल कायम की। विदेशों में बसे हिन्दी मूल के भारतीयों के मन में भारत की अस्मिता, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, नैतिक स्मृति उन्हें हिन्दी से जोड़ती है, जो रह-रहकर जताती रहती है- पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं। फिर वह पराधीनता चाहें भाषा की हो या संस्कृति की।
वर्तमान सदी की शुरुआत मेरे जीवनकाल में लातिन अमेरिका देश के उत्तरी शीर्ष पर स्थित सूरीनाम देश से हुई। समय में भारतीय संस्कृति और हिन्दी भाषा के बीजों को मैंने वहीं के हिन्दुस्तानी समाज के मन-मानस में बोए। तब से, लगातार हिन्दी-भाषा-साहित्य की सांस्कृतिक खेती में संलग्न हूं। विश्व के भारतवंशी बहुल देशों के साथ-साथ यूरोप तथा कैरीबियाई देशों में हिन्दुस्तानी बनाम हिन्दी भाषा और भारतीय संस्कृति की फसल खड़ी की है। जिसका उन देशों के हिन्दुस्तानी समाज से गहरा रिश्ता है।
भाषा ही संस्कृति की संवाहिका है। वह अपने समय और समाज की सम्पूर्ण संस्कृति लेकर चलती है। संस्कृत के माध्यम से भारतीय दर्शन और संस्कृति का सूर्य यूरोप में प्रकाशित हुआ। किन्तु, भारतवंशी बहुल देशों में यदि विश्व के पश्चिमी गोलाद्र्ध से अवलोकन प्रारंभ करें तो सूरीनाम, ट्रिनीडाड, गयाना, कुरुसावा, सेन्ट लूशिया, इंग्लैंड, नीदरलैंड, दक्षिण अफ्रीका, मारीशॅस, युगांडा, केनिया, फीजी आदि देशों के हिन्दुस्तानियों में खान-पान, रहन-सहन और भाषा-संस्कृति में हिन्दुस्तानियत की अपनी पहचान के कारण दिनों-दिन हिन्दी-संस्कृति का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है। क्योंकि वे जानते हैं कि विदेशों में स्वदेश और स्व की भाषा-संस्कृति को धारण करके ही परदेश और संस्कृति के पराधीनता के दु:ख पर विजय हासिल की जा सकती है। इस समय, इन देशों में हिन्दी-संस्कृति के मार्फत ही विश्व में भारतीय संस्कृति की लुभावनी और मोहिनी छवि उभर रही है। हिन्दी को "इन्डी" और "इंडिया" से भी सम्बद्ध करके प्रचारित करना चाहिए। "इंडिया" नामधारी भारत ही है। विदेशियों द्वारा "इंदिया" ही संबोधित किया जाता है। इस तरह से हिन्दी का "इंडिया" से एक भाषायी और सांस्कृतिक रिश्ता उभरकर आता है।
सूरीनाम सहित भारतवंशी बहुल अन्य देशों की आबादी में हिन्दुस्तानी समाज की बहुलता है। वे मिलने पर आपस में हिन्दुस्तानी बोली में ही नि:संकोच संवाद करते हैं उन्हें इस बात की कतई परवाह नहीं रहती है। इनके आसपास या अगल-बगल में किस भाषा और देश का व्यक्ति खड़ा है। इस तरह से हिन्दुस्तानी समाज विदेश में भी भाषा और संस्कृति के स्तर पर पूर्णत: स्वाधीन है जबकि भारत देश के मध्य वर्ग परिवारों के बच्चे तक हिन्दी नहीं बोलते हैं कि कहीं उन्हें पिछड़ा हुआ या गंवारू न समझा जाये। जबकि विदेशों में पीढ़ियों से रह रहा भारतवंशी यह बखूबी जानता है कि भाषा और संस्कृति की पराधीनता से अधिक पीड़ादायी जीवन में और कुछ नहीं है क्योंकि इसमें व्यक्ति के मन-मानस की पराधीनता सन्निहित रहती है। जिसे सिर्फ संवेदनशील होकर महसूस करने की आवश्यकता है।
सूरीनाम की संस्कृति में अनेक देशों की संस्कृतियों का सम्मिश्रण है। वहां के हिन्दुस्तानियों की अपनी बोली सरनामी भाषा है। भोजपुरी, अवधी, मैथिली और वहां पर पचासों वर्षों से उनके साथ रह रहे नीग्रो, चायनीज, जावानीज और डच भाषा के नागरिकों के शब्द जो सरनामी जीवन संस्कृति की धड़कन बन चुके हैं- हिन्दुस्तानियों की सरनामी भाषा का हिस्सा हो चुके हैं। कुछ वैसे ही जैसे प्रेमचंद के समय में उर्दू मिश्रित हिन्दी जबान हिन्दुस्तानी, पूरे देश भर में प्रचलित भाषा थी और जिसे गांधीजी ने पूरे देश की पहचानी जबान और भाषा माना।
डच कोलोनाइजरों द्वारा सूरीनाम में अपने जीवन को धान के बीजण के साथ रोपित किये जाने के बाद हिन्दुस्तानी समाज ने अपने खेतिहर जीवन-शैली के भीतर से बगैर माथे पर बल दिये हुए ही यह भाँप लिया था कि पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं। उनकी आत्मा की अनश्चेतना ने उनके चित्त और चेतना को मातृभूमि हिन्दुस्तान छोड़ने के साथ ही सजग और सतर्क कर दिया था। इस तरह मजदूरी और जीवन-यापन तो उनकी धरती पर करते थे लेकिन फल, फसल, भाषा और धर्म-संस्कृति की उपासना में वे अपनी मातृभूमि को शामिल रखते थे, जिससे उनका खानपान, रहन-सहन, लोक-जीवन, भाषा और लोकसंस्कृति प्रदूषित और संक्रमित होने से बच सके। अपनी हिन्दुस्तानी (कुलीकॉलोनी) कॉलोनियों की झोपड़ियों के भीतर किसी विदेशी संस्कृति को नहीं घुसने दिया। जिससे उनके तन-मन और धन के भीतर उनकी अपनी हिन्दुस्तानी भाषा और संस्कृति बनी रह सकी। जिस कारण यह अपनी रातों में नींद, चैन और स्वाधीन निजता के सपने को संरक्षित कर सके जो आज भी इनके जीवन में सुरक्षित है।
भारतवंशी किसानों की मजदूरी में खटती पिसती हिन्दुस्तानी जनता यह बखूबी समझ चुकी थी कि विदेश में जीने की विवशता की पराधीनता के बावजूद अपनी अन्तश्चेतना में निज भाषा-संस्कृति की लौ जलाये रखेंगे तो स्वाधीनता का प्रकाश सहज ही अनुभव होता रहेगा। इसी एक भाव-बोध के साथ इन्होंने अपने जीवन में अपनी मातृभाषा, राष्ट्रभाषा, लोकभाषा, लोकचाल, लोकगीत लोक कला, लोक परम्पराओं के साथ अपनी धर्म-संस्कृति को साधा और उसी में अपनी जीवन की साधना की। देह, उनकी भले ही मजदूरी के मूल्यों पर पराधीन रही पर अपनी आत्मा, चित्त और चेतना की ताकत को पराधीन नहीं होने दिया। इस तरह अपनी सचेत संकल्प शक्ति के बल पर अपनी हिन्दुस्तानी बनाम भारतीय संस्कृति की दुर्लभ पहचान बना सके हैं। जिसके अस्तित्व और अस्मिता का संकट भारत देश तक में गहराया हुआ है।
भारतवंशियों के पुरखों की दृढ़ संक्लपशक्ति और दृढ़धर्मिता का ही परिणाम था कि उन्हें उनकी अलग से कॉलोनियां बनानी पड़ी थी। जहां कुली स्कूल खोलने पड़े थे। धर्म, संस्कृति और भाषा की पढ़ाई के लिये अध्यापक और पंडित रखने पड़े थे। इसके बाद से लेकर अब तक भारतीय संस्कृति के लिये चार-पांच पीढ़ियों से स्वैच्छिक संस्थाओं और भाषा, कला, संगीत नृत्य के उपासक कार्यकर्ताओं के द्वारा स्वैच्छिक रूप से साप्ताहिक स्कूल चल रहे हैं जिसकी कक्षाएं वहां के डेढ़ सौ से अधिक सनातनी और आर्य समाजी मंदिरों और पैंतीस से अधिक मस्जिदों में पूरे उत्सव समारोह के साथ आज भी चल रहे हैं।
सूरीनाम और नीदरलैंड देश के भारतवंशियों द्वारा अपने पुरखों द्वारा अर्जित हिन्दुस्तानी बोली बनाम सरनामी भाषा इस समय सभी अवसरों पर सक्रिय है। यह इन देशों के जन-जीवन की गतिशील संजीवनी भाषा है। सूरीनाम देश उनकी मातृभूमि है जिसे वे सरनाम देश पुकारते हैं और सरनामी भाषा उनके अपने मन के स्वदेश की प्राणदायी भाषा है। सरनामी बनाम हिन्दुस्तानी उनके मातृहृदय की मातृभाषा है, जिसमें उन्हें अपने चित्त के पराधीन होने की अनुभूमति नहीं होती है।
संचार माध्यमों के समय में कम्प्यूटर नेट वर्किंग के प्रकोपकाल में यूं तो हिन्दी वर्तनी भी रोमनी लिपि की काया में ढल रही है लेकिन हिन्दी साहित्य की सभी विधाएं अपना मौलिक विकास देवनागरी लिपि में कर रही है। देवनागरी, लिपि में हिन्दी साहित्य के लाखों प्रकाशक हैं। डिजीटल दुनिया में हिन्दी लिपि के साहित्य का प्रभुत्व और वर्चस्व बढ़ता जा रहा है। उच्चारण किसी भी भाषा और संस्कृति की वाणी का प्राणतत्व है तो लिपि की अपनी निजता है जो किसी भी भाषा की देह है। देह बिनु होई न प्रीत। देह के अस्तित्व के बिना किसी भी भाषा की संस्कृति से प्रीत असंभव है। बिना दैहिक वजूद के भाषा की स्थायी पहचान और भविष्य संभव नहीं है। बिना अस्तित्व के अस्मिता कैसे अपना आकार ले सकती है? ब्रिटिश सहित यूरोप के अन्य देशों की भाषाओं की निजी लिपि रोमन है। उन्हें हिन्दी या चायनीज लिपि में वैसे ही नहीं प्रकट किया जा सकता है जिस तरह से उनका अपना वजूद उनकी अपनी भाषा में सांस लेकर धड़क रहा है। वैसे ही हिन्दी भाषा को रोमन-लिपि में पूर्णत: और शुद्धत: वैसे ही नहीं लिखा जा सकता है। वस्तुत: भाषा की स्वाधीनता उसकी अपनी लिपि में ही संभव है। किसी भी देश, जाति, धर्म या समुदाय की भाषा है तो वस्तुत: वह उस भाषा की पराधीनता की ही द्योतक है और इससे यह स्पष्ट होता है कि उस समुदाय की वह भाषा किसी-न-किसी रूप में उस भाषा पर निर्भर है। यह निर्भर करना ही अपनी भाषा को गिरवी रखना है और स्वयं को अस्तित्वहीन बनाना है और अस्तित्वहीन भाषाओं पर हमेशा अस्मिता का संकट मंडराता रहता है। इसके साथ ही वह समुदाय भी सांस्कृतिक स्तर पर आत्मनिर्भर और स्वाधीन नहीं हो पाता है।
भाषाएं ही संस्कृति की जननी और धारिका है। वे ही संस्कृति का पोषण कर सकती है और सभ्यताओं का श्रृंगार करती है। परनिर्भर-लिपि की स्थिति में भाषा का अस्तित्व और अस्मिता हमेशा संकट में रहेगी। किसी भी भाषा का लिपि के स्तर पर दूसरी भाषा पर निर्भर करना उस भाषा की पराधीनता और दासता का द्योतक है इसलिए विश्व के भारतवंशी बहुल देशों की हिन्दी भाषा परिवार की बोलियों और भाषा को बचाना अनिवार्य है। क्योंकि लिपि विहीन भाषा की पहचान हमेशा संकट में रहेगी।
लिपि के स्तर पर निर्भर भाषाओं के अस्तित्व को देखकर ऐसा लगता है जैसे वे व्याकुल होकर गुहार लगा रही हो। रह-रहकर निवेदन कर रही हों- मेरी भाषा की देह की रक्षा करो यदि उसको दूसरी भाषा की लिपि प्रदान की जायेगी तो कुछ समय बाद वह खुद ही वजूदहीन होकर मिट जायेगी। भाषाएं जैसे कैसे कह रही हों यदि तुम्हारी वाणी सोंधी भारतीयता की हो और तुम्हारी देह यूरोपीय साँचे में ढाल दी जाये तो तुम्हें कैसा लगेगा? वैसी ही दारुण दुर्दशा की अनुभूति हमें होती हैं।
एक नीग्रो व्यक्ति द्वारा हिन्दुस्तानी बोली-बानी सुनते हुये जैसे अटपटा लगता है, वैसे ही हिन्दी भाषा की रोमन देह में ढले हुए देखकर आँखों की आत्मा को विचित्र और असह्य लगता है। इसके साथ ही देवनागरी लिपि के ज्ञान के अभाव में वे समकालीन हिन्दी भाषा और साहित्य के चाल-चलन से अपरिचित रह जाते हैं। लिपि ज्ञान के अभाव और अपहचान के कारण वे हिन्दी भाषा परिवार के सदस्य होकर भी हिन्दी भाषा साहित्य परिवार से अनचाहे ही अलग-थलग हो जाते हैं और वह हिन्दी भाषा दूसरे देश की, द्वीप की भाषा बनकर रह जाती है। भारत देश की हिन्दुस्तानी, परिवार की सदस्य बनने से रह जाती है और इस तरह अकेली होती जाती है। इस तरह वह अपने समय के समकालीन साहित्यकारों के लेखन से मित्रता गाँठने में असफल हो जाती है।

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