btn_subscribeCC_LG.gif
अरण्यगान
01-Nov-2017 04:33 PM 1406     

तुम गाओ, मैं मुरली बजाऊँ
तुम्हारा गीत है सदाबहार
कल जब हम रहें न रहें
मेरी मुरली पर बजेगा तेरा ही गीत

क्या तुम रह पाओगे इस अरण्य में
मेरी तरह संसार के कोलाहल से दूर
पहाड़ी नदी का पीछा करते-करते
खड़े चट्टानों पर चढ़ते-उतरते हुए

क्या तुम नहाओगे बासंती इत्र में
और सुखाओगे तन आश्विन की धूप में
उषा के अरुणिम-रस का पान करते-करते
ओस में भींगे अँधेरे की वस्त्र को बदलते हुए

तुम गाओ, मैं मुरली बजाऊँ
तुम्हारा गीत है गायत्री छंद की तरह व्याप्त
कल जब हम रहें न रहें
मेरी मुरली पर बजेगा तेरा ही गीत

क्या तुमने देखी है साँझ मेरी तरह
लताओं में, कुंजों में, पेड़ों पर, पहाड़ पर
जब प्रतीची पर आरती होती स्वर्ण-थाल में
और पाखी दिखते मंदिर से लौटते हुए

क्या तूने बिताई है रात मुलायम घास की चादर पर
आकाश के झिलमिल कंबल को ओढ़ते करवट बदलते
भविष्य के सभी आगन्तुकों से बेफिक्र होते
अतीत के गुज़रे यात्रियों को भूलते हुए

तुम गाओ, मैं मुरली बजाऊँ
तुम्हारा गीत है हृदय की संवेदना की तरह
कल जब संवेदना रहे न रहे
मेरी मुरली पर बजेगा तेरा ही गीत

भूल जाओ सभी वेदनाएँ और उपचार
लोग तो बस तीर्थयात्री की तरह होते
अपनी-अपनी नैवेद्य की टोकरी पकड़े
अपने-अपने भजन को गाते हुए

जीवन कुछ नहीं बस मकड़ा सा
स्वयं अपना जंजाल बुनो
स्वयं अपनी राह चुनो
फिर दिखो सब लौटते हुए

तुम गाओ, मैं मुरली बजाऊँ
तुम्हारा गीत है सदाबहार
कल जब हम रहें न रहें
मेरी मुरली पर बजेगा तेरा ही गीत।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^