ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिंदी की नामी पत्रिकाएँ
CATEGORY : आवरण 01-Apr-2017 12:02 AM 1325
हिंदी की नामी पत्रिकाएँ

जब मैंने सुचित्रा-माधुरी का समारंभ किया तो मेरे सामने एक स्पष्ट नज़रिया था। मैं एक ऐसे संस्थान के लिए पत्रिका का आरंभ करने वाला था, जो पहले से ही अंगरेजी की लोकप्रिय पत्रिका फ़िल्मफ़ेअर का प्रकाशन कर रही थी। आरंभ में वहाँ का मैनेजमैंट फ़िल्मफ़ेअर का हिंदी अनुवाद ही प्रकाशित करना चाहता था। इसके लिए मैं तैयार नहीं था। मेरा कहना था, अनुवाद प्रकाशित करना हो तो आप को संपादक की तलाश नहीं करनी चाहिए, बल्कि किसी ट्रांसलेशन ब्यूरो के पास जाना चाहिए या अपना ही एक ऐसा ब्यूरो खोल लेना चाहिए। फिर तो आप फ़िल्मफ़ेअर क्या, इलस्ट्रेटिड वीकली, फ़ेमिना, टाइम्स आफ़ इंडिया - सभी के हिंदी संस्करण निकाल सकते हैं! और मैं ऐसे किसी ब्यूरो का अध्यक्ष बनने को तैयार नहीं था। अनुवाद वाली योजना मैनेजमैंट की थी, रमा जी को स्वयं क़तई पसंद नहीं थी.
जब उन लोगों ने मेरी बात स्वीकार कर ली, तो वेतन आदि पर किसी तरह की सौदेबाज़ी किए बिना, यहाँ तक कि वेतन तय किए बिना ही, मैं मुंबई पहुँच गया। मेरे सामने कई चुनौतियाँ थीं। मैनेजमैंट हमें फ़िल्मफ़ेअर की कसौटी पर कसेगा। हिंदी पाठक की माँगें कुछ और हैं। उन दिनों हिंदी में बहुत सारी फ़िल्मी पत्रिकाएँ निकलती थीं। अधिकांश में बड़े घटिया ढंग से लिखी फ़िल्म कहानियाँ प्रकाशित होती थीं। माहौल यह था कि फ़िल्म पत्रिकाओं का घरों में प्रवेश बुरा समझा जाता था। फ़िल्म पत्रिका तो दूर, फ़िल्म देखना भी चारित्रिक पतन का लक्षण माना जाता था। और ऐसे में मैं अपनी पत्रिका को घर-घर जाने वाली फ़िल्म पत्रिका बनाना चाहता था, जिसे बाप-बेटी और माँ-बेटा निस्संकोच साथ साथ पढ़ सकें। इसके साथ-साथ मेरी अपनी सीमाएँ भी थीं। मैं सरिता, कैरेवान, मुक्ता, उर्दू सरिता जैसी पत्रिकाओं में काम कर चुका था। अपने को कुछ-कुछ कवि भी समझता था। कलाचित्रों और मूर्तियों की, नाटकों की समीक्षाएँ किया करता था, फ़िल्मों की भी। लेकिन न फ़िल्मी कलाकारों के बारे में बहुत जानता था, न तकनीक के बारे में, न कला के। मुझे पत्रिका निकालते निकालते सब कुछ जानना और सीखना था.
सबसे पहले मैंने फ़िल्मफ़ेअर के फ़ारमैट को अपना आधार बनाया, क्योंकि हमारी हिंदी पत्रिका का साइज़ भी वही था। फ़िल्मफ़ेअर जैसे ही कुछ स्थायी स्तंभ। यहाँ तक मैनेजमैंट को ख़ुश करने के लिए था। साजसज्जा के लिए मैंने कला विभाग से कहा कि उस से मिलती-जुलती न हो कर कुछ अलग हो। हमें अपनी एक अलग छवि बनानी थी, पुरानी हिंदी फ़िल्म पत्रिकाओं से और फ़िल्मफ़ेअर से। फ़िल्मों के बारे मे जो मैं जानना चाहता था, वह जानने में पाठकों की रुचि भी होगी, यह सोच कर मैंने काफ़ी सामग्री वैसी ही बनवाने की कोशिश की, जैसे एक सचित्र फ़ीचर, फिल्में कैसे बनती हैं। फ़िल्मफ़ेअर में संगीत पर विशेष खंड नहीं था। मैंने सोचा कि हमारी फ़िल्मों में सबसे लोकप्रिय तत्त्व है संगीत। तो उस के बारे में पर्याप्त सामग्री होनी चाहिए। फ़िल्में बनाने में अकेले अभिनेता और निर्देशक और निर्माता ही नहीं होते, अनेक प्रकार के सहयोगी होते हैं, नृत्य निर्देशक, सैट बनाने वाले, कैमरा चलाने वालेे उन सबके बारे में भी पाठकों को बताया जाए।
और इससे भी महत्वपूर्ण यह बात कि उन दिनों जो हिंदी फ़िल्मों का पेड़ों के गिर्द नाचने वाला बचकाने से रोमांस का फ़ार्मूला था, उससे दर्शक ऊब चुके थे। मैं ने सोचा कि ऐसी फ़िल्मों की तीखी आलोचना की जाए और जो भी अच्छी फ़िल्में निर्माणाधीन हों, जिन में कुछ साहित्यिकता होने की संभावना हो, कुछ ऐसा हो जो लोकप्रिय भी हो सके और जिस का स्तर ऊँचा और सुरुचिपूर्ण हो, उसे प्रोत्साहन दिया जाए। साहित्यकारों को फ़िल्मों के बारे में गंभीरता से सोचने का अवसर देने के लिए उन से लिखवाया जाए, निर्माता-निर्देशकों से साहित्य की, साहित्यकारों की चर्चा की जाए। और विश्व में जो श्रेष्ठ सिनेमा बन रहा है, उस के बारे में हिंदी वालों को बताया जाए। सब कुछ एक ऐसी शैली औऱ भाषा में जो पाठकों की समझ में आ जाए। मेरे लिए यह इसलिए भी सहज था कि मैं स्वयं अज्ञानी था। जो बात मेरी समझ में नहीं आती थी, मैं मान लेता था कि पाठकों की समझ में भी नहीं आएगी।
इस प्रकार शुरू हुआ सुचित्रा-माधुरी का सफ़र। पहले अंक की प्रतियाँ ले कर हमारे रिपोर्टर जाने माने फ़िल्म वालों से मिले। सब ने प्रशंसा की। सब से अच्छी टिप्पणी शांताराम जी ने की थी। वह मुझे अब तक याद है। उन्होंने कहा, इसमें फ़िल्मफ़ेअर की झलक है, यह अच्छा नहीं है। मैंने उन से तत्काल प्रार्थना की कि भविष्य में भी हम पर नज़र रखें और मार्गदर्शन करते रहें। और उनसे हमें हमेशा प्रोत्साहन मिलता भी रहा।
माधुरी सफल हिंदी पत्रिकाओं में गिनी जाती, लेकिन जो बात मुझे माधुरी में रहते समझ में नहीं आई और अब तक नहीं समझ पाया हूँ, वह यह कि पाठक फ़िल्मी गौसिप क्यों पढ़ना चाहते हैं। मैं कभी गौसिप नहीं छाप पाया। यही नहीं, मुझे नहीं लगता कि हिंदी में कोई भी वैसी गौसिप लिख और छाप पाता है जैसी अँगरेजी फ़िल्म पत्रिका "स्टारडस्ट" ने शुरू की। हिंदी तो क्या, अँगरेजी की फ़िल्मफ़ेअर जैसी पत्रिकाएँ भी इस मामले में पिछड़ रही थीं। जिस तरह फ़िल्मफ़ेअर ने अपनी साजसज्जा से फ़िल्म इंडिया (बाद में मदर इंडिया) को पछाड़ दिया था, उसी तरह स्टारडस्ट ने अपनी चाशनीदार हिंदी-मिश्रित अँगरेजी से और एक अजीब से ईर्षा-मंडित कैटी (बिल्लीनुमा, उस के गौसिप वाले पन्नों में एक बिल्ली बनी होती थी) रवैये से फ़िल्मफ़ेअर को पछाड़ दिया। उस में फ़िल्म समीक्षा तक नहीं होती थी। गौसिप वाले फ़ीचरों के अतिरिक्त जो भी सामग्री होती थी, वह सिर्फ़ स्टार मैटीरियल होती थी। उस में भी बस गौसिप और गौसिप। मेरी नज़र में यह अच्छा हो या बुरा, लेकिन सच यह है कि यही उस की दिनोदिन बढ़ती बिक्री का आधार बना। इस संदर्भ में एक फ़ालतू सा सवाल है कि हमें पैसा कमाने के लिए किस हद तक जाना या नहीं जाना चाहिए? आज तो हर हिंदी अँगरेजी दैनिक समाचार पत्र और सभी टीवी न्यूज़ चैनल पर फ़िल्मों और फ़िल्मी गौसिप छाई रहती है।
धर्मयुग को एक समय हिंदी की पताका कहा जा सकता था। उसे यह पद दिलाने का काम किया था डाक्टर धर्मवीर भारती ने। मुंबई जाने से पहले मैं उन्हें कालजयी नाटक अंधा युग के लेखक के तौर पर जानता था। उन से सारे हिंदी जगत को ईष्र्या है, यह भी मैं जानता था। इस ईष्र्या का कारण मैं न तब समझा, न अब तक समझ पाया हूँ। जहाँ तक पाठक-दर्शक वर्ग का संबंध है, या किसी के कृतित्व के आकलन का प्रश्न है, ये सारी बातें संदर्भातीत हो जाती हैं। पाठक को इस से कोई मतलब नहीं है कि कौन कैसा है। उस ने क्या लिखा है, उस में कितनी गहराई है, मार्मिकता है, यही पाठक के काम की बात होती है। अगर भारती धर्मयुग में नहीं आते, तो उन्होंने अंधा युग से भी महान कोई अन्य रचना रची होती या नहीं, यह प्रश्न अनुत्तरित ही रहेगा। मुझे लगता रहा है कि धर्मयुग का वरण कर के उन्होंने अपने को होम दिया। धर्मयुग उन के लिए पत्नी, प्रेमिका, बच्चे, परिवार सब कुछ था। वही उन का ओढ़ना था, वही बिछौना। पुष्पा जी को धर्मयुग अपनी सौत लगता था। भारती जी का अपना साहित्यिक मत जो भी रहा हो, उन्हों ने साहित्य के विवादों को धर्मयुग में सर्वोच्च स्थान कभी नहीं लेने दिया। एक-एक पन्ने को उपयोगी सामग्री से ढूँसना उन्हीं का काम था। अपने आप को आधुनिक मानने वाले पत्रकार सजावट के पीछे अपने कम पन्नों का क़ीमती स्थान बरबाद कर देते हैं। भारती जी तो बहुत सारे फ़ोटो भी डाकटिकट जितने आकार के छापते थे, ताकि पाठक को पढ़ने की सामग्री पूरी मिले। उन्हों ने हिंदी के पाठक की ज्ञान की पिपासा को पूरी तरह समझ लिया था। वह पाठक को छका कर ज्ञानरस पिलाना चाहते थे। धर्मयुग की बिक्री से सब से तेज़ी से बढ़त तब हुई जब अमरीका चाँद पर आदमी उतारने वाला था और धर्मयुग ने अपने पन्नों पर उस की हर तरह की जानकारी बिखरा दी। यह एक मोटा सा उदाहरण है। सौर ऊर्जा हो, तो भी धर्मयुग के पन्नों पर उस के लिए जगह थी। रसोई के काम की नई चीज़ हो तो भी और पाकिस्तान में जीए सिंध आंदोलन हो तो उस के बारे में भी। बांग्ला देश के युद्ध में तो भारती जी ने स्वयं जा कर रिपोर्टिंग की और पाठकों को अपनी लेखनी से सराबोर कर दिया। बकिरी बढ़ी यह उस का परिणाम था, उद्देश्य नहीं।
भारती जी के बाद तो धर्मयुग गिरता ही चला गया। मैं यही कहूँगा कि मैनेजमैंट की ज़िम्मेदारी तो है ही, उन लोगों की भी है, जो उस के संपादकीय कर्ताधर्ता बने। उन्हों ने पाठक को समझने की कोशिश कम की और अपनी निजी पसंद या नापसंद को, मैं तो कहूँगा अपने नासमझ को, अधिक प्रश्रय दिया।
मैनेजमैंट किस प्रकार किसी पत्रिका का भला चाहते हुए भी समाप्त कर सकता है, इस का सर्वोत्तम उदाहरण है पराग। उस के संपादक थे सरिता के दिनों से ही मेरे मित्र और सिद्धहस्त कथाकार और कल्पनाशील आनंद प्रकाश जैन। तमाम उन बंधनों और सीमाओं के जो कि प्रकाशकों ने पराग पर लगा रखी थीं, पराग अच्छा ख़ासा चल रहा था। एक बंधन और सीमा यह थी कि उस में परियों की कहानियाँ नहीं छापी जाएँगी। प्रकाशकों का विचार था कि बच्चों के लिए यह कोई अच्छी चीज़ नहीं होती। मैं समझता हूँ कि परीकथाएँ बच्चों की कल्पनाशीलता और स्वप्नशीलता को प्रोत्साहित करने का उत्तम साधन होती हैं। देवी-देवताओं की कहानियाँ भी इसी लिए बंद थीं। इस का भरपूर लाभ मिल रहा था हिंदुस्तान टाइम्स के नंदन को, और दक्षिण से प्रकाशित होने वाले चंदा मामा को। फिर भी, पराग अच्छा ख़ासा चल रहा था।
उन दिनों अँगरेजी में स्टेट्समैन वाले कलकत्ता से जूनियर स्टेट्समैन निकालने लगे थे। अँगरेजी पढ़े लिखे शहरी तबक़ों में उस का काफ़ी रुआब बन गया था। मैनेजमैंट ने कहा कि पराग को किशोरों की पत्रिका बना दिया जाए और जूनियर स्टेट्समैन से प्रेरणा ली जाए। यह तथ्य नज़रअंदाज कर दिया गया कि चंद बड़े शहरों के बाहर जूनियर स्टेट्समैन का अस्तित्व ही नहीं था। सवाल यह था और अब भी है कि हिंदी का जो पाठक बड़े शहरों में रहता था वह भी उस कृत्रिम और नक़लची संस्कृति को नहीं जानता समझता था जो बचपन से ही अँगरेजी वातावरण में पनपने वाले वर्ग को मिलती है। बड़े शहरों से निकलते ही, वह संस्कृति विलीन हो जाती है। हिंदी बाल पत्रिका वहीं बेची जाने वाली है। इस के साथ ही साथ यह समस्या भी है कि जब पत्रकार उस संस्कृति को जानते ही नहीं, तो उस में पले बढ़े पाठक के लिए वे काम की सामग्री कैसे दे सकते हैं? देंगे तो पाठक कहाँ से आएँगे? दिक़्क़त यह थी कि धनी प्रकाशकों के अपने बच्चे उसी संस्कृति में पले बढ़े थे, और वे अपने संपादक से वही चाहते थे। वह नहीं दे पाता था तो उसे मूर्ख, अज्ञानी और अयोग्य समझते थे। सत्तर आदि दशक में मूर्ख, अज्ञानी और अयोग्य कौन था। यह कहना कठिन है।
नया रूप नहीं चला तो पराग को एक बार फिर बच्चों की पत्रिका बनाने के आदेश दिए गए। लेकिन न आनंद प्रकाश जी, न उन के बाद कोई और संपादक पराग को पहले जैसा वैभव दे पाया। एक बार वह पाठक के मन से उतरा तो उतरा ही रहा। न ख़ुदा ही मिला न विसाले सनम! हाँ, बाद में हरिकृष्ण देवसरे कुछ जान पराग में डाल पाए। बहुत दिन वह भी पराग को जीवित नहीं रख सके।
मोहन राकेश के बाद "सारिका" पर आनंद प्रकाश जैन और चंद्रगुप्त विद्यालंकार हाथ आज़मा चुके थे। कहानियों में जो विविधता चाहिए, उस की ओर इन दोनों ने ध्यान नहीं दिया। तब कमलेश्वर आए। वह उसे कहानी की बहुचर्चित पत्रिका बना पाए। उस का कारण विविधता नहीं थी। कमलेश्वर का अपना सजीव चेतन व्यक्तित्व था। सभी साहित्यकारों के लिए सारिका लेना एक तरह से आवश्यक बन गया। साहित्यकार भी संख्या में कम नहीं हैं। अतः पत्रिका एक बार फिर विकासोन्मुख हुई। कमलेश्वर ने यह भी ध्यान रखा कि कहानियाँ रोचक हों। फिर उन्हों ने समांतर कहानी आंदोलन छेड़ दिया। पहले आनंद प्रकाश जैन सचेतन कहानी आंदोलन छेड़ चुके थे। पत्रिका में प्रकाशित होने वाले लेखकों की संख्या आंदोलन से जुड़े लोगों तक रह गई। फिर भी पत्रिका चलती रह सकती थी, क्योंकि उस आंदोलन के लेखकों की रचनाओं में पठनीयता थी, और जब तक सामग्री पठनीय है, पाठक को इस से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि लेखक यह है या वह। लेकिन तभी कुछ व्यक्तिगत कारणों से संचालक परिवार के दो एक सदस्यों को कमलेश्वर अप्रिय हो गए। सन 77-78 के कुछ राजनीतिक कारण भी रहे कहे जाते रहे हैं। मेरी राय में कमलेश्वर के जाने में राजनीति नहीं ही थी। जो भी हो, कमलेश्वर ने सारिका छोड़ दी। बाद में वह पनप नहीं पाई। किसी को भी समझ में नहीं आया कि जो कमलेश्वर का अपना पाठक वर्ग था, उस के रूठ जाने के बाद सामान्य पाठक को कैसे आकर्षित किया जाए।
बात कहानी की चल रही है। मैं स्वयं कहानीकार नहीं कहानी पाठक हूँ। तो मैं यह भी कहना चाहूँगा कि हिंदी कहानी अपने को पाठक से काटने पर तुली है। कहानीकार अपने को प्रथम श्रेणी का साहित्यकार मानते हैं और वे लोग पाठक के लिए नहीं, समालोचकों को प्रसन्न करने के लिए लिख रहे हैं। उन की रचनाएँ पत्रकारिता के नहीं, साहित्यकारिता के दायरे में आती हैं। हिंदी में साहित्यकारिता में सफलतम रहे राजेंद्र यादव और उन का मासिक हंस। वे हंस में कहानियाँ प्रकाशित करने के साथ समाज पर भी महत्वपूर्ण सामग्री प्रकाशित करते और अपने लिए अच्छा ख़ासा सामान्य पाठक वर्ग तैयार कर पाए। उन्हों ने विश्वनाथ के सुधारवादी आंदोलन पर दलित और नारी विमर्श का मुलम्मा भर चढ़ाया। हंस में लेख सरिता जैसे सामाजिक और पारिवारिक विषयों पर नहीं होते। उन्हें सैद्धांतिकता से मँढा जाता है। पर अंततोगत्वा वे हिंदू धर्म और समाज में परिवर्तन का अलख तो जगाते ही हैं। विश्वनाथ जी की जब अपनी ऊर्जा चुक सी गई और संपादकीय बाग़डोर उन के पुत्र परेशनाथ के हाथों आई तो नए युग के लिए नई पहचान वाली जो इंग्लिश पत्रिका ज़्दृथ्र्ठ्ठदद्म कद्धठ्ठ शुरू की थी, और विश्वनाथ जी की ही देखरेख में जिस का हिंदी संस्करण गृहशोभा निकाला गया था, उसे परेशनाथ लगातार परिवर्तनशील सामयिक रूप देते रहे हैं। यहाँ तक कि किसी भी अन्य महिला पत्रिका का इन के मुक़ाबले टिक पाना असंभव हो गया है।
अस्सी आदि दशक के आरंभ में टेलिविज़न के विस्फोट ने हिंदी पत्रों से सामान्य पाठक को और भी दूर कर दिया था। एक तो पहले ही हिंदी पाठक अपनी अकर्मण्यता और रुचिहीनता के लिए सुविख्यात या कुख्यात है, वह कम से कम पढ़ना चाहता है, ख़रीद कर तो और भी कम पढ़ना चाहता है, ऊपर से उस के जीवन में जो थोड़ा बहुत ख़ाली समय था, उसे टीवी ने भर दिया। वहाँ उसे काव्य, गीत, संगीत, कहानी, हास्य य सब मिलता था, सहज पाच्य शैली में। टीवी ने विज्ञापकों ने भी उसे अपनी ओर खींचा। उन के बजट का बड़ा हिस्सा टीवी पर चला गया। पिं्रट मीडिया में केवल कुछ बड़े अख़बारों तक, वह भी अधिकतम बिक्री वाले अख़बारों तक ही ख़र्च करने के लिए विज्ञापकों पर पैसा बचा था। इस चैलेंज से अमरीकी पिं्रट मीडिया भी नहीं बच पाया था। लाइफ़ जैसी पत्रिकाएँ धराशायी हो गईं। सामान्य मध्यम वर्गीय पाठक की पत्रिकाओं में केवल रीडर्स डाइजेस्ट ही बच पाया था। इस का कारण यह था कि विज्ञापकों ने इस वर्ग के पत्रों में से रीडर्स डाइजेस्ट को समर्थन देने के लिए सर्वसम्मति से चुन लिया था। लेकिन अपने आप को बदलते समाज के अनुरूप न ढाल पाने के कारण अमरीका में पिछले कुछ सालों से उस की लोकप्रियता दिनोंदिन घटती गई। उस का भारतीय अँगरेजी संस्करण अब भी बिक पा रहा है। एक कारण हैै उस के भारतीय पाठक उस वर्ग के हैं जिसे हम नक़लची कह सकते हैं। सर्वोत्तम के पाठक उस कोटि में नहीं आते थे। यहाँ भी कुछ उदाहरण दे कर ही बात स्पष्ट की जा सकती है। कनाडा में आधी से अधिक सामग्री कनाडा की छपती है, भारत में भारत की नहीं। भारत में कुछ भी घटता रहे, यहाँ के डाइजेस्ट में उस के बारे में कुछ नहीं छपता था। लगता था उस का संपादन मंडल किसी अमरीकी ओलिंपस पर्वत पर बैठा है, नैसर्गिक बादलों के नीचे जो भारतीय संसार है, वह उसे नहीं दिखाई देता। दूसरा कारण है उस का स्वामित्व टाटा से हट कर इंडिया टुडे के हाथों आ जाना।
लेकिन कहना होगा कि डाइजेस्ट के लेख बहुत अच्छी तरह लिखे होते हैं। उन की शैली से हिंदी वाले बहुत कुछ सीख सकते हैं। लेकिन पत्रकारिता मात्र शैली नहीं होती। लेखक संसार को कैसे देख रहा है इस से भी उस का सरोकार होता है। केवल एक उदाहरण- मान लीजिए श्रीलंका के बारे में कोई लेख है। कोई अमरीकी वह लेख लिखता है, तो वह पश्चिम की नज़र से उस के इतिहास को देखेगा, यह बताएगा कि अंगरेजी का सैरेनडिपिटी शब्द उस द्वीप के अरबी नाम सेरेनदीव से बना है, कि वहाँ आर्थर क्लार्क रहते हैं। यदि कोई भारतीय लिखेगा तो वह श्रीलंका से भारत के पुराने संबंधों की बात करेगा, रामायण की बात करेगा, सम्राट अशोक की बेटी संघमित्रा के बारे में बताएगा, आज वहाँ की राजनीति में तमिल और सिंहल टकरावों के पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालेगा। भारतीय पाठक को अँगरेजी के डाइजेस्ट में यह सब नहीं मिलता और उसे इस की परवा भी नहीं है, क्योंकि वह अपने आप को आम भारतीय से कुछ भिन्न, कुछ अलग, कुछ ऊपर समझता है।
लेकिन हिंदी पाठक वैसा नहीं है। जब मैं वहाँ था, तो सर्वोत्तम में हम ने हिंदी पर और भारतीय विषयों पर कुछ विशेष लेख लिखवाए थे। मैं ने पंडित गोपाल प्रसाद की एक पुस्तक में से मथुरा पर एक अद्वितीय लेख छापा था, जिस में वहाँ के त्योहारों का, छप्पन भोगों का वर्णन था; रामायण पर परिभाषात्मक पुस्तक लिखने वाले डॉक्टर कामिल बुल्के पर विशेष लेख छापा था।
साप्ताहिकों की बात करें तो हमें देखना होगा कि केवल धर्मयुग और दिनमान ही बंद नहीं हुए, इलस्ट्रेटिड वीकली भी बंद हुआ। क्यों? ख़ुशवंत सिंह जी के जाने के बाद वीकली फिर रट में पड़ गया। पाठक को हर अंक में जो नवीनता और चुनौती ख़ुशवंत फेंकते थे, वह समाप्त हो गई। उसके जो संपादक आए उन में वह सजग सृजनशीलता और कल्पनाशीनता नहीं थी, जो चाहिए थी। धर्मयुग में भारती जी ने कभी कमाल दिखाया था। लेकिन टीवी विस्फोट के बाद जो चुनौती आई थी, जिस तरह तेजी से पाठक की माँगें बदली थीं, वह उस से सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाए तो इस में मैनेजमेंट का भी हाथ था।
"धर्मयुग" में इलस्ट्रेटिड वीकली से अनूदित रचनाएँ छापने के आदेश दिए जाने की बात मैंने सुनी है। पता नहीं कहाँ तक सही है। "माधुरी" को हिंदी "फ़िल्मफ़ेअर" बना दिया गया, यह तो सब जानते हैं। कुछ दिन मैंने "वामा" को नज़दीक से समझने की कोशिश की थी। मैं जानता हूँ उसे हिंदी "फ़ेमिना" बनाया जाने वाला था। जैसे हिंदी फ़िल्मफ़ेअर नहीं चल पाया वैसे ही हिंदी फ़ेमिना भी नहीं चल पाती। मैंने सुना है पहले इसी तरह की योजना नवभारत टाइम्स को हिंदी "टाइम्स आफ़ इंडिया" बनाने की थी! हिंदी ब्लिट्ज़ के साथ आधी समस्या यह भी थी। कुछ ऐसी ही समस्या हिंदी "इंडिया टुडे" के साथ भी है। इन सब अँगरेजी पत्रों के लेखक संपादक भारतीय हैं, यहाँ तक तो ग़नीमत है, लेकिन अँगरेजी हिंदी पाठकों की रुचियों में, स्तर में जो अंतर है, पत्रकारिता में उसे भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। अगर पत्रिका माल है, तो हमारा माल अपने ग्राहक की आवश्यकताओं को पूरा करने वाला तो होना चाहिए। मुझे गुलाब जामुन पसंद हैं, तो आप मुझे केक तो नहीं बेच सकते।
यह कहना ग़लत है कि हिंदी पाठक के पास पैसा नहीं है। छोटे से छोटे कस्बे में धनी व्यापारी भरे पड़े हैं। कितने सरकारी अफ़सर हैं, पुलिसिए हैं, आयकर वाले हैं, पटवारी हैं, ज़मींदार हैं, जिन्होंने बेतहाशा सफ़ेद और काला धन कमाया गया है। वे सब पैसा ख़र्च करने को उतावले हैं। ये सब लोग मूलतः हिंदी के पाठक हैं। यही लोग संगीत की दुनिया को मालामाल कर रहे हैं। दिक़्क़त सिर्फ़ यह है कि उन्हें हिंदी में वह माल नहीं मिल रहा जिस पर वे पैसा ख़र्च करना चाहें।
जब कोरी व्यावसायिकता पत्रकारिता पर हावी हो जाती है, तो मैनेजमेंट बहुत सारी बातें सोचने लगते हैं। जहाँ कार्यालय है, उस जगह का बाज़ार भाव क्या है? उस भाव के हिसाब से जो मुनाफ़ा समाचार पत्र दे रहे हैं, क्या वह उससे मिल सकने वाले मासिक सूद से कम है? यदि वहाँ, मान लीजिए, होटल खोल दिया जाए, तो कितना मुनाफ़ा कमाया जा सकता है? जब इस तरह हानि-लाभ की गिनती की जाने लगेगी, तो शहर के बीच में बने हर अख़बार के दफ़्तर को या तो बंद करना पड़ेगा या फिर दूर किसी गाँव में ले जाना पड़ेगा! मैंने यह उदाहरण जान बूझ कर दिया है। ऐसा एक बार सोचा गया था। मुंबई में टाइम्स के बोरीबंदर स्थित कार्यालय के बारे में। कार्यालय तो बंद नहीं किया गया, लेकिन पत्रों को दुकान बना दिया गया। "फ़ेमिना" को फ़ैशन शो का व्यापारी बना दिया गया और "फ़िल्मफ़ेअर" को पुरस्कार समारोह से मिलने वाली आमदनी की दुकान। इन के प्रायोजित कार्यक्रमों से करोड़ों कमाए जाने लगे। अब ये पत्रिकाएँ हैं या कुछ और? मुक़ाबले में हम देखते हैं कि फ़ेमिना जैसी और दिल्ली प्रेस से विश्वनाथ जी की देखरेख में प्रकाशित होने वाली अँगरजी पत्रिका "वूमैन्स ऐरा और" हिंदी की "गृहशोभा" बड़ी शान से पत्रकारिता का झंडा लहरा रही हैं।
अँगरेजी साप्ताहिक "इलस्ट्रेटिड वीकली" के बारे में बात करने के लिए भी यह सही प्रसंग है। जो पत्रिका मर रही थी, उसे ख़ुशवंत सिंह जी ने जीवंत बना दिया और दौड़ा दिया। उनके बाद वह जीवंतता फिर विलीन हो गई। यदि "इलस्ट्रेटिड वीकली" को भी व्यवसाय बनाने का कोई माक़ूल तरीक़ा मैनेजमैंट को मिल जाता तो वह बंद नहीं होता। यही "धर्मयुग" के साथ हुआ, "सारिका" के साथ भी।
जहाँ तक "फ़ेमिना" का प्रश्न है या फ़िल्मफ़ेअर का या अँगरेजी में मुंबई से निकलने वाले इन जैसे अन्य पत्रिकाओं का, उनकी चमक-दमक ही अब सब कुछ है। यह महँगी चमक-दमक अपने आपको मॉड कहने वाले पाठक को और विज्ञापक को प्रभावित करती है। जितना पैसा इन के एक अंक के मुद्रण पर ख़र्च किया जाता है, उतना किसी हिंदी पत्रिका पर पूरे साल में भी नहीं होता था। यह सही है कि हर व्यवसायी पहले व्यवसायी होता है। तत्काल लाभ कमाना उस के लिए प्राथमिकता है। अन्यथा वह ज़्यादा दिन टिक नहीं सकता। लेकिन भविष्य के बाज़ारों को पहले से तैयार करना और साधना भी व्यावसायिकता है, और दूरदर्शी व्यावसायिकता है।
पिछली सदी के अंत के सालों में पत्रकारिता के क्षेत्र में निराशाजनक दृश्य दिखाई दे रहा था। अधिकांश पत्रकार अपने आप को नई चुनौतियों के लिए तैयार नहीं कर रहे थे। जो बड़े व्यवसायी हैं, वे भविष्य के लिए तैयार नहीं थे। लेकिन नई सदी के पहले दशक में सारी तस्वीर बदल चुकी है।

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