ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
प्रवासी जीवन पर पहली कहानी शूद्रा
CATEGORY : तथ्य 01-Oct-2016 12:00 AM 2459
प्रवासी जीवन पर पहली कहानी शूद्रा

प्रेमचंद हिन्दी कहानी के इतिहास में अनेक नये विषयों, सम्वेदनाओं एवं प्रवृत्तियों के उद्भावक थे। उन्होंने हिन्दी-उर्दू कहानी को आधुनिक बनाया, कहानी का नया शास्त्र दिया, उर्दू से हिन्दी में आकर नवोन्मेष किया, जीवन के उपेक्षित क्षेत्रों में पदार्पण किया, विदेशी पात्रों की कहानियां लिखीं और भारत से छल-कपट से भेजे गये गिरमिटिया मजदूरों के विदेश-प्रवास पर कहानी लिखी। महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में अपने प्रवास-काल में वहां के प्रवासी भारतीयों के दमन, शोषण और अत्याचार के विरुद्ध जो संघर्ष किया, उसने भारत के प्रवासियों की समस्याओं एवं उनके विषम जीवन को देश की राजनीति का चिन्ता का विषय बना दिया। हिन्दी की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं- "मर्यादा", "प्रभा", "माधुरी", "चांद" आदि में मॉरीशस, फिजी, ब्रिटिश गायना, दक्षिण अफ्रीका आदि देशों में रहने वाले भारतीय गिरमिटिया मजदूरों के यातनामय जीवन की कथाएं छपने लगीं। बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में पं. बनारसीदास चतुर्वेदी ने तीन-चार किताबें फिजी के प्रवासी भारतीयों पर लिखीं तो प्रवासी भारतीयों के दु:ख-दर्द के प्रति भारतीयों की रुचि बढ़ी। चतुर्वेदी से सन् 1918 में प्रकाशित अपनी पुस्तक "प्रवासी भारतवासी" में विस्तार से भारतीय प्रवासियों के इतिहास और जीवन की परिस्थितियों का चित्रण किया। उन्होंने "मॉरीशस" के नामकरण के संबंध में इस पुस्तक में लिखा, ""मिर्च का मुल्क उसका नाम क्यों पड़ा, इस विषय में एक बार "भारत-मित्र" में लिखा था- दो-चार मिर्च खाने से तो मुंह ही कड़वा हो जाता है, परन्तु अधिक मिर्च खाने वाले को बड़ा कष्ट होता है और वेदना में वह चटपटाने लगता है। हिन्दुस्तानी कुलियों के साथ जो कुव्यवहार किया जाता है, वह ऐसा है कि मानो उनके चारों ओर मिर्च ही मिर्च लगा दी गयी हैं। इसलिए दारुण दु:ख से दु:खी होकर ही वहां जाने वाले हिन्दुस्तानी कुलियों ने इस टापू का नाम "मिर्च का मुल्क" रख दिया है।"" भारत से मॉरीशस जाने वाले स्वामी मंगलानन्द पुरी जनवरी से अक्टूबर 1912 तक मॉरीशस रहे और उनका मॉरीशस पर एक लेख "मर्यादा" के 3 जुलाई, 1912 के अंक में छपा और उन्होंने लिखा, ""5 जनवरी, 1912 को कलकत्ते से कूच करके इस टापू में जिसे मॉरीशस या हमारे देशी लोग मिरिच का टापू कहते हैं, आ गया हूं। यहां आये हुये मुझे लगभग दो मास होते हैं।""
प्रेमचंद इस मिरिच देश के अस्तित्व तथा छल-कपट से भेजे जाने वाले एवं दंड से बचने के लिये अपराधियों के मॉरीशस, फिज़ी आदि देशों में जाने के सत्य से पूर्णत: अवगत थे। "गोदान" में जब गोबर झुनिया के चक्कर में घर से भागता है और जब घर लौटता है तो धनिया उससे कहती हैं, ""इस तरह कोई घर से भागता है? कोई कहता था, मिरच भाग गया, कोई डमरा टापू बताता था। सुन-सुन कर जान सूखी जाती थी। कहां रहे इतने दिन।"" प्रेमचंद उसी क्षेत्र में जन्मे थे और निवासी थे, जहां से सैकड़ों-हजारों लोग मिरच देश चले गये थे और इस प्रकार मिरच भागना लोग जीवन में कहावत बन गयी थी। प्रेमचंद अफ्रीका में बसे भारतीयों की दुर्दशा और नियति से भी अवगत थे, अन्यथा "दो बैलों की कथा" (अक्टूबर, 1931) कहानी के आरंभ में वे यह अंश नहीं लिखते, ""भारतवासियों की अफ्रीका में क्यों दुर्दशा हो रही है? क्यों अमेरिका में उन्हें घुसने नहीं दिया जाता? बेचारे शराब नहीं पीते, चार पैसे कुसमय के लिये बचाकर रखते हैं। जी तोड़ काम करते हैं। किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करते। चार बातें सुनकर ग़म खा जाते हैं, फिर भी बदनाम हैं। कहा जाता है, वे जीवन के आदर्श को नीचा करते हैं। अगर वे भी ईंट का जवाब पत्थर से देना सीख जाते तो शायद सभ्य कहलाने लगते। जापान की मिसाल सामने हैं। एक ही विजय ने उसे संसार की सभ्य जातियों में गण्य बना दिया।"" प्रेमचंद की इस प्रवासी चेतना तथा सरोकार का एक सुखद परिणाम यह हुआ कि उन्होंने मॉरीशस जाने वाले भारतीयों के जीवन पर एक कहानी "शूद्रा" लिखा जो "चांद" पत्रिका के प्रवासी अंक (जनवरी, 1926) में प्रकाशित हुई। एक तो "चांद" पत्रिका का प्रवासी अंक निकलना ही महत्वपूर्ण था जो इसका प्रमाण था कि हिन्दी साहित्यकार तथा पत्रिका-सम्पादक भारत के प्रवासियों के प्रति कितने सम्वेदनशील थे और दूसरे प्रेमचंद जैसे हिन्दी-उर्दू के विख्यात कहानीकार का इस विषय में कहानी लिखना तो और भी महत्वपूर्ण था। मैं समझता हूं कि "शूद्रा" प्रवासी भारतीयों पर लिखी गयी हिन्दी की यह पहली कहानी थी और मुझे आश्चर्य नहीं होगा अगर यह भारत की इस विषय पर पहली कहानी हो और प्रेमचंद जैसे राष्ट्रीय कहानीकार के द्वारा लिखी गयी हो।
मॉरीशस के प्रसिद्ध लेखक व सम्पादक प्रह्लाद रामशरण ने इस कहानी के "शूद्रा" शीर्षक के स्रोत के रूप में स्वामी मंगलानन्द पुरी के "मर्यादा" के 3 जुलाई, 1912 को प्रकाशित लेख "मिरिच यात्रा" से इन पंक्तियों को अपने लेख "मिर्च के मुल्क में" हिन्दुस्तानी कुली (22 फरवरी, 1987) में उद्धृत किया है, ""मुझे बताया गया कि जितनी संतानें यहां उत्पन्न हुई हैं उनमें से प्रति सैकड़ा अस्सी वर्ण संकर हैं। किसी का ब्राह्मण पिता था पर माता शूद्रा, किसी की माता ब्रह्माणी थी पर पिता शूद्रा।"" प्रह्लाद रामशरण ने इस पर अपना मत देते हुए लिखा है कि इस कठोर तथ्य का इतना जबर्दस्त प्रभाव मुंशी प्रेमचंद के मानस-पटल पर पड़ा था कि 13 साल बाद उन्होंने "शूद्रा" कहानी लिखी थी और 23 साल बाद "गोदान" में मातादीन और सिलिया की कथावस्तु प्रस्तुत करके अपने मानस-पटल से एक बोझ को उतार फेंका था। प्रह्लाद के इस तर्क से सहमत होना कठिन है, क्योंकि "शूद्रा" कहानी में गौरा और मंगरू भारत में पैदा हुए हैं न कि मॉरीशस में, अत: उनके वर्णसंकर होने का कोई प्रश्न ही नहीं है।
प्रेमचंद के जीवन-काल में ही उनकी रचनाएं एवं ख्याति मॉरीशस पहुंच चुकी थी। इसकी जानकारी हमें "दुर्गा" (1935-38) हस्तलिखित पत्रिका तथा "मॉरीशस आर्य-पत्रिका" के अंकों से लगता है। "दुर्गा" एक हस्तलिखित हिन्दी पत्रिका थी जिसके सम्पादक "ज्वालामुखी" अर्थात वहां के प्रसिद्ध हिन्दी-सेवी सूरज प्रसाद मंगर (एस.एम.) भगत थे और उन्होंने 1935-38 में इसका सम्पादक एवं देश के लेखकों तक इसे पहुंचाने का क्रांतिकारी काम किया। इस हस्तलिखित पत्रिका से ज्ञात होता है कि "चांद", "माधुरी", "प्रभा", "हंस" आदि हिन्दी पत्रिकाएं तथा साहित्य मॉरीशस पहुंचता था। प्रेमचंद के देहान्त पर "दुर्गा" के नवंबर, 1936 के अंक में सम्पादक की श्रद्धांजलि "हाय प्रेमचंद!" शीर्षक से छपी है। इसमें सम्पादक ने प्रेमचंद की "रंगभूमि", "सेवासदन", "गोदान", "प्रेम-द्वादशी", "प्रेम-पूर्णिमा", "प्रेम पचीसी", "मानसरोवर" आदि कृतियों का उल्लेख करने के साथ उन्हें "सर्वश्रेष्ठ कथाकार", "महान औपन्यासिक", "क्रांतिकारी औपन्यासिक", "योद्धा", "भारतीय साहित्य के चन्द्र" आदि विशेषणों से विभूषित किया है और समाचार-एजेंसी रायटर को उनके देहान्त का समाचार न देने के लिये दोषी ठहराते हुये लिखा है, ""इतने भारी औपन्यासिक के निधन का समाचार कंजूस रायटर ने हमें नहीं दिया। अफसोस! पराधीन सुख सपनेहु नाहिं। यदि प्रेमचंद एक अंग्रेज औपन्यासिक होकर इंग्लैंड में मरे होते तो रायटर दुनिया का एक अदना कोना भी नहीं छोड़ता, पर पराधीन देश की घटनाएं भी पराधीन हुआ करती हैं।"" सम्पादक की इस टिप्पणी से यह स्पष्ट होता है कि प्रेमचंद बीसवीं शताब्दी दूसरे-तीसरे दशक में मॉरीशस के हिन्दी पाठकों तक पहुंच चुके थे और उस युग में संचार साधनों के अभाव में प्रेमचंद के देहान्त का समाचार वहां कुछ समय बाद ही पहुंच गया और नवंबर, 1936 को उन्हें श्रद्धांजलि दी गयी। इन तथ्यों का एक और प्रमाण मॉरीशस की दूसरी हिन्दी पत्रिका "मॉरीशस आर्य पत्रिका" के 20 नवंबर, 1936 के अंक से भी मिलता है जिसमें "मुंशी प्रेमचंद बी.ए. का निधन" शीर्षक से इन शब्दों में श्रद्धांजलि दी गयी थी, श्री प्रेमचंद हिन्दी के एक ख्यातनामा लेखक थे। "सेवासदन" फिल्म के सम्भाषण के लेखक आप थे। आपने कई उपन्यास लिखे हैं। भारत में आपको "उपन्यास सम्राट" की अर्थपूर्ण उपाधि से लोगों ने अलंकृत किया था। रशियन, फ्रेंच, जर्मन आदि संस्कृत भाषाओं के साहित्य का अंग्रेजी द्वारा आपने अच्छा निरीक्षण किया था। सम्पादकीय कार्य का भी आपको अनुभव है। आप सरकारी नौकर थे पर गांधी सत्याग्रह युग में देशभक्ति के कुंड मनें आपने अपनी आहुति दे डाली और उनकी पत्नी शिवरानी भी जेल गयी थीं। आप एक सुधारवादी भी थे। आपका सारा जीवन युद्ध में बीता है। आप गरीबी से लड़े, सामाजिक कुप्रथाओं से लड़े, सरकार से लड़े, साहित्यिक प्रथा से लड़े और अंधविश्वास से भी। श्री प्रेमचंद की कृतियों में यथार्थवाद, आदर्शवाद और रोमांसवाद का बड़ा ही सुंदर सामंजस्य दिखायी पड़ता है। वे कलाकार भी थे, एक लेखक-संघ की स्थापना करके हिन्दी की सेवा करने का आपने एक आयोजन भी किया पर ईश्वरीय इच्छा कुछ और थी। पिछले मास की तारीख 8 (आठ) अक्टूबर, 1936 ई. को पुण्य क्षेत्र काशी में आपने देह विसर्जन किया। उनकी मृत्यु से हिन्दी साहित्य-संसार को भारी क्षति पहुंची है और उसकी पूर्ति होना कठिन ही है। आपका 56 वर्ष की उम्र में देहान्त हुआ है। उनके कुटुम्बियों को, खासकर उनकी पत्नी शिवरानी देवी के साथ हम सम्वेदना प्रकट करते हैं। ईश्वर उनकी गतात्मा को सद्गति प्रदान करें।""
इस प्रकार प्रेमचंद और मॉरीशस, अनजाने में ही, एक दूसरे के प्रति समर्पित हो रहे थे। प्रेमचंद जब "शूद्रा" लिख रहे थे तब उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि मॉरीशस में उनके पाठक हैं, प्रशंसक हैं और उन्हें वे भारत का सर्वश्रेष्ठ कथाकार मानते हैं। प्रेमचंद "शूद्रा" कहानी की रचना से भारत में अपने पाठकों को मॉरीशस गये भारतीयों की त्रासदी से अवगत करा रहे थे और मॉरीशस के प्रति उत्सुकता भी जाग्रत कर रहे थे। "शूद्रा" वैसे तो गौरा और मंगरू की कहानी है जो भिन्न-भिन्न कारणों से मॉरीशस पहुंचते हैं, किन्तु वे एक प्रकार से भारतीय ग्रामीणों की अस्मिता, सतीत्व-रक्षा, जीवटता, श्रमशीलता, पारिवारिकता एवं आत्मोत्सर्ग की कहानी है और कहा जाये तो मॉरीशस में भारतीयता, उसके नैतिक-अनैतिक भाव-बोध, साहस और जीवटता अस्तित्व-रक्षा के साथ दूसरों के लिये दारूण दंड सहने की शक्ति और स्वाभिमान की रक्षा के लिये आत्म-बलिदान जैसे श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों की कहानी है। कहानी में मंगरू और गौरी ब्राह्मण एजेंट के छल-कपट में फँसकर मॉरीशस पहुंचते हैं और जब मंगरू गौरी और उसकी सहेली को अपने घर ले जाता है तो वह शोहदों से उनकी रक्षा करता है और अपने मालिक से मार खाता है। गौरी एक भारतीय स्त्री की तरह कोठी-मालिक से मंगरू की रक्षा करती है और साहब को भी बदल देती है, किन्तु मंगरू अपनी मुक्ति में पत्नी गौरा की चरित्रहीनता देखता हैं तो गौरा नदी में कूद पड़ती है और मंगरू उसे बचाने के लिये कूदता है, किन्तु प्रात:काल दोनों ही लाशें मिलती हैं। इस प्रकार "शूद्रा" की नायिका गौरी शूद्रा नहीं है, मालूम नहीं लेखक ने इसका ऐसा नामकरण क्यों किया? मॉरीशस में यही कारण है कि इस कहानी को वे बड़े सम्मान से देखते और पढ़ते हैं और मंगरू-गौरा को अपने पूर्वजों के रूप में देखते हैं। प्रेमचंद ने मॉरीशस का, जिसे कुछ लोग मारीच से भी जोड़ते हैं, बड़ा वास्तविक वर्णन किया है और वहां गये भारतीयों को अपने देशी संस्कारों के साथ जीवित रहने और संघर्ष करते दिखाया है।
प्रेमचंद का आदर्शवाद इस कहानी में भी है। मंगरू स्त्री की सतीत्व-रक्षा के लिये अपने प्राण तक देने को तैयार है और गौरा, सीता के समान, पति के संदेह पर अपना अस्तित्व समाप्त कर देती है। इस प्रकार "शूद्रा" कहानी भारतीय जीवन-मूल्यों को रेखांकित करती है और इससे प्रवासी जीवन पर लिखे साहित्य की शुरुआत होने पर इस साहित्य-धारा का महत्व बढ़ता है।
हिन्दी में प्रवासी साहित्य अब एक विशिष्ट साहित्य-धारा बन गयी है और वह अब हाशिये से हटकर मुख्य धारा का अंग बन गयी है। प्रवासी साहित्य की संवेदना, जीवन-दृष्टि और सरोकार सभी हिन्दी साहित्य की मुख्य-धारा से भिन्न हैं। इसमें मौलिकता है और विशिष्टता है। इसे घटिया साहित्य, हिन्दूवादी साहित्य अथवा आरक्षणवादी साहित्य कहना इसका अवमूल्यान करना और अपमान करना है। यह साहित्य निरंतर विकासशील है, नयी-नयी कृतियां बराबर आ रही है, अत: अब उसके उचित सम्मान एवं साहित्य में उचित स्थान के अधिकार को ठुकराना संभव नहीं है।

NEWSFLASH

हिंदी के प्रचार-प्रसार का स्वयंसेवी मिशन। "गर्भनाल" का वितरण निःशुल्क किया जाता है। अनेक मददगारों की तरह आप भी इसे सहयोग करे।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal | Yellow Loop | SysNano Infotech | Structured Data Test ^