ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
पर्यावरणी वरण
01-Dec-2017 06:41 PM 1700     

परे हट यार! तुझे कब वरण करना चाहा मैंने! मुझे तो तू फूटी आँख भी नहीं सुहाता। उस पर न जाने कहाँ से पकड़ लाए ख़र-दूषण (प्रदूषण) को और हिलगाए रहता है। सचमुच में मेरा-तेरा दूर-दूर तक कुछ मेल नहीं खाता। फिर भी गले पड़ता है। मैं क्यों खामख्वाह तेरी कलाई पकड़ूँ भला! अब तो चिढ़ सी होने लगी है तेरे नाम से।
बताऊँ क्यों? क्योंकि इस धरातल पर जब देखो तब तेरी हिमायती, हिफ़ाज़ती रट (बरसात में मेंढक की टर्र-टर्र सी) दुनिया के कोने-कोने से लगती रहती है। सब तुझे सिर पर बिठाए रखना चाहते हैं (कोई चाहत-वाहत में नहीं बल्कि अपना उल्लू सीधा करने के लिए)। वो भी सिर्फ़ बतौर काग़ज़, पत्री, सभा, समारोह, योजन, प्रयोजन, आयोजन, जुलूस, जलसे, नारों, पोस्टरों, राजनीतिक गलियारों, पर्चियों, अख़बारों की भरमारों, बिल्ला, तमग़ा, पुरस्कार, फ़ोटो, फ़ुटेज और मीडिया कवरेज तक ही। असलियत में अमली जामा पहनाने वालों की जमात ज़नाबेमयस्सर नहीं।
काम तो वे ऐसे चुन-चुन कर करते हैं जिनमें तुझे चाहे कितनी भी तकलीफ़ हो, तेरा कितना भी नुक़सान क्यों न होवे पर उनके नफ़े में कोई आँच न आने पावे। देखें ज़रा! एक तरफ़ तो- जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है की तर्ज़ पर, जिधर देखो उधर तुझे बचाने का हो- हल्ला सुन-सुन कर भाए मेरे तो कान पक गए पर क्या मजाल कि जूँ रेंग जाए। दूसरी तरफ़ भी पाक-साफ़ कहेगी कि जूँ रेंगे भी क्यों? कान मेरे, जूँ मेरी, भला मेरी मर्ज़ी के बिना क्यों रेंगने लगी?
मेरी मर्ज़ी! मेरी ज़िंदगी है। तिरासी लाख निन्यानबे हज़ार नौ सौ निन्यानबे योनियों के बाद मनुष्य योनि मिली है। जिसके बिना जन्म-मरण के काल-चक्र से छुटकारा संभव नहीं। तो क्यों हम इस दुर्लभ मानव जीवन को मनमाने ढंग से न जिएँ! जो एक ही बार मिलता है। मुझे क्या पड़ी जो कल क्या सही रहेगा और क्या बिगड़ेगा की चिंता में नाहक अपने वर्तमान का कचरा करें। गुणीजन भी तो कह गए कि भूत और भविष्य की चिंता छोड़ वर्तमान में रहना सीख।
अपन का मन आसमान में धुएँ के ग़ुब्बारे छोड़ें या ज़मीन पर पेड़, पानी, पौधे रोपें या उजाड़कर कंक्रीट की गगनचुंबी इमारतें गढ़ें या तीन कन्स्तर पीट-पीटकर गला फाड़ चिल्ला-चिल्लाकर गाएँ। बताइए तो! अपने आराम और सुख-सुविधाओं के लिए हम कड़ी मेहनत से नए-नए बेजोड़ फिर उनकी भी तोड़ के आयाम क़ायम करें, इसमें कौन सी बुराई है!
मुझे सब मालूम है। कुछ लोग होते ही हैं जलकुकड़े। जिनसे किसी की सुखी आरामतलबी ज़िंदगी देखी नहीं जाती। ऐसे शख़्स आरामपरस्तों के लिए ख़तरे के निशान से ख़ौफ़ पैदा करने वाले होते हैं। न ख़ुद चैन से रहते हैं और न ग़ैर को रहने देते हैं। कोई उनसे पूछे भला इन्हें कौन सी बला ने जकड़ रखा है जो सदा उन्हें पर्यावरण के आवरण औ अनावरण की परवाह सींग मारने लगती है। बेवजह आ बैल मुझे मार! नहीं जानते क्या, आगे भी न जाने तू, पीछे भी न जाने तू। जो भी है बस यही इक पल है, पूरी करले आरज़ू।
सो भैया! अपन तो इन पचड़ों में पड़ कर अपना परमानंदस्वरूप आरामपरस्ती की मस्ती वाला रूतबा ताने चैन की बंसी बजाते, कल की कलवाले जाने का डंका बजाते, देख-जानकर भी आँख मूँदकर सो जाते हैं। सही कही-
अजगर करे न चाकरी, पंछी करै न काम,
दास मलूका कह गए, सबके दाता राम।

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