ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अहंकार और मनुष्य
CATEGORY : विचार 01-Oct-2017 01:09 PM 879
अहंकार और मनुष्य

प्रभु की महिमा अपरम्पार है, ये जीवन भर कहते और सुनते आये हैं, पर गम्भीरता से विचार करने पर उनकी दूरदर्शी, अनोखी सूझ-बूझ पर अचम्भा अवश्य होता है कि कैसे उन्होंने हर स्थिति और समस्या की कल्पना कर के उसके निवारण की विधि बनाई है।
प्रभु ने मनुष्य बनाया और उसे विविध बाह्य और आन्तरिक विरोधी गुणों और मान्यताओं से संजोया।
शक्तिशाली-दुर्बल, सुन्दर-कुरूप, सरल-कठिन, ज्ञानी-मूर्ख, क्रोधी-नम्र, स्वाभिमानी-निःस्वार्थ स्नेही आदि विविधता से अपना बहुरंगी संसार सजाया।
ईश्वर ने मानव को स्नेह और अभिमान से बनाया, फिर उसे अहम् (ईगो) का अस्त्र दे कर निश्चिन्त हुए। आवश्यकता पड़ने पर अहम् दीन आत्मा की रक्षा करेगा और कभी अपने स्वाभिमानी, उत्श्रृंखल व्यवहार के परिणाम स्वरूप निरीह मानव परमात्मा का दर्ज़ा पाने से वंचित रहेगा और परमात्मा का स्थान सदा सुरक्षित रहेगा।
अहम् बहुरूपिया होता है। अहम् चालाक, नीच, धोखेबाज़, अपनी बात बदलने वाला और अभिमानी होता है। प्रायः सुनता वही है जो सुनना चाहता है। ईगो किसी भी कारण के लिए मर मिटने को तैयार रहता है। ईगो को गलत साबित करना या नीचा दिखाना टेढ़ी खीर है। ईगो दुःख, अत्याचार, अपमान से नहीं घबराता बल्कि उस ताप से और खरा हो जाता है। पीड़ा तो उसका भोजन है या कहिये दावत है। अपमान का तो वह स्वागत करता है। वह अपने को आम लोगों से भिन्न, ईश्वर का विशेष चुना हुआ पात्र समझता है। पीड़ित और मूक आत्मा जब सामाजिक बन्धनों में उलझ कर अपने को असहाय पाती है तो प्रायः निडर ईगो ही उसे गोद में उठा कर साहिल तक पहुँचता है। शायद प्रभु ने अहम् की स्थापना इन्हीं दिनों के लिए की होगी पर अमन के समय, आत्मा जो मालिक है उसे पुनः अपना सिंहासन संभालना चाहिए और ईगो को सेवा निवृत्त कर देना चाहिए।
ईगो अपना "पावरफुल पोजीशन" छोड़ना नहीं चाहता। प्रायः डरा धमका कर आत्मा को दबोचे रहता है। राजनीति है भाई, "लाइम लाइट" से हट कर "नो वन" बनना कोई क्यों चुनेगा? ईगो की विशेषता मैं पहले भी बता चुकी हूँ कि वह बहुरूपिया है, निर्लज्ज है। वह समाज का कोई नियम कानून नहीं मानता। अपने जीवित रहने के लिए वह किसी के भी सिर पर पैर रख कर कुचलता हुआ पानी के ऊपर सिर निकाल कर मुस्कुरा सकता है। यही उसका धर्म है जो वह बखूबी, सगर्व निभाता है। कौन पीड़ित होगा या उचित-अनुचित की परवाह किये बगैर ईगो अनभिज्ञ सा जीता है। इतना हंगामा खड़ा कर सकने वाले शक्तिशाली ईगो की सबसे बड़ी कमजोरी है कि उसका अपना शरीर नहीं होता। उसका अस्तित्व तभी संभव है यदि सशरीर जीव उसे आश्रय दे। यदि शरीर जिसमें आत्मा का वास है, न चाहे तो ईगो की खैर नहीं!
जिस जीव पर हावी होकर ईगो राज करता रहा है उसे सिंहासन से उतारना आसान नहीं, पर जब मनुष्य में जागरण हो जाता है कि मालिक मैं हूँ, हुकूमत मेरी ही चलेगी, तो क्षण में सब कुछ पलट सकता है। यह स्थिति भी तब आती है जब आत्मा ईगो के अत्याचार से कराह उठाती है और अपने व्यक्तिगत अस्तित्व को लुटता हुआ महसूस करती है और प्रायः डूबते और साँस न ले पाने की स्थिति से तड़प उठाती है तो निरीह आत्मा गिड़गिड़ाती है, ईश्वर से जीवन की भीख माँगती है। हे प्रभु, मुझे बचा लो। मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं गलत हूँ, अज्ञानी हूँ, मूर्ख हूँ। मुझे पनाह दीजिए, मानसिक शांति दीजिये। एक बार आत्मसमर्पण कर देने के बाद ईश्वर की अनुकम्पा से सब कुछ बदलता हुआ दिखाई देने लगता है और पहली बार हम अपनी स्वयं निर्मित दयनीय दशा पर खुल कर हँसते हैं।
ईगो को वश में करने का एकमात्र तरीका है उसको अनदेखा (त्ढ़ददृद्धड्ढ) करना। ईगो को आप डाँट-फटकार सकते नहीं। याद है, वह तो उसका भोजन है।
मानव जीवन में अहम् अनावश्यक नहीं है, वर्ना रचयिता ने उसे रचा ही क्यों होता? जैसे "प्रेसिडेंट" के "बॉडी गार्ड" होते हैं, क्लबों में "बाउंसर" होते हैं समाज की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए, उसी तरह मानव जीवन में ईगो एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ईगो न होता तो विश्व के "सेवन वण्डर" (एण्ड ग्रोइंग) न होते। आत्मगौरव ईगो ही है।
शुद्ध प्रेम-दिवानी मीरा कहती हैं :
हम सौतन के घर जैबे
मान घाटे तो का घट जैबे
प्रभु जी के दरसन पैबे।
ध्यान मात्र लक्ष्य पर है, आत्मा की तुष्टि। अहम् की एक न चली। ईगो के चंगुल से निकल कर जब जीवात्मा खुली प्रकृति के बीच श्वांस लेता है तब पहली बार देख पाता है कि जीवन कितना सरल और सुन्दर है।

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