ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिन्दी साहित्य में सांस्कृतिक बोध
01-Sep-2017 03:35 PM 2542     

भारत में फिरंगियों के रहते और उनके जाने के बाद हिन्दी में विमर्श की परम्परा बहुत गड़बड़ा गयी है, हम अपने शब्द भूलकर जैसे किसी आयातित भाषा में विमर्श कर रहे हैं, किसी और के बीज शब्दों को व्यर्थ ही अपनी जमीन पर रोप रहे हैं, हम अपने अनुभव की फसल उगाना भूलते जा रहे हैं। रामचन्द्र शुक्ल, हजारीप्रसाद व्दिवेदी, वासुदेवशरण अग्रवाल, अज्ञेय, नन्ददुलारे वाजपेयी जैसे विचारकों ने जिस साहित्य-विमर्श की जो उर्वर जमीन तैयार की, उसके आसपास साहित्य की प्रगतिशील राजनीति और वामपंथी व्यभिचारिणी बुध्दि की खरपतवार ने अपना डेरा डाल दिया। ऊपर मैंने जिन अनुपम आलोचकों का स्मरण किया वे जानते थे कि हिन्दी का सांस्कृतिक बोध एक सनातन भागवत इतिहास में बसा हुआ है और यह बोध हमारी प्रकृति की त्रिगुणात्मक श्रृध्दा पर आधारित है और हमारे जीवन में सदियों से जाने-अनजाने किसी अनुकीर्तन की तरह गूँज रहा है ।
हमारे देश में आध्यात्मिक आंदोलन साहित्य और समाज सर्जना के स्रोत रहे हैं और जो हमेशा याद दिलाते रहे कि अपने उद्गम और सन्निधि को भूलकर जीवन जिया ही नहीं जा सकता। वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, भगवद्गीता, बुध्द, कालिदास, भर्तृहरि, भवभूति, जयदेव, विद्यापति, सूरदास, तुलसीदास, चण्डीदास, ज्ञानदेव, तुकाराम, कम्बन, तिरुवल्लूर, नानक, कबीर, मीरा, गालिब और तमाम आलवार संत -- ये सब इन आंदोलनों के केन्द्र में हैं। इन्हें सारी सृष्टि एक बड़े प्रजातंत्र के रूप में अनुभवगम्य होती रही जिसमें सब अभिव्यक्त होते हैं, साथ रह सकते हैं। अपनी-अपनी भाषा में पार उतरते हैं। हिन्दी ने पार उतरने की कला बहुत-सी बोली-बानियों से सीखी है। कहने का मन होता है कि हिन्दी की बुध्दि में अनेक भारतीय भाषाओं में बसा बोध गहरा गया है।
प्रतीति को वाणी में ले आने के लिए पहली खोज शब्द और नाद की ही है। अन्तःप्रेरित बोध शब्द और ध्वनि में ही प्रकट होता है। कह सकते हैं कि शब्द ही यज्ञ है और हमारी कल्पना उसकी पुरोहित है। हमारे सांस्कृतिक बोध में धर्म, दर्शन और काव्य की एकता है। रचते हुए वे एक साथ प्रतीति में आते हैं और हम शब्द की उस उपलब्धि का उत्सव मनाते हैं जिसमें बोध बसा लिया गया है ।
सहृदय जन अनुभव करते होंगे कि रामायण और महाभारत हमारे मन का समुचित गठन करते हुए हमारे पुरुषार्थ, पराक्रम और परहित को साधने की इतिहास-कथा जैसे हैं। कवि कालिदास मेघ की तरह हमारे सांस्कृतिक बोध पर छाये हुए हैं -- प्रकृति, नगर-नागरिक, राज्य का यश और विश्वव्यापी प्रेम का सौंदर्य किसी गहरे सत्व में घनीभूत होकर हमारे जीवन पर बरसता है। जोगी भर्तृहरि हमें नीति, श्रृंगार और बैराग्य में एक साथ उतारते हैं। कवि जयदेव हमारी आत्मा की प्यास को रसमय प्रेम से तृप्त करते हैं। कवि विद्यापति हमारी देह में घटते प्रेम-प्रलय के सामने हमें ऐसे खड़ा कर देते हैं जैसे हमारे हृदय की भूमि पर कोई नया युग आ रहा हो ।
हम परिचित हैं उस बड़ी सन्त परम्परा से, जो हमें कितने भेदभावों से मुक्त कर लोकमंगल की तरफ लिए चली आयी है। तुलसीदास जैसे महाकवि हमें रामराज्य को चरितार्थ करने के लिए नागरिक धर्म का पाठ पढ़ा गये हैं। वे हमसे कह गये हैं कि रामराज्य जीवन में काम-मद और क्रोध के विगत होते जाने से ही फलता-फूलता है। बहुरंगी प्रकृति में बसे ईश्वर के घर को हमें ही झाड़-बुहारकर ठीक रखना है। कहने का मन होता है कि ईश्वर हमें नहीं पालता, वह तो हमारा आत्मज सत्य है, हमें ही उसे सँवारना और सँजोना पड़ता है। सूरदास ने अपनी कविता में ईश्वर को पाल-पोसकर ही चरितार्थ किया है। वे आवाज लगाते हैं -- है कोऊ ब्रज में हितू हमारौ, चलत गोपालहिं राखै ।
कोई सांस्कृतिक बोध सृष्टि बोध के बिना संभव नहीं। यह सृष्टि बोध जब तक किसी चरित में न घट जाये, तब तक संस्कृति बोध संभव नहीं। राम और कृष्ण के चरित से ही एक गहरे सांस्कृतिक की छाया हम पर पड़ी है। अहिल्या भूमि को तारे बिना और गोवर्धन में उत्सुक हुए बिना हिन्दी के सांस्कृतिक बोध की गहराई में डूबा साधना कठिन है। हम अपनी संस्कृति को सदा एक ऋतुकाल में बसा हुआ अनुभव करते आये हैं। हमारा सांस्कृतिक बोध प्रकृति को लूटकर नहीं उसमें बसकर पनपता आया है। बहुत गहरे अर्थ में यह बोध हमसे समूची सृष्टि के प्रति एक नागरिक धर्म के निर्वाह की माँग करता है ।
हम अनुभव करते आये हैं कि काल-कर्म-गुण-ज्ञान और स्वभाव की सम्यक् प्रतीति के बिना कोई बोध संभव नहीं है। इसके बिना संस्कृति की वीणा के तार ढीले पड़े रहते हैं। आप य़ाद करें कवि अज्ञेय की रची असाध्य वीणा कविता को। कवि हमसे कह रहे हैं कि हमें अपनी इयत्ता को जगाने के लिए सब कुछ की तथता को साधना पड़ता है। मन ही मन लगता है कि यह वीणा हमारी देह ही है जिसे जीवन की अतियों के बीच मध्य में साधते रहना पड़ता है।
भारतीय वांग्मय के अंतरंग में झाँको तो प्रतीत होता है कि हमारे सांस्कृतिक बोध की वीणा अक्षर से रस तक तनी हुई है -- दर्शन में अक्षर ही पराशक्ति है। योग में उसे परम चैतन्य के रूप में अनुभव करते हैं। नीति शास्त्र में यही अक्षर सत्य के प्रवाह रूप में ऋत बन जाता है। यह अक्षर ही ज्योतिष में काल है। आयुर्वेद इसे प्राण स्वरूप अनुभव करता है। यह अनंत शून्य होकर गणित में विराजा है। संगीत में यह अक्षर ही नाद है और साहित्य में रस है।
यह अक्षर तत्व हमें कई नामों से घेरे हुए है। हम सबकी जन्मजात अभिलाषा है कि अपने सौन्दर्य बोध को -- रसो वै सः की सन्निधि में ले जा सकें। भारतीय संस्कृति और साहित्य में रस ही एकमात्र मूल्य है। रस-निष्पत्ति के बिना कोई मूल्यबोध संभव नहीं और यथार्थ की अनुकृति में हमारा विश्वास नहीं, हम तो सत्य के संकीर्तन में डूबा साधते आये हैं, जिसके बिना रस निष्पत्ति होती ही नहीं। हम केवल साहित्य ही नहीं अपने ज्ञान की सभी शाखाओं को एक सर्वव्यापी केन्द्र से जोड़कर अनुभव करते आये हैं। हमारे ज्ञान का प्रतिमान विच्छिन्नता नहीं, अनन्यता है ।
हमारे लिए यह परखी हुई बात है कि हमारी विद्याएँ ज्ञान को शील की भूमि पर आलोकित देखना चाहती हैं। वे राज्य व्यवस्था को भी इसी भूमि से संचालित होने की प्रेरणा देती आयी हैं। हमारे आधुनिक हिन्दी कवि मैथिलीशरण गुप्त इसी भूले हुए बोध की याद हमें आजादी की लड़ाई लड़ते हुए दिलाते हैं -- हम कौन थे और क्या हो गये हैं, यह विचारना भी जरूरी हो गया है कि आगे और क्या होने जा रहे हैं। आधुनिक समय में नये मानव का स्वप्न रचने वाले कवि जयशंकर प्रसाद का "कामायनी" काव्य यह याद दिलाता है कि दर्शन और साहित्य ही किसी प्राणवान संस्कृति के हाथ होते हैं और यही हाथ विजयनी मानवता के लिए उठाये जा सकते हैं। जयशंकर प्रसाद और सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला लगातार एक पराजित होती जाति के कवि भी हैं, तभी तो दोनों अपनी कविता में अपने समय के पुरुषोत्तम नवीन का चरित रचते हैं। जयशंकर प्रसाद ने ही हमें चेताया था कि -- ज्ञान अलग पर क्रिया भिन्न है।
हम एक जहरीले समझौते के समय में रह रहे हैं। अमृत की खोज की तरफ जाने वाले हमारे बोध पर आधुनिक विश्व बाजार में मथे जा रहे विष की छाया पड़ रही है। अब यह बोध बचेगा कि नहीं, इसकी जिम्मेदारी हम सब पर है।

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