ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
ज्ञान के मंदिरों का अनिश्चय
01-Sep-2017 03:23 PM 1548     

जलते सूरज को देखने के समान सच का सामना करने का साहस कितने लोगों में होता है। हर बात पर हम अपनी संस्कृति की बात करते हैं परन्तु भारत अपनी सांस्कृतिक धरोहर के लिए विश्व स्तर पर जाना-पहचाना ही जाता है और यह सांस्कृतिक विरासत हमें भाषा द्वारा ही प्राप्त हुई है।
"भाषा रेत की तरह है, जिसे मुट्ठी में संभालकर नहीं रखें तो फिसल जाएगी।" परंतु भाषा के बारे में विचार करते समय हमें यह भी निर्णय करना होगा कि हमारे देश के विश्व स्तरीय शिक्षण संस्थान विशेष रूप से विश्वविद्यालयों के हिंदी विभाग क्या वाकई अपनी श्रेष्ठता का शत-प्रतिशत प्रदर्शन कर रहे हैं? क्या आज इन विभागों में जो हिंदी पढ़ाई जाती है वह छात्रों को रोजगार देने में सक्षम है? क्या बारहवीं कक्षा पास करने के बाद विद्यार्थी जब विश्वविद्यालय में बीए प्रथम वर्ष में प्रवेश लेता है तो वह जिस तरह और जिस हिंदी भाषा का अध्ययन कर रहा होता है, वह पर्याप्त है? हमारे हिंदी के प्रोफेसर क्या अपना दायित्व पूर्ण रूप से निभा रहे हैं? ये सारे प्रश्न उठाना बेमानी लगता है, क्योंकि आज हिंदी भाषा और साहित्य को लेकर जो स्थिति देश के विश्वविद्यालयों में चल रही है वह स्थिति चौंकाने वाली है।
विश्वविद्यालय राजनीति के अखाड़े बन चुके हैं। प्रोफेसरों का पढ़ाने में कम राजनीति में अधिक दखल है। हिंदी जहाँ से पुष्पित-पल्लवित होकर विकास के सोपान तक चढ़ती है, वह हिंदी विभाग "दिया तले अँधेरा" की दशा को प्राप्त हो गया है। साल के जनवरी, फरवरी और अगस्त, सितम्बर माहों में हिंदी विभागों में संगोष्ठियों की बाढ़ सी आ जाती है। बाढ़ में डुबकियाँ बेचारे शोधार्थी लगाते हैं। संगोष्ठियों में शिक्षित बेरोजगार भीड़ के रूप में प्रोफेसरों के व्याख्यान सुनने को जुटाये जाते हैं और स्थिति ऐसे दोराहे पर आ गई है कि शोधार्थियों के शोध-पत्र पढ़े-सुने बगैर उन्हें राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर का प्रमाण-पत्र आसानी से मिल जाता है।
क्या देश में ऐसी भी कोई संगोष्ठी आयोजित की जा रही है जहाँ यह अनुमान लगाया जा सके कि भारत में आज कितने ऐसे हिंदी विषय में पीएचडी धारक हैं जो बेरोजगार हैं। हिंदी की उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद इन शिक्षित पीएचडी धारकों के रोजगार की कौन चिंता करेगा? महज संगोष्ठियों में शिक्षित बेरोजगारों, पीएचडी धारकों को दाल-भात-पनीर खिलाने से हिंदी भाषा का विकास एवं संवर्धन न हो सकेगा। यह बात हिंदी के प्रोफेसरों को समझनी होगी कि हिंदी भाषा एवं साहित्य को कौशल विकास के रूप में अपनाने की महत्वपूर्ण आवश्यकता समय की मांग है। महज हिंदी की राजनीति करने से दूषित मनोवृत्ति ही प्रकट होगी और कुछ न मिलेगा।
देश के कुछ नामचीन विश्वविद्यालयों में विगत कुछ वर्षों से हिंदी विभागों में साक्षात्कार की प्रक्रिया पर बड़े प्रश्न चिह्न खड़े किये जा रहे हैं। अधिकांश की चयन प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। आरोप लग रहे हैं कि साक्षात्कार से पहले ही यह निश्चित हो जाता है कि चयन किसका होना है। कोई कुलपति का रिश्तेदार, कोई विभागाध्यक्ष का सगा, कोई मंत्री का चेला-चपाटा तो कोई देश की बड़ी से बड़ी राजनैतिक पार्टी का आदमी। शिक्षित अध्यापकों एवं विषय के ज्ञानी उम्मीदवारों का चयन तो हो ही नहीं रहा है। साक्षात्कार से पहले ही पैनल के समक्ष जुगाड़वाद अपनी जड़ें फैला चुका होता है। निस्संदेह कहना ही पड़ेगा कि देश में हिंदी भाषा का डंका पीटने वाले अध्यापक कम, राजनीति के दावेदार अधिक हैं। इस बात में कोई शक नहीं कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था में बौद्धिक दासता की जड़ें गहरी हैं। जिस कारण आधुनिक शिक्षित व्यक्ति अपने गाँव से और गाँव की जीवन परम्परा से कट जाता है। बेकारों की फौज के सामने जीवन के लिए आदर्श नहीं होता है। क्योंकि शिक्षा ने स्वावलम्बी बनाया ही नहीं, तो फिर अनुशासनहीनता, आत्मविश्वास रहित, मन से टूटा हुआ तनावग्रस्त व्यक्ति कौन-सा काम कर सकता है। यह एक विडम्बना है कि हमारी शिक्षा नीति के निर्माता विकसित देशों की शिक्षा का तो सर्वेक्षण कर आते है, परन्तु भारतीय जीवन की सामाजिक, आर्थिक, साँस्कृतिक, राजनीतिक परम्पराओं और आवश्यकताओं का सर्वेक्षण करने में कठिनाई का अनुभव करते हैंै। व्यावसायिक शिक्षा भी स्तरीय नहीं है।
हमारे विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय डिग्री के बाजार बन गये हैं। शिक्षा का अर्थ नई पीढ़ी में नई चेतना जागृत करके भविष्य की उसकी जिम्मेदारियों को वहन करने की बौद्धिक क्षमता प्रदान करना और उसका ऐसा मानसिक विकास करना जो राष्ट्र की बहुआयामी प्रवृृत्तियों के संचालन की योग्यता प्रदान कर सके लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत में जो शिक्षा नीति निर्धारित की गयी वह इन लक्ष्यों की पूर्ति में पूर्णतः विफल रही।
देश में एक नया रोग पैदा हो गया है। क्षेत्रवादी मानसिकता वाले भाषा विद्वान-प्रोफेसरान अपने क्षेत्र की बोली को लेकर अलग स्वायत्ता की मांग कर रहे हैं। संविधान में 22 भाषाओं को मान्यता प्राप्त है। किन्तु हिंदी की विभिन्न बोलियों को लेकर ये कुछ क्षेत्रीय बोली के समर्थक प्रोफेसरान समाज की मानसिकता को बदलकर क्षेत्रवाद की टोपी पहनाने में लगे हुए हैं। और आठवीं अनुसूची का हवाला देकर अपने निजी स्वार्थों को हासिल करना चाहते हैं।
आज देश के अधिकांश विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग वही पुराने ढर्रे से हिंदी का शिक्षण कार्य चला रहे हैं। स्मार्ट क्लास, भाषा प्रयोगशाला, एडवांस टीचिंग मैथडोलाजी, शिक्षा तकनीकि का प्रयोग होता नजर नहीं आ रहा है।    
विश्वविद्यालय के हिंदी विभागों में साल भर में औसत तौर पर सत्तर दिन विद्यार्थी आते हैं। विद्यार्थी को कक्षा में उपस्थिति पाने हेतु विभाग की कोई प्रतिबद्धता नजर नहीं आती। परीक्षाओं में इन विद्यार्थियों द्वारा बाजार से मॉडल पेपर-गाइड का अध्ययन कर पास होने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचता।
हिंदी के आधार ग्रंथों का अध्ययन न तो विद्यार्थियों द्वारा किया जाता है और न ही प्रोफेसरों द्वारा करावाया जाता है। इस प्रकार पूरा शिक्षण-सत्र बड़ी आसानी से बीत जाता है। भारत के अधिकांश विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों में कमोबेश यही हाल है। "भारतीय हिंदी परिषद" इलाहाबाद द्वारा पंजीकृत सदस्यों के एक चौथाई से भी कम सदस्य इसके सम्मेलनों में भाग लेते हैं। वहीं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा नियमों को देश के सभी विश्व विद्यालयों में शत-प्रतिशत लागू नहीं किया गया है।
आज देश की उच्च शिक्षा प्रणाली कई प्रश्नों को लेकर कटघरे में खड़ी है। देश के विभिन्न राज्य लोक सेवा आयोग द्वारा विज्ञप्तियाँ निकाली जाती हैं तो वहीं विश्वविद्यालय भी समय-समय पर विज्ञप्तियाँ निकालता रहता है बेरोजगार शिक्षितों से परीक्षा शुल्क के रूप में हजारों रुपये लिये जाते हैं। और फिर कुछ समय बाद उन विज्ञप्तियों पर "तदर्थ" नियुक्ति प्रदान करा देता है। ऐसी गतिविधियाँ आज आम बात है।
निजी कॉलेजों की मनमानी अलग एक मुद्दा है, जिनको हिंदी भाषा के विकास से कोई सरोकार नहीं। आज देश के सभी विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों को भाषा के प्रश्न पर आगे आना ही होगा, वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीयता की मानसिकता को तोड़ना होगा।

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