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भैंस और चींचड़े
02-Jun-2017 01:44 AM 2316     

मनुष्य के विकास के कई सोपान हैं। यदि हम इनका एक मोटा-सा वर्गीकरण करें तो ये इस प्रकार हो सकते हैं- अन्य जानवरों के समान भोजन ढूँढ़ने वाला आदिम मनुष्य, भोजन पालने वाला पशुपालक मनुष्य, भोजन उगाने वाला खेतिहर मनुष्य। इनमें खेती से पहले की स्थितियों में उसके जीवन में स्थायित्त्व नहीं था, वह कमोबेश घुमंतू ही बना रहा। भोजन उगाने अर्थात खेती शुरू करने के कारण उसके जीवन में स्थायित्त्व आया। हालाँकि उसे अब भी अधिक उपजाऊ और पानी के निकट वाली भूमि की तलाश में विस्थापन या पलायन या स्थान परिवर्तन करना पड़ जाता था जैसे कि सिन्धु सभ्यता या सरस्वती नदी के तटों पर रहने वालों का विस्थापन। यही कारण रहा कि जल की उपलब्धता और भूमि के उपजाऊपन के कारण नदी घाटियों में ही विश्व की सभी सभ्यताओं का विकास हुआ। इसी काल में स्थायित्त्व के कारण विभिन्न कौशलों का विकास हुआ जिससे जीवन सुगम बना।
प्रारंभ में सभी खेती करते थे और अपनी आवश्यकता-नुसार वस्तुओं की अदला-बदली करते थे। कुल मिलकर जीवन अपने एक छोटे से समूह या क्षेत्र में पूर्णतया स्वावलंबी था। स्थायित्त्व के कारण धीरे-धीरे विशेषज्ञता विकसित हुई जिसने कार्य-विभाजन का मार्ग प्रशस्त किया। यह विशेषज्ञता आगे चलकर जाति या वर्ण व्यवस्था में बदल गई। इस विभाजन को बुद्धिजीवी और बलशाली लोगों ने स्थायी बना दिया और ये दो वर्ग खेती करने वाले लोगों "किसानों" और कारीगरों पर लद गए। इन दोनों वर्गों द्वारा बिना श्रम किए सभी उत्पादों में अपना हिस्सा और आगे जाकर बहुल हिस्सा सुनिश्चित करने और उसे कायम रखने के लिए बुद्धिजीवी जिसे फॉदर, मुल्ला, पंडित कुछ भी कहा जा सकता है, परलोक और ईश्वर के अज्ञात भय की ठेकेदारी लेकर और बलशाली वर्ग ने किसानों और कामगारों को सुरक्षा और व्यवस्था देने के नाम पर अपना प्रभुत्त्व स्थापित कर लिया। उस समय व्यापारी वर्ग नहीं था। लेकिन समाज के विस्तार के कारण अदला-बदली वाला बार्टर सिस्टम संभव नहीं रह गया तो वस्तुओं को दूर-दूर तक ले जाना और लाना शुरू हुआ और एक नए वर्ग का उदय हुआ "व्यापारी"। यह वर्ग भी उत्पादन नहीं करता था। इस प्रकार किसानों और कारीगरों पर एक और वर्ग लद गया। उसकी पीठ का बोझ और बढ़ गया। धूमिल के शब्दों में कहें तो रोटी खाने और पकाने वालों से बड़ा रोटी से खेलने वालों का वर्ग हो गया। इसी को एक और रूपक के माध्यम से कहा जा सकता है कि भैंस से बड़े चींचड़े (भैंस-गाय के थानों से चिपककर उसका खून चूसने वाले जीव) हो गए हैं।
जिसे हम अर्थ-व्यवस्था, सभ्यता, संस्कृति का तथाकथित विकास कह रहे हैं उसमें भैंस के थनों से चिपकने वाले जीवों की संख्या ही बढ़ रही है। बुलेट ट्रेन, डिजिटल इण्डिया, कैशलेस व्यवस्था, मीडिया, मोबाइल, कम्प्यूटर, सिनेमा, कार आदि के विस्तार से दुनिया के संसाधनों का अत्यधिक दोहन होगा, प्रदूषण फैलेगा और जीवन अधिक दुखमय और कठिन हो जाएगा। इस सारे विकास क्रम में उत्पादन में से किसान और मजदूर के अतिरिक्त शेष सब को एक बड़ा हिस्सा चाहिए। कम हो रहा है तो किसान और मजदूर का हिस्सा। और यही कारण है दुनिया को जीवन का आधार अन्न देने वाला किसान आत्महत्या कर रहा है और मजदूर धूल के भाव बिकने को मज़बूर है। उसके विरुद्ध विश्व का समस्त बाज़ार, व्यापार और सत्ताएँ एकजुट हैं।
बँधुआ है मज़दूर अभी तक
मगर मुक्त व्यापार हो गया
अमरीका की बेरोजगारी का कारण वहाँ के व्यापारी और उत्पादक हैं जो अधिक मुनाफे के लिए अविकसित देशों के सस्ते श्रम से सस्ता माल बनवाकर अपने और अन्य देशों में बेचते हैं। यदि सब अपने यहाँ के संसधानों से उत्पादन करें और अपने लोगों को वाजिब दाम में बेचें तो रोजगारी का असंतुलन भी नहीं होगा, संसाधनों की बचत होगी और व्यर्थ की यह भागमभाग भी कम होगी।
अभी कहा जा रहा है कि भारत की मंडियों को डिजिटल बनाकर दुनिया की मंडियों से जोड़ दिया जाएगा जिससे किसान जहाँ भी अधिक दाम मिलेंगे, अपना माल बेच सकेगा। कितना सरल और मासूम इलाज़ है। किसान के पास कोई विकल्प नहीं है अन्यथा वह खेती से तंग आ चुका है। इतना तंग तो वह देश के दस हजार वर्षों के इतिहास में भी कभी नहीं रहा। पहले जमीदारों, महाजनों ने उसका शोषण किया लेकिन वे यह भी जानते थे कि यदि यह मर गया तो हम किसके बल पर मज़े करेंगे? लेकिन आज तो दुनिया में कहीं से भी कुछ भी आयात कर सकने का विकल्प है ना। लेकिन लोगों को पता नहीं कि यदि जहाज में आग लगेगी तो चूहे भी बच कर नहीं जा सकेंगे। इसीलिए समझदार देश कुछ भी करके अपने किसान को आत्महत्या तक नहीं पहुँचने देते। कोई भी समझदार देश अन्न और हथियारों के मामले में किसी और पर निर्भर नहीं रहना चाहता। अमरीका में बड़े-बड़े खेत, यंत्रीकृत खेती, खेतों तक में शहरी जीवन की सभी सुविधाएँ देखकर हम सोचते हैं कि वहाँ के किसानों के तो ठाठ हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। जो वास्तव में खेती करते हैं उनकी हालत कहीं कम, तो कहीं थोड़ी कम खराब है, लेकिन वैसी हालत कहीं नहीं है जैसी नेताओं और सेठों के फार्म हाउसेज में गाय, सब्जियाँ, जैविक खेती, स्विमिंग पूल, शाम की पार्टियाँ और तरह-तरह के अपराध और षड़यंत्र भी होते हैं। अमरीका में भी बड़े लोगों के पास सैंकड़ों एकड़ के बहुत बड़े-बड़े खेत हैं जिन्हें रेंच कहा जाता है। वहाँ खेती की लाभदायकता बड़ी बात नहीं है बल्कि वे उनके ऐशगाह हैं। वहाँ उनके घोड़े पाले जाते हैं, वहाँ वे राजाओं की तरह "विहार" करने जाते हैं।
जहाँ तक किसानों की बात है तो उन्हें खेती से बस इतना ही मिलता है जितना एक मज़दूर को मिनिमम वेतन। अमरीका में एक कैदी पर सरकार का डेढ़ हजार डालर प्रतिमाह खर्च होता है और किसान को भी हाड तोड़कर भी इससे ज्यादा नहीं मिलता। वहाँ जेलें निजी संस्थानों को दी जाती हैं और सरकार उन्हें प्रति कैदी के हिसाब से एक निश्चित राशि देती है जैसे अपने यहाँ सरकार अनुदान से चलने वाली गौशालाएँ को राशि मिलती है। और यहाँ जैसा गौशालाओं में हो सकता है वह वहाँ भी असंभव नहीं है।
किसानों से गेहूँ, मक्का व अन्य फसलें खरीदने के स्वयं द्वारा निर्धारित मानदंडों के नाम पर बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ अपने बीज, खाद, कीटनाशक, विशेष यन्त्र, ग्रेडिंग सिस्टम आदि बेचने के लिए किसानों को कम ब्याज पर कर्जे उपलब्ध करवाती हैं। यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है और इस प्रकार किसान कभी भी इन कंपनियों के क़र्ज़ से मुक्त नहीं हो सकता। वैसे अमरीका चाहता है कि भारत अपने किसानों को सब्सीडी देना कम करे लेकिन वह अपने किसानों को सब्सीडी देता है। यह बात और है कि अंततः यह सब्सीडी बड़ी फ़ूड मेन्यूफेक्चरिंग कंपनियों के लाभ का ही कारण बनती हैं। यदि कभी कोई फसल अधिक हो जाती है तो वहाँ भी उसका वही हाल होता है जो हमारे यहाँ कभी आलू, कभी प्याज तो कभी टमाटर का होता है।
इसका कारण है कि किसान कैश क्रोप के चक्कर में कोई एक उत्पाद इतना अधिक कर लेता है कि उसकी दुर्गति हो जाती है। इस वर्ष भी राजस्थान के कई किसानों ने प्याज को उखाड़ने की बजाय उसे खेत में ही जोत देना उपयुक्त समझा। क्या हम उसके इस दर्द का कोई अनुमान लगा सकते हैं। अपने बच्चे को इसलिए मार देना कि आपके पास उसे खिलाने के लिए रोटी नहीं है।
गाँव और खेती का अर्थ है स्वावलंबन। सब प्रकार का स्वावलंबन। उसे नई तकनीक बेचकर सुखी बनाने, ग्रामीण से नागर बनाने के नाटक फिर उससे कुछ कमाने का रास्ता निकालना है। कुछ बेचना है। कुछ कमाना है। आज उसकी भैंस कब्जाकर मोबाइल थमाया जा रहा है। अनाज के बदले शक्तिमान या बाहुबली देखने का टिकट दिया जा रहा है। उसके नाम से सारी दुनिया के बाहुबली और सेवक दंड पेल रहे हैं। और बेचारा किसान मजदूर उनके राज्याभिषेक में छिड़काव कर रहा है, गलीचे बिछा रहा है, स्वागत गीत गा रहा है। सब देशों और समाजों में वह किसी ईश्वर के अवतार, प्रतिनिधि और पुत्र के अवतरण के लिए आकाश में टकटकी लगाए हुए है। लेकिन याद रहे, भैंस मर गई तो चींचड़े भी जिंदा नहीं रहेंगे

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