ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
बेलारूस में हिंदी समर कैंप
CATEGORY : रपट 01-Aug-2016 12:00 AM 476
बेलारूस में हिंदी समर कैंप

छह से चौबीस जून 2016 तक "ज़ारनीत्सा" नामक समर कैंप सम्पन्न हुआ। बेलारूस के मिन्स्क नगर से 46 किलोमीटर की दूरी पर ओ.जे.एस.सी. इंटीग्रल द्वारा स्थापित किया गया यह हिन्दी भाषा स्टूडियो "अलंकार" आयोजन की मेहमानदारी करता रहा। इस कैंप में मेरा पूरा बचपन बीता और यहीं से मैं बड़ी होकर कई साल तक अध्यापिका के पद पर काम करती रही। खुशी की बात है कि यही कैंप मेरी एक पायलट परियोजना के कार्यान्वयन के लिए एक मंच बन गया है। इसी समय के दौरान मैं बेलारूसी बच्चों को हिंदी भाषा पढ़ाती रही।
    समर कैंप में बच्चों के लिए बहुत से रोचक मनोरंजन और मंडली बनाकर दिलचस्प कार्यक्रम आयोजित करवाये जाते हैं, लेकिन प्रतियोगिता के लिये तथा जिनकी हिन्दी सीखने में रुचि हो, ऐसे बच्चों को इकट्ठा करना बहुत ही मुश्किल होता है। फिर भी, मेरी हिन्दी की मंडली में दस-बारह वर्ष की छह लड़कियों ने प्रवेश किया जो वास्तव में इतना कम नहीं है।
हंसी-मज़ाक के माहौल में, खेलते-खेलते लड़कियों ने बहुत अक्षरों, शब्दों और वाक्यों को भी सीख लिया। बच्चों के गीतों की हिंदी कार्टून्स लड़कियों को सबसे ज़्यादा पसंद आ गईं। और ओपन क्लास में मेरी छात्राओं ने भारतीय दूतावास के एक प्रतिनिधि से बात भी की।
 सोलह जून को मेरी क्लास देखने के लिए भारतीय दूतावास के द्वितीय सचिव और कार्यालय के प्रधान श्री पीयूष वर्मा आए। उनके आगमन के अवसर पर कैंप में बड़ा उत्सव आयोजित किया गया। बेलारूसी परंपरा के अनुसार मेहमान का स्वागत रोटी और नमक से किया गया था तथा बेलारूसी और भारतीय गीतों से, उन्हें कैंप की सैर करवाई गई थी। इसके अलावा सचिव महोदय बच्चों के चित्र की प्रदर्शनी तथा कलात्मक वस्तुओं की छोटी प्रदर्शनी भी देखने गए। ओपन क्लास में श्री पीयूष वर्मा ने कैंप को बहुत-सी हिंदी सीखने की पुस्तकें तथा दृश्य-श्रव्य सामग्री को तोहफ़े के तौर पर दिया। मैंने भी भारतीय दूतावास के पुस्तकालय के लिए एक छोटा-सा तोहफ़ा दिया - सुंदर हिन्दी कविताओं का एक संग्रह, जो मेरे दोस्त डॉ. अकेलाभाई, पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी, शिलांग के द्वारा संग्रहित किया गया था।
फिर छोटे कॉन्सयर्ट में बच्चों ने बहुत अच्छा कार्यक्रम प्रस्तुत किया, जिसमें आमंत्रित नृत्य करने वाली नर्तकियों ने - "आम्रपाली" भारतीय नृत्य स्कूल से मेरी सहेलियों ने भी भाग लिया। और कॉन्सेर्ट के बाद रूसी भाषा में दिए गए वर्मा जी के भाषण की समाप्ति पर पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। इसी तालियों की गड़गड़ाहट से बच्चों ने मेहमान को विदा किया। सारा उत्सव "इंटीग्रल" अखबार के संवाददाताओं के कैमरों की नज़रों में चलता रहा। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि मेरी यह परियोजना सफल हुई, चाहे उस में छोटी संगठनात्मक खामियां भी थी। और मुझे आशा है कि कैंप में इस तरह के गर्मियों के पाठ्यक्रम अच्छी परंपरा बन जाएंगे।
अंत में मैं अपनी गहरी कृतज्ञता व्यक्त करना चाहूँगी, सबसे पहले कैंप संचालिका तातियाना येरमलीन्स्काया के प्रति, जिन्होंने मुझमें और मेरी परियोजना पर भरोसा किया, मुझसे भी ज़्यादा और अपने व्यस्त कार्यक्रमों के बावजूद भी उसका समर्थन करती रही। तथा मेरे प्रिय मित्रों के प्रति - "आम्रपाली" भारतीय नृत्य स्कूल की कला निदेशिका डारिया लोन्स्काया, इसी स्कूल की छात्रा मार्गरिटा सफीरोवा, जो अब उसकी एक नृत्य शिक्षिका बन गई तथा स्कूल की छात्राओं - अन्ना गेस्ट और वलेरिया सरोकिना के प्रति, जिन्होंने मेरा बहुत बड़ा नैतिक समर्थन किया तथा कंसर्ट आयोजित करने में अमूल्य सहायता की।

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