btn_subscribeCC_LG.gif
वीरों का कैसा हो बसंत
01-Sep-2016 12:00 AM 5371     

आ रही हिमालय से पुकार
है उदधि गरजता बार-बार
प्राची पश्चिम भू नभ अपार
सब पूछ रहे हैं दिग-दिगन्त-
वीरों का कैसा हो बसन्त।।
 
फूली सरसों ने दिया रंग
मधु लेकर आ पहुँचा अनंग
वधु वसुधा पुलकित अंग-अंग
है वीर देश में किन्तु कन्त-
वीरों का कैसा हो बसन्त।।
 
भर रही कोकिला इधर तान
मारू बाजे पर उधर गान
है रंग और रण का विधान
मिलने को आए हैं आदि अन्त-
वीरों का कैसा हो बसन्त।।
 
गलबांहें हों या हो कृपाण
चलचितवन हो या धनुषबाण
हो रसविलास या दलितत्राण
अब यही समस्या है दुरन्त-
वीरों का कैसा हो बसन्त।।
 
कह दे अतीत अब मौन त्याग
लंके तुझमें क्यों लगी आग
ऐ कुरुक्षेत्र अब जाग जाग
बतला अपने अनुभव अनन्त-
वीरों का कैसा हो बसन्त।।
 
हल्दीघाटी के शिला खण्ड
ऐ दुर्ग सिंहगढ़ के प्रचण्ड
राणा ताना का कर घमण्ड
दो जगा आज स्मृतियाँ ज्वलन्त-
वीरों का कैसा हो बसन्त।।
 
भूषण अथवा कवि चन्द नहीं
बिजली भर दे वह छन्द नहीं
है कलम बंधी स्वच्छन्द नहीं
फिर हमें बताए कौन हन्त-
वीरों का कैसा हो बसन्त।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^