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2019 sep
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हिंदी की चुनौतियों का अद्र्ध-सत्य
हिंदी की चुनौतियों का अद्र्ध-सत्य शायद दुनिया में पलायन के लिए मज़बूर किए जाने वाले लोगों में संख्या के हिसाब से यहूदी सबसे ऊपर हैं और इसी तरह जिनके समूल विनाश के लिए जघन्यतम तरीके अपनाए गए वे भी यहूदी ही थे। हिटलर द्वारा उन पर किए गए अत्याचार अभूतपूर्व हैं जिसके लिए आज भी जर्मनी क
अरण्यरोदन बहुत हुआ, अब हिंदी का उत्सव मनाएँ
अरण्यरोदन बहुत हुआ, अब हिंदी का उत्सव मनाएँ हिंदी को लेकर अरण्यरोदन की परंपरा नेहरू युग से आज तक जारी है। आजादी के 73 साल बाद भी स्थितियां बदलने का नाम नहीं ले रही। आखिर कब तक हिंदी भारत की राष्ट्र भाषा बनने से वंचित रहेगी। आजादी के बाद आई क्रमागत सरकारों और जन प्रतिनिधियों ने हिन्दी के साथ
भारतीय साहित्य का परिप्रेक्ष्य
भारतीय साहित्य का परिप्रेक्ष्य भारतीय साहित्य का दुर्भाग्य रहा कि इसे अन्य भारतीय कलाओं की तरह तरजीह नहीं मिली। इसी का परिणाम है कि भारतीय साहित्य का इतिहास जैसी कोई व्यवस्था सामने नहीं आई। जबकि "भारतीय साहित्य" यह अवधारणा बनी रही और इसकी चर्चा भी होती रही। कुछ विद्वानों के लिए
भारतीय भाषाओं का भविष्य
भारतीय भाषाओं का भविष्य सारी भारतीय भाषाएं अपने जीवन के सबसे गंभीर संकट के मुहाने पर खड़ी हैं। यह संकट अस्तित्व का है, महत्व का है, भविष्य का है। कुछ दर्जन या सौ लोगों द्वारा बोली जाने वाली छोटी आदिवासी भाषाओं से लेकर 45-50 करोड़ भारतीयों की विराट भाषा हिंदी तक इस संकट के
शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र
शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र एक सम्वाद के अंश : "इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी कार्यशाला में पढ़ाने वाले घंटे का तीन-तीन हज़ार लेकर चुटकुलों के सहारे या फिर अपनी अपनी कहानी सुनाकर चले जाते हैं। हमारा समय भी ख़राब होता है
भारत में ज्ञान और शिक्षा की विफलताएं
भारत में ज्ञान और शिक्षा की विफलताएं जयपुर के विनोद भारद्वाज जी ने गालिब की बेहतरीन जीवनी लिखी है, आत्मकथात्मक शैली में। यह इस वर्ष के अंत तक संवाद से प्रकाशित होने वाली है। इस पर विस्तार से चर्चा बाद में। फिलहाल इसका संपादन करते हुए जहां रुका हूं, वह मिर्जा गालिब की 1826 में की गई क
जन्म-शती स्मरण : नेमिचन्द्र जैन
जन्म-शती स्मरण : नेमिचन्द्र जैन साहित्य की दुनिया में मेरा दाखिला 1972 में हुआ। शुरुआत कविता लिखने से हुई। उन दिनों नया प्रतीक, कल्पना, माध्यम, वसुधा आदि साहित्यिक पत्रिकाएँ मेरे घर आया करती थीं। उनमें प्रकाशित अनेक लेखकों की रचनाओं के बीच नेमिचन्द्र जैन को एक कवि-समीक्षक और नाट
प्राग में पहला हिंदी अध्यापक
प्राग में पहला हिंदी अध्यापक हम लोग अपनी पहली हिंदी क्लास का इंतज़ार उत्सुकता से कर रहे थे। नाम हमें मालूम था लेकिन आदमी कैसा होगा। दरवाज़ा खुल गया, छोटे कद का नीली आँखोंवाला, कम बालोंवाला बुज़ुर्ग दाखिल हुआ। बुज़ुर्ग क्या, शायद पचास के थे, लेकिन अठारह सालोंवालों को सब लोग बुज़ुर्
ब्यूटी पार्लर
ब्यूटी पार्लर सिडनी की ये सुबह कितनी सुहानी थी। न जलाने वाली गर्मी थी, न ठिठुराने वाली सर्दी और न ही तेज़ हवा थी। मौसम बस परफेक्ट था। ट्रैक पैन्ट्स और स्नीकर पहनकर सुबह की सैर के लिए निकल पड़ी। घर में कोई था ही नहीं, आज का दिन मेरा पूरा अपना था। कभी-कभी प्रोजेक्ट
कश्मीर के कब्र खोदने वाले
कश्मीर के कब्र खोदने वाले मेरा काम न तो रोचक है और न ही मेरे धन्धे में पैसा है। मैं राजी-रोटी के लिए कब्रें खोदता हूं। सदियों से मेरे पुरखे यही काम करते आए हैं। उनके पास काश्त करने के लिए जमीन नहीं थी और न ही उन्होेंने कभी किसी व्यापार में हाथ डाला। मेरे पिता कई बार शेखी म
हैपीनेस सूचकांक का देश भूटान
हैपीनेस सूचकांक का देश भूटान असम में जहाँ मेरा जन्म हुआ वहाँ से भूटान की सीमा सिर्फ 40 किलोमीटर दूर पड़ती है और बारिश के मौसम के बाद जब कभी आसमान बिलकुल साफ होता था तब हिमालय पर बसे भूटान के लहरदार पहाड़ मेरे कमरे की खिड़की से स्पष्ट दिखाई देते थे। लेकिन भूटान की राजधानी थिम्फू
धरणगांव की स्मृति
धरणगांव की स्मृति अपनी आईएएस की नौकरीकी बाबत कुछ कहूँ इससे पहले अपने जन्मगांव, बचपन, शिक्षादीक्षा आदिके विषयमें कुछ कहना आवश्यक है।मेरा जन्म धरणगांव नामक एक छोटे गांवमें हुआ। यह महाराष्ट्रके उत्तरी छोरपर जलगांव जिलेमें पड़ता है। इसे गांव कहना ठीक न होगा क्योंक
लेखन मैं को काको गुसैयां
लेखन मैं को काको गुसैयां इसमें कोई संदेह नहीं कि हिंदी एक विशाल क्षेत्र की भाषा है और 10 राज्यों की आधिकारिक भाषा है। इससे कहीं अधिक आबादी इसका दैनिक व्यवहार करती है। सुदूर हिमाचल प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र की सीमा तक और पाकिस्तान की सीमा से लगे राजस्थान से लेकर बंगाल तक हिंद
एक दो : सलिल सरोज
एक दो : सलिल सरोज एक अच्छा था मेरे दर से मुकर जाना तेराआसमाँ की गोद से उतर जाना तेरा तू लायक ही नहीं था मेरी जिस्मों-जाँ केवाजिब ही हुआ यूँ बिखर जाना तेरा मेरी हँसी की कीमत तुमने कम लगाईयूँ ही नहीं भा गया रोकर जाना तेरा
चुनौती ये है कि जैसे कोई चुनौती नहीं
चुनौती ये है कि जैसे कोई चुनौती नहीं बहुत कम लोगों में गौर से देखने की सामथ्र्य होती है। दिखाई तो सबको देता है पर सब देख पा रहे हैं इस बात पर विश्वास करना कठिन है। पिछले पांच सौ सालों में योरुप ने पूरी पृथ्वी पर बसी दुनिया को इस तरह गढ़ने की कोशिश की है कि पृथ्वी के निवासी चुनौती की प
विदेशों में सेवा का सम्मान
विदेशों में सेवा का सम्मान भारतीय संस्कृति में "सेवा" और "दान" को अति उच्च कोटि के पुण्य कार्यों में गिना जाता है। ये दोनों कार्य ऐसे कार्य हैं जो व्यक्ति को न केवल समाज से जोड़ते हैं, बल्कि नि:स्वार्थ भावना की धनात्मक तरंगों द्वारा समाज का कल्याण भी करते हैं। यही कारण था कि
हिन्दुस्तान से बाहर हिन्दी
हिन्दुस्तान से बाहर हिन्दी जब कहीं राष्ट्रभाषा हिन्दी की बात चलती है, अखबारों में कुछ छपता है तो मेरे मन में यही बात उठती है कि कब हम हमारे देश में ही हिन्दी को महत्व देंगे? कब हमारी भाषा को और हमें इंग्लैंड या अमेरिका में हेय दृष्टि से नहीं देखा जाएगा। हिन्दुस्तान में जो अ
शिकागो में छोटा मध्यप्रदेश
शिकागो में छोटा मध्यप्रदेश शिकागो और उसके आसपास रहने वाले मध्यप्रदेश में पैदा होने वाले युवाओं ने बीते महीने आपस में मिलने-जुलने के लिये पिकनिक का आयोजन किया। इस पिकनिक में बच्चों के अलावा बुजुर्ग अभिभावकों ने भी हिस्सा लिया और जमकर लुत्फ उठाया। आयोजन की धींगामस्ती के दौरान
वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-28 दूत हनुमान : भाग-7
वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-28 दूत हनुमान : भाग-7 व्यक्ति या समष्टि? किसी भी कार्य में किसका गुरुत्व है? व्यक्ति तो कार्य करता है, उसको समाज की जरूरत कब होती है? इन प्रश्नों के उत्तर वाल्मीकि रामायण में हनुमानजी के प्रसङ्ग में मिलते हैं। समाज में अनेक सदस्य होते हैं, सभी का कुछ न कुछ विशेष कौशल ह
संकल्प जुर्रत
संकल्प जुर्रत संकल्प पिता वो वृक्ष है जो कड़ी धूप सहकरघनी छाँव देता है पिता वो तरु है जो रात-दिनसींचता है प्रेम-जल से अपनी शाखाएँ पिता वो दरख़्त है जो कठिनाइयों के आँधी-तूफ़ान झेलता है औरअपनों पर आँच नहीं आन
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