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2019 nov
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हिन्दी के अंतरंग शत्रु
हिन्दी के अंतरंग शत्रु इन दिनों अपनी हिन्दी दो तरह के अंतरंग शत्रुओं से जूझ रही है- एक हैं हिन्दी के "विभीषण" और दूसरे हैं हिन्दी के "घुन"। हिन्दी के "विभीषण" तो संसद भवन की पावरफुल कुर्सियों या तरह-तरह के पुरस्कारों की लालच में सीधी- सादी जनता को अपने लच्छेदार भाषणों से ग
साहित्य को साहित्य ही क्यों न रहने दें
साहित्य को साहित्य ही क्यों न रहने दें साहित्यकार अपने समय का निरपेक्ष द्रष्टा होता है जो राम झरोखे बैठकर सबको उनकी चाकरी के हिसाब से भुगतान करता है। आजकल यह बहुत चिंतनीय बात है कि विदूषक और चाटुकार इस श्रेणी में घुस गए हैं और कुकर्मी सत्ताधारी और सशक्त वर्ग अपनी साधन सम्पन्नता के बल प
प्रवासी हिन्दी साहित्य अस्मिता की चुनौतियाँ
प्रवासी हिन्दी साहित्य अस्मिता की चुनौतियाँ बीसवीं शताब्दी में हिन्दी साहित्य विभिन्न शाखाओं में विभाजित होने लगा। दलित साहित्य, स्त्री- विमर्श, प्रवासी साहित्य आदि विभिन्न नामों से हिन्दी साहित्य विकसित होने लगा। इस संबंध में कई विवाद भी हुए। कुछ विद्वान साहित्य को सर्जनात्मक और कलात्मक वि
पुणेमें प्रांतसाहबीका पहला चरण
पुणेमें प्रांतसाहबीका पहला चरण वह तिथी 10 अगस्त 1976 थी जिस दिन मैंने पुणे जिलेमें हवेली असिस्टंट क्लेक्टरका पद संभाला, उसे मैं प्रांतसाहबीका दूसरा चरण कहती हूँ। इससे पहले एक वर्षका प्रशिक्षण कार्यकाल भी पुणेमें ही पूरा किया था। वह एक और असिस्टंट कलेक्टरीके दो वर्ष, ये भारतीय प्रश
अपना आसमान तराशना
अपना आसमान तराशना राजशेखर ने उस दिन मुझे अपने शिक्षक-सह-गुरु समर्पण के द्वारा लिखित एक किताब भेंट की। किताब का नाम था क्ठ्ठद्धध्त्दढ़ ठ्ठ द्मत्त्न्र् (अपना आसमान तराशना)। हार्पर कोलिन्स इण्डिया ने अध्यात्म प्रवर्ग में इसे प्रकाशित किया है। राजशेखर की अपने शिक्षक के प्र
सृष्टि का उत्सव रोटी कब तक पेट बाँचती?
सृष्टि का उत्सव रोटी कब तक पेट बाँचती? सृष्टि का उत्सव माटी के निर्झरबस्ती के घरप्रकृति के गीतों के संस्पर्शसाक्ष्य पंछी के नव कलरवखण्ड विश्वासों की चट्टाननर्मदाओं के यशः प्रतीकजातियों की सुन्दर कविताजयंतों के मनोज
चकमक आवाज़
चकमक आवाज़ चकमक हम पास हो कर भी टटोलते अपने स्पर्श कोकभी छू लेना मन भर था पर अब नहीं रही वह सीमा हमारी देह परजैसे कुछ अनजान गमक उपस्थित चिरपरिचित के नेपथ्यसालता हुआ बहुत पास फिर भी अलभ्य आसंग वो बावला अपन
हिंदी की तकनीक छलाँग बाकी है
हिंदी की तकनीक छलाँग बाकी है मैं अमेरिका में पिछले 33 वर्षों से हूँ। 15 सितम्बर 1986 के दिन जब मैं पहली बार हवाई जहाज़ में बैठा था, तब सब जगह अंग्रेज़ी का वर्चस्व था। हिन्दी/ देवनागरी का नाम-ओ-निशान नहीं था। विदेशी परिवेश में हिन्दी कहीं थी तो सिर्फ बी.बी.सी. की हिन्दी सेवा में। आ
हिंदी ब्लॉग लेखन की कहानी
हिंदी ब्लॉग लेखन की कहानी जन्म से कनपुरिया, लेखन शौक़, रोटी के लिए मिट्टी से दूर, पिछले 20 सालों से कुवैत में डेरा है, यहीं पर बसेरा है। पेशे से आईटी प्रोजेक्ट मैनेजर, अब ये प्रोजेक्ट मैनेज करते-करते लेखन में कब उतर गए पता ही नहीं चला। सारी उम्र अँग्रेजी में पढ़े-लिखे हैं, लेकि
सब काहू का लीजिये साँचा शब्द निहार
सब काहू का लीजिये साँचा शब्द निहार इस सम्पादकीय का शीर्षक महात्मा कबीरदास की यह पंक्ति दुनिया के सभी लोगों को उस भाव की गहराई में डूबने के लिये प्रेरित करती है कि दुनिया की कोई भी भाषा-बोली में जहां-जहां शब्दों में सच्चाई बसी हुई है उसे इस पृथ्वी पर रहने वाले प्रत्येक मनुष्य को खोजते
शिकागो में मना "दीपम"
शिकागो में मना जब मैं यह आलेख लिख रही हूँ भारत में दिवाली की तैयारियां बड़े ज़ोरों से चल रही होंगी। लेकिन विदेश में रहने वाले भारतीयों के लिए दीवाली का पर्व उसी अंदाज में मनाना संभव नहीं हो पाता, जैसा भारत में मनाया जाता है। लेकिन हम सभी की त्यौहार मनाने का भावना कभी
निर्मला
निर्मला सात बजे रात के परचारक गीता के आठवा अध्याय सुरू करिस। "श्रीकृष्णजी के वचन सुनकर अर्जुन ने पुछा- हे पुरुषोत्तम! ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है?" सम्भू एक लकड़ी वाला कुर्सी पे परचारक अउर बेदी के सामने छोटा खाखी जंघिया अउर छोटा बाहीं वा
स्त्री द्वेषी
स्त्री द्वेषी यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता, वाले देश में भी (बाक़ी देशों की बात तो छोड़ ही दीजिये) नारी की पूजा कैसे होती है सब जानते हैं। जैसे ताजपोशी का अर्थ भले ही सम्मानसूचक हो मगर बरिबंड सुपुत्र की जो मरम्मत जूतों से होती है उसे भी ताजपोशी ही कहा
विभाजन की त्रासदी और संप्रदायवाद विरोधी स्वर कृष्णा सोबती
विभाजन की त्रासदी और संप्रदायवाद विरोधी स्वर कृष्णा सोबती सांप्रदायिकता का धर्म से, धर्म की शिक्षाओं से, धर्म के दार्शनिक पहलुओं से, धर्म में बुराइयों व सुधारों से, जनता की धार्मिक आकांक्षाओं से कोई सरोकार नहीं होता। सांप्रदायिक ताकतें धार्मिक प्रतीकों तथा धार्मिक आस्थाओं का अपनी सुविधा और जरूरतों के अनु
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